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राष्ट्रपति होते हुए भी अपनी मर्जी से पैसा खर्च क्यों नहीं कर सकते डोनाल्ड ट्रंप, क्यों मांगने पड़े 200 अरब डॉलर?

US President Spending Power: हाल ही में ट्रंप सरकार ने कांग्रेस से 200 बिलियन डॉलर की मांग की है. आइए जानते हैं कि अमेरिका का राष्ट्रपति अपनी मनमर्जी से पैसा खर्च क्यों नहीं कर सकता.

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  • अमेरिकी राष्ट्रपति को कांग्रेस से फंड की मंजूरी लेनी पड़ती है।
  • संविधान के अनुसार, कांग्रेस के बिना खर्च नहीं कर सकते।
  • राष्ट्रपति सिर्फ बजट प्रस्ताव रखते हैं, अंतिम निर्णय कांग्रेस का।
  • 1974 का कानून राष्ट्रपति के खर्चों पर सीमाएं और सख्त करता है।

US President Spending Power: जैसे-जैसे अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच तनाव बढ़ रहा है पेंटागन ने कांग्रेस से कथित तौर पर फंडिंग की मांग की है. ट्रंप सरकार ने लगभग 200 बिलियन डॉलर की मांग की है. इससे एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि अगर राष्ट्रपति देश का सबसे शक्तिशाली नेता है तो डोनाल्ड ट्रंप जैसा कोई व्यक्ति जरूरत के हिसाब से सीधे पैसे खर्च क्यों नहीं कर सकता? आइए जानते हैं क्या है इस सवाल का जवाब.

किसके पास है पैसा खर्च करने की ताकत? 

अमेरिकी व्यवस्था में सरकारी पैसा खर्च करने का अधिकार अमेरिका की कांग्रेस के पास होता है ना कि राष्ट्रपति के पास. इस सिद्धांत को अक्सर पावर ऑफ द पर्स कहा जाता है. यह बात अमेरिका के संविधान में साफ तौर पर बताई गई है. अनुच्छेद I में कहा गया है कि राष्ट्रीय खजाने से तब तक कोई पैसा नहीं निकाला जा सकता जब तक कि उसे कानून द्वारा मंजूरी ना मिल गई हो. आसान शब्दों में कहें तो कांग्रेस की इजाजत के बिना राष्ट्रपति $1 भी खर्च नहीं कर सकते. 

चेक्स एंड बैलेंसेस का नियम 

यह नियम चेक्स एंड बैलेंसेस की अवधारणा का हिस्सा है. अमेरिकी व्यवस्था को जानबूझकर इस तरह से बनाया गया था ताकि यह पक्का हो सके कि सरकार की कोई भी एक शाखा काफी ज्यादा शक्तिशाली ना बन जाए. अगर खर्च पर राष्ट्रपति का पूरा नियंत्रण होता तो इससे सार्वजनिक धन का दुरुपयोग हो सकता था. कांग्रेस को अंतिम फैसला लेने का अधिकार देकर इस व्यवस्था को पक्का करना है कि हर बड़ा वित्तिय फैसला लोकतांत्रिक तरीके से लिया जाए.

राष्ट्रपति सिर्फ अनुरोध कर सकते हैं 

राष्ट्रपति सरकार का नेतृत्व करते हैं, लेकिन वित्तीय मामलों में उनकी भूमिका सिर्फ बजट का प्रस्ताव रखने तक ही सीमित होती है. हर साल राष्ट्रपति एक वित्तीय योजना पेश करते हैं जिसमें बताया जाता है कि पैसा कैसे खर्च किया जाना चाहिए.  लेकिन असल में यह सिर्फ एक सिफारिश या इच्छा सूची होती है. कांग्रेस के पास इसे मंजूर करने, इसमें बदलाव करने, इसे कम करने और इसे पूरी तरह से खारिज करने का अधिकार होता है.

अगर कांग्रेस मना कर दे तो क्या होता है? 

अगर कांग्रेस मांगे गए फंड को मंजूर नहीं करती तो राष्ट्रपति तय किए गए खर्च को आगे नहीं बढ़ा सकते. यहां तक कि जरूरी प्रोजेक्ट भी देर से शुरू हो सकते हैं या फिर रद्द हो सकते हैं. 

1974 के कानून का असर 

1974 में इम्पाउंडमेंट कंट्रोल एक्ट के बाद राष्ट्रपति के खर्च पर लगी सीमाएं और भी सख्त हो गईं. यह कानून तब लाया गया था जब पूर्व राष्ट्रपति ने उन फंड्स को खर्च करने से मना कर दिया था जिन्हें कांग्रेस पहले ही मंजूरी दे चुकी थी. इस कानून से यह साफ हुआ कि राष्ट्रपति कांग्रेस द्वारा मंजूर किए गए फंड को रोक नहीं सकते और राष्ट्रपति पैसे का इस्तेमाल उन कामों के अलावा किसी और काम के लिए नहीं कर सकते जिन्हें कांग्रेस ने मंजूरी दी हो. इससे यह पक्का होता है कि टैक्स देने वालों के पैसे का इस्तेमाल पूरी जवाबदेही के साथ किया जाए.

यह भी पढ़ें: क्या भारत के लोगों को भी खरीदना होगा अमेरिका वीजा बॉन्ड, इसके लिए कितने रुपये जेब में होना जरूरी?

स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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