कभी सफेद जहर कहा तो कभी मिठास, भारत में कैसा रहा चीनी का इतिहास?
भारत ने पूरी दुनिया को गन्ने के रस से दानेदार चीनी बनाने की तकनीक सिखाई थी, जो आज वैश्विक व्यापार का बड़ा जरिया होने के साथ-साथ अत्यधिक रिफाइनिंग के कारण सफेद जहर के रूप में भी देखी जा रही है.

चीनी आज हमारे दैनिक खान-पान और रसोई की जरूरतों का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुकी है. चाय-कॉफी से लेकर पारंपरिक मिठाइयों तक, इसकी मिठास हर जगह मौजूद है. हाल ही में भारत सरकार ने घरेलू बाजार में आपूर्ति संतुलित रखने के लिए 31 अक्टूबर तक 10 लाख मीट्रिक टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति देकर इसे एक बार फिर खबरों में ला दिया है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि एक समय यह सफेद चीनी बेहद दुर्लभ और महंगी मानी जाती थी? आइए जानते हैं कि भारत में चीनी का इतिहास कैसे शुरू हुआ और यह पूरी दुनिया में कैसे फैली.
न्यू गिनी से भारत तक गन्ने की यात्रा
गन्ने की उत्पत्ति की कहानी बेहद दिलचस्प है. दुनिया में किसी बड़ी विकसित सभ्यता ने गन्ने की खोज नहीं की थी. ग्रीनलैंड के बाद विश्व के दूसरे सबसे बड़े द्वीप न्यू गिनी में यह एक जंगली पौधे के रूप में पाया जाता था. वहां के निवासियों ने सबसे पहले इसकी पहचान की और व्यवस्थित ढंग से गन्ने की खेती करना शुरू किया. शुरुआती दौर में लोग केवल गन्ने के तने को चबाकर ही उसका मीठा सुक्रोज रस निकालते थे, क्योंकि तब इसे लंबे समय तक सुरक्षित रखने या दानेदार बनाने की कोई तकनीक उपलब्ध नहीं थी.
भारत ने सिखाया चीनी बनाने का हुनर
गन्ने से रस निकालने के बाद उसे पकाकर ठोस शक्कर बनाने की तकनीक दुनिया को भारत ने सिखाई. भारत की अनुकूल भौगोलिक स्थिति और मानसूनी जलवायु गन्ने की उपज के लिए सर्वोत्तम मानी जाती थी. लगभग 500 ईसा पूर्व (3,000 साल पहले) भारतीय कारीगरों ने गन्ने के रस को उबालकर दानेदार क्रिस्टल बनाने का अनूठा तरीका विकसित किया. इसके बाद लगभग 350 ईस्वी में गुप्त काल के दौरान भारतीय रसायनों और कारीगरों ने रस को गाढ़ा करके खांड और बूरा बनाने की कला में महारत हासिल कर ली.
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यूरोप का मीठा मसाला
उस जमाने में भारत से पूरी दुनिया में कीमती मसाले भेजे जाते थे. जब भारतीय व्यापारी समुद्री और जमीनी मार्गों से मध्य पूर्व और एशिया के अन्य हिस्सों में पहुंचे, तो वे अपने साथ यह नई मीठी चीज भी ले गए. विदेशों में इसे एक बेहद कीमती और अनोखा 'नया मसाला' या 'मीठा मसाला' माना जाने लगा. यूरोप के देशों में तो इसे शुरुआत में 'शुगर साल्ट' कहा जाता था. यही वजह थी कि शुरुआत में यह केवल राजा-महाराजाओं और रईसों के भोजन की शोभा बढ़ाती थी.
सिकंदर के सैनिक और चीन में तकनीक का प्रसार
इतिहास के पन्नों के अनुसार, लगभग 300 ईसा पूर्व जब सिकंदर महान के सैनिक भारत अभियान से वापस लौट रहे थे, तो वे अपने साथ शहद जैसा दिखने वाला पाउडर ले गए थे. यही पश्चिमी दुनिया का चीनी से पहला परिचय था. इसके बाद भारतीय व्यापारियों ने मध्य पूर्व और चीन के लोगों को शक्कर बनाने की कला सिखाई. 650 ईस्वी के आसपास चीन में भी गन्ने की खेती बड़े पैमाने पर शुरू हो गई. भारत से चीनी बनाने का तरीका सीखने और चीन के रास्ते भी इसका व्यापार बढ़ने के कारण बाद में इस सफेद क्रिस्टल को भारत में चीनी नाम मिला.
ब्रिटिश काल में चीनी
मध्यकाल के दौरान मुस्लिम वैज्ञानिकों और व्यापारियों ने चीनी के उत्पादन और रिफाइनिंग के तरीकों को और बेहतर बनाया. 17वीं से 19वीं सदी के बीच वैश्विक व्यापार में चीनी का महत्व इतना बढ़ गया कि यूरोप के देशों ने इसके लिए बड़े-बड़े जहाजी बेड़े तैयार किए. ब्रिटिश शासन काल के दौरान भारत में पारंपरिक खांडसारी उद्योग की जगह आधुनिक मशीनों वाली चीनी मिलें स्थापित की गईं. उत्तर प्रदेश और बिहार गन्ने के उत्पादन के प्रमुख केंद्र बनकर उभरे. आज भारत दुनिया में चीनी का सबसे बड़ा उपभोक्ता और दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश बन चुका है.

मिठास से सफेद जहर बनने की चुनौती
समय के साथ चीनी बनाने की प्रक्रियाओं में काफी बदलाव आया. आधुनिक तकनीक से बनाई जाने वाली अत्यधिक रिफाइंड सफेद चीनी आज स्वास्थ्य विशेषज्ञों के निशाने पर है. डॉक्टरों और वैज्ञानिकों ने अत्यधिक मात्रा में खाई जाने वाली इस चीनी को सफेद जहर की संज्ञा दी है, क्योंकि यह मोटापा, टाइप-2 डायबिटीज और हृदय रोगों का प्रमुख कारण बन रही है. यही वजह है कि आज जागरूक लोग सफेद चीनी से दूरी बनाकर एक बार फिर अपने पुराने भारतीय विकल्पों जैसे गुड़, खांड और देसी शक्कर की ओर रुख कर रहे हैं.
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