पिछली बार कब आया था सुपर अल-नीनो, जानें इसने छीन ली थीं कितने लोगों की सांसें?
सुपर अल-नीनो एक खतरनाक मौसमीय स्थिति है, जो दुनिया के तापमान और बारिश के पैटर्न को बदल देती है. 1877 जैसी घटनाओं में भारी तबाही हुई थी और अब 2026 को लेकर फिर चिंता बढ़ रही है.

इन दिनों दुनिया भर में बढ़ती गर्मी और मौसम के बदलते मिजाज ने लोगों की चिंता बढ़ा रही है. वैज्ञानिकों के मुताबिक 2026 में फिर से “सुपर अल-नीनो” जैसे हालात बनने का खतरा बढ़ रहा है. यही वजह है कि लोग 1877 के उस दौर को याद कर रहे हैं, जब एक खतरनाक सुपर अल-नीनो ने पूरी दुनिया में तबाही मचा दी थी. उस समय कि बात करें तो उस समय बारिश कम हुई, सूखा पड़ा और खाने-पानी की भारी कमी हो गई थी. रिपोर्ट्स के अनुसार उस दौर में भारत समेत कई देशों में करोड़ों लोगों की जान तक चली गई थी. ऐसे में आज फिर बढ़ती गर्मी और कमजोर मानसून के संकेत लोगों को डरा रहे हैं.
आखिर क्या होता है सुपर अल-नीनो?
अल-नीनो एक प्राकृतिक मौसम से जुड़ी प्रक्रिया है, जो प्रशांत महासागर यानी Pacific Ocean में होती है. इसमें समुद्र की सतह का पानी सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता है. जब समुद्र का तापमान बढ़ता है, तो इसका असर हवा के पैटर्न, बारिश और पूरे मौसम चक्र पर पड़ता है. वहीं यह कोई नई या अचानक होने वाली घटना नहीं है, बल्कि एक प्राकृतिक चक्र है जो कुछ सालों के अंतर पर बनता रहता है. जब अल-नीनो का असर बहुत ज्यादा तेज हो जाता है, तो इसे “सुपर अल-नीनो” कहा जाता है. इस स्थिति में समुद्र का तापमान सामान्य से काफी ज्यादा बढ़ जाता है और इसका असर दुनिया के कई देशों के मौसम पर साफ दिखने लगता है. जिसमें कई जगहों पर बारिश कम हो जाती है, तो कहीं तेज गर्मी और सूखे जैसी स्थिति बन सकती है.
वैज्ञानिकों का कहना है कि 2026 के आसपास समुद्र के तापमान में तेजी से बढ़ोतरी देखी जा रही है. अगर यह स्थिति और बढ़ती है, तो मौसम में असंतुलन और भी ज्यादा गंभीर हो सकता है. इसलिए इसे समझना बहुत जरूरी है, क्योंकि इसका असर सिर्फ एक देश पर नहीं बल्कि पूरी दुनिया के मौसम और जीवन पर पड़ता है.
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1877 में क्यों गई थीं करोड़ों लोगों की जान?
इतिहास के पन्नों में 1877-78 का सुपर अल-नीनो सबसे खतरनाक माना जाता है. उस समय प्रशांत महासागर का पानी बहुत ज्यादा गर्म हो गया था, जिसका असर दुनिया के कई देशों पर पड़ा, जिसका असर उस समय भारत, चीन, ब्राजील और कई दूसरे देशों में लंबे समय तक सूखा पड़ा था. फसलें बर्बाद हो गई थीं और लोगों के पास खाने तक की कमी हो गई थी. रिपोर्ट्स के अनुसार उस समय लगभग 5 करोड़ लोगों की मौत हुई थी, जिनमें भारत के भी लाखों-करोड़ों लोग शामिल थे. गांवों में लोग भूख और बीमारी से तड़प रहे थे. साथ ही पानी की कमी ने हालात और खराब कर दिए थे. उस दौर में मौसम की सही जानकारी देने वाली तकनीक भी नहीं थी, इसलिए लोग पहले से तैयार नहीं हो पाए थे.
क्या 2026 में फिर दोहराएगा इतिहास?
हालांकि वैज्ञानिक मानते हैं कि आज दुनिया पहले से ज्यादा तैयार है. मौसम की जानकारी देने वाली नई तकनीक, सैटेलाइट और चेतावनी सिस्टम पहले से मजबूत हुए हैं. फिर भी खतरा पूरी तरह टला नहीं है भारत जैसे देशों में गर्मी, पानी की कमी और कमजोर मानसून लोगों की सेहत पर बड़ा असर डाल सकते हैं. साथ ही डॉक्टर भी लगातार लोगों को तेज धूप से बचने, ज्यादा पानी पीने और बुजुर्गों व बच्चों का खास ध्यान रखने की सलाह दे रहे हैं. बढ़ती गर्मी सिर्फ मौसम की खबर नहीं, बल्कि इंसानों की जिंदगी से जुड़ा बड़ा खतरा बनती जा रही है. अगर समय रहते सावधानी नहीं बरती गई, तो आने वाले साल और मुश्किल भरे हो सकते हैं.
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