Midterm Elections 2026: US में कौन-कौन से राष्ट्रपति हारे थे मिडटर्म चुनाव, क्या हुआ था उनका हाल?
Midterm Elections 2026: अमेरिका में हर राष्ट्रपति की पार्टी को अमूमन मिडटर्म कर्स के तहत संसद में सीटों का नुकसान उठाना पड़ता है. ट्रम्प, ओबामा और क्लिंटन जैसे नेताओं को हार का सामना करना पड़ा.

Midterm Elections 2026: अमेरिका के राजनीतिक इतिहास में मिडटर्म चुनाव हमेशा से व्हाइट हाउस के लिए एक बड़ी परीक्षा साबित होते रहे हैं. जब भी अमेरिकी राष्ट्रपति अपना शुरुआती कार्यकाल पूरा करने की ओर बढ़ते हैं, तो जनता का मूड उनकी नीतियों और प्रशासनिक फैसलों की दिशा तय कर देता है. अमेरिकी राजनीति में इसे मिडटर्म कर्स यानी मध्यावधि के अभिशाप के रूप में देखा जाता है, जहां अमूमन सत्ताधारी पार्टी को संसद के दोनों सदनों में सीटों का भारी नुकसान उठाना पड़ता है. हाल ही में हुए राजनीतिक बदलावों ने एक बार फिर इस बात को साबित कर दिया है कि अमेरिकी मतदाताओं का मिजाज सत्ता के समीकरणों को किस तरह रातों-रात पूरी तरह से पलट सकता है.
डोनाल्ड ट्रम्प
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के राजनीतिक सफर में मध्यावधि चुनावों का अनुभव काफी चुनौतीपूर्ण रहा है. अपने पहले कार्यकाल के दौरान साल 2018 के मिडटर्म चुनावों में उनकी रिपब्लिकन पार्टी को प्रतिनिधि सभा यानी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में 41 सीटों का बड़ा नुकसान झेलना पड़ा था, जिससे विपक्षी दल का सदन पर नियंत्रण हो गया था. इसके बाद अपने दूसरे कार्यकाल के अंतर्गत नवंबर 2026 में हुए मिडटर्म चुनावों में ट्रम्प की पार्टी को एक बार फिर ऐतिहासिक पराजय का सामना करना पड़ा, जहां डेमोक्रेटिक पार्टी ने कांग्रेस के दोनों मुख्य सदनों पर अपना पूर्ण अधिकार जमा लिया.
बराक ओबामा
आधुनिक अमेरिकी राजनीतिक इतिहास में साल 2010 का मिडटर्म चुनाव डेमोक्रेटिक पार्टी के लिए एक बड़े आघात के रूप में दर्ज है. बराक ओबामा के राष्ट्रपति बनने के शुरुआती दो वर्षों के भीतर ही जनता का असंतोष खुलकर सामने आया और डेमोक्रेट्स ने प्रतिनिधि सभा में एक झटके में 63 सीटें गंवा दीं. इस भारी उलटफेर के चलते विपक्षी रिपब्लिकन पार्टी ने संसद के निचले सदन में अपना बहुमत हासिल कर लिया. हालांकि इस राजनीतिक झटके ने ओबामा प्रशासन के विधाई कामों को बेहद कठिन जरूर बना दिया था, लेकिन इसके बावजूद वे अपनी रणनीति के बल पर आगे चलकर अगला राष्ट्रपति चुनाव जीतने में कामयाब रहे थे.
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बिल क्लिंटन
साल 1994 का मध्यावधि चुनाव बिल क्लिंटन के राजनीतिक जीवन का एक ऐसा मोड़ था जिसने सबको चौंका दिया था. उस चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी को अभूतपूर्व हार का सामना करना पड़ा और पार्टी ने हाउस में 54 तथा सीनेट में 8 सीटें खो दीं. इसके परिणामस्वरूप कई दशकों के लंबे अंतराल के बाद रिपब्लिकन पार्टी ने अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों में अपना बहुमत प्राप्त कर लिया. इस हार के बाद क्लिंटन को राजनीतिक रूप से काफी कमजोर माना जाने लगा था, लेकिन उन्होंने अपनी नीतियों में बदलाव करके विपक्षी नेताओं के साथ समन्वय बैठाया और अपनी राजनीतिक पकड़ को फिर से मजबूत किया.

जॉर्ज डब्ल्यू. बुश
जॉर्ज डब्ल्यू. बुश के शासनकाल में साल 2006 के मिडटर्म चुनाव अमेरिका की विदेश नीति और विशेष तौर पर इराक युद्ध से उपजे जन असंतोष की भेंट चढ़ गए थे. इस चुनाव में जनता का गुस्सा रिपब्लिकन पार्टी पर फूटा और पार्टी को संसद के दोनों सदनों में भारी नुकसान उठाना पड़ा. डेमोक्रेटिक पार्टी ने हाउस और सीनेट दोनों पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया, जिसके बाद बुश का बचा हुआ कार्यकाल भारी राजनीतिक दबाव और प्रशासनिक चुनौतियों के बीच ही गुजरा तथा उनकी लोकप्रियता के ग्राफ में भी भारी गिरावट दर्ज की गई.
हैरी ट्रूमैन
द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के तुरंत बाद वर्ष 1946 में हुए अमेरिकी मध्यावधि चुनावों में राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन की डेमोक्रेटिक पार्टी को भारी राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ा था. इस दौरान डेमोक्रेट्स को प्रतिनिधि सभा में 56 और सीनेट में 12 सीटों से हाथ धोना पड़ा था, जिससे विपक्षी दल ने संसद पर कब्जा कर लिया. उस दौर में ट्रूमैन को एक कमजोर और प्रभावहीन राष्ट्रपति के रूप में देखा जाने लगा था, लेकिन उन्होंने हार मानने के बजाय कड़े तेवर अपनाए और सन 1948 के राष्ट्रपति चुनाव में शानदार वापसी करके सभी राजनीतिक पंडितों को हैरान कर दिया था.
हार के बाद पार्टियों की स्थिति क्या?
मध्यावधि चुनावों में हार का सबसे बड़ा असर यह होता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति के हाथ से संसद की विधाई ताकत खिसक जाती है. जब विरोधी दल कांग्रेस के दोनों सदनों पर काबिज हो जाते हैं, तो वे राष्ट्रपति के हर फैसले की कड़ी जांच करने और उनके प्रस्तावित बजट को रोकने की पूरी क्षमता हासिल कर लेते हैं. राजनीतिक शब्दावली में इस स्थिति को लैमर डक कहा जाता है, जहां राष्ट्रपति के पास अपने राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए बहुत सीमित अधिकार ही बचते हैं और उन्हें हर कदम पर विपक्ष के साथ तालमेल बिठाने या गतिरोध का सामना करने के लिए मजबूर होना पड़ता है.
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