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क्या स्पेस मिशन के लिए चुने जा सकते हैं दूसरे देश के नागरिक, जानें भारतीयों को कब-कब मिला मौका?

अंतरिक्ष मिशन अब अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर आधारित हैं. नासा, चीन के तियांगोंग स्टेशन और निजी कंपनियों के जरिए दूसरे देशों के नागरिक अंतरिक्ष में जा रहे हैं. आइए जानें कितने भारतीय ऐसे मिशन पर गए हैं.

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  • अंतरिक्ष में अब दूसरे देशों के नागरिक भी जा रहे हैं.
  • अंतरराष्ट्रीय सहयोग और निजी कंपनियां अंतरिक्ष यात्रा को संभव बना रहे.
  • राकेश शर्मा के बाद शुभांशु शुक्ला बने अंतरिक्ष में दूसरे भारतीय.
  • भारतीय मूल के कई अंतरिक्ष यात्रियों ने छोड़ी अमिट छाप.

क्या किसी दूसरे देश का नागरिक अंतरिक्ष की सीमाओं को पार कर सकता है? यह सवाल आज के दौर में न केवल प्रासंगिक है, बल्कि इसके उत्तर में छिपी संभावनाएं मानव जाति के भविष्य को बदल रही हैं. अंतरिक्ष अब किसी एक देश या एजेंसी की बपौती नहीं रहा, बल्कि यह वैश्विक सहयोग का एक विशाल मंच बन चुका है. अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) से लेकर निजी स्पेस कंपनियों तक, मिशन की प्रकृति और अंतरराष्ट्रीय समझौतों के आधार पर यह संभव हो गया है कि एक देश का नागरिक दूसरे देश के रॉकेट से अंतरिक्ष की सैर करे. चीन ने अपने मानव अंतरिक्ष मिशन के लिए पाकिस्तान के दो एस्ट्रोनॉट्स को संभावित उम्मीदवार के रूप में चयनित किया है. इसी कड़ी में आपको बताएंगे कि कितने भारत और भारतीय मूल के अंतरिक्ष यात्रियों ने वैश्विक स्तर पर अपनी अद्भुत छाप छोड़ी है.

अंतरराष्ट्रीय सहयोग का नया युग

स्पेस मिशनों में दूसरे देशों के नागरिकों का शामिल होना अब कोई कोरी कल्पना नहीं, बल्कि एक हकीकत है. इसका सबसे बड़ा उदाहरण अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) है, जहां नासा, यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA), जापानी एजेंसी (JAXA), कनाडाई एजेंसी और रूस मिलकर काम करते हैं. इन एजेंसियों के बीच हुए समझौतों के कारण, सदस्य देशों के अंतरिक्ष यात्री एक-दूसरे के मिशन पर जाने के लिए पात्र होते हैं. चीन का तियांगोंग स्पेस स्टेशन भी इसी राह पर है, जहां पेलोड स्पेशलिस्ट के रूप में विदेशी यात्रियों को प्रशिक्षण देकर शामिल किया जा रहा है. हाल ही में पाकिस्तान के दो अंतरिक्ष यात्रियों का प्रशिक्षण के लिए चुना जाना इस बात का सबूत है कि अंतरिक्ष अब देशों की सीमाएं मिटा रहा है.

निजी कंपनियों की बढ़ती भागीदारी

आज के समय में अंतरिक्ष केवल सरकारी एजेंसियों का कार्यक्षेत्र नहीं रहा. स्पेसएक्स (SpaceX), एक्सिओम स्पेस (Axiom Space) और ब्लू ओरिजिन (Blue Origin) जैसी निजी कंपनियां अंतरिक्ष पर्यटन और व्यावसायिक मिशनों को एक नई दिशा दे रही हैं. इन कंपनियों के मिशनों में वे लोग भी जा सकते हैं जो किसी विशेष एजेंसी के लिए काम नहीं करते हैं. SERA प्रोग्राम जैसी पहल तो उन देशों के नागरिकों के लिए भी दरवाजे खोल रही है जिनके पास अपना मानव अंतरिक्ष कार्यक्रम सीमित है. भारत के नागरिक भी अब इन निजी मिशनों का हिस्सा बनकर अंतरिक्ष की दहलीज तक पहुंच रहे हैं, जो एक सुखद और प्रगतिशील बदलाव है. 

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अंतरिक्ष में भारत का पहला कदम

भारतीयों के लिए अंतरिक्ष का द्वार 3 अप्रैल 1984 को खुला, जब विंग कमांडर राकेश शर्मा ने सोवियत संघ के 'सोयुज टी-11' मिशन के जरिए इतिहास रचा. सोवियत अंतरिक्ष स्टेशन 'सैल्युट 7' पर बिताए उनके 7 दिन, 21 घंटे और 40 मिनट ने पूरे देश को गौरवान्वित किया था. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के उस मशहूर सवाल- "अंतरिक्ष से भारत कैसा दिखता है?"- के जवाब में उनका कहना "सारे जहां से अच्छा" आज भी हर भारतीय की जुबान पर है. उन्होंने न केवल भारत का मान बढ़ाया, बल्कि दुनिया को यह भी बताया कि भारतीय अंतरिक्ष यात्री किसी भी चुनौतीपूर्ण मिशन के लिए पूरी तरह सक्षम हैं.

भारतीय मूल की अन्य प्रतिभाओं का दम

भारतीय मूल के अंतरिक्ष यात्रियों की सूची काफी लंबी और प्रेरणादायक है. कल्पना चावला, जिन्होंने 1997 और 2003 में नासा के शटल मिशनों में उड़ान भरी, वे अंतरिक्ष में जाने वाली पहली भारतीय महिला बनीं. 2003 की कोलंबिया शटल दुर्घटना में उनकी शहादत ने पूरी दुनिया को झकझोर दिया था, लेकिन उनका जज्बा आज भी लाखों युवतियों के लिए प्रेरणा है. 

वहीं, सुनीता विलियम्स ने नासा के मिशनों के जरिए अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर सबसे लंबे समय तक रहने वाली महिला अंतरिक्ष यात्री का कीर्तिमान स्थापित किया है. उनके बाद सिरीशा बांदला और राजा चारी जैसे नामों ने यह सिद्ध किया है कि भारतीय प्रतिभाओं के लिए कोई भी सीमा अपार नहीं है.

शुभांशु शुक्ला- एक नया ऐतिहासिक अध्याय

भारतीय अंतरिक्ष इतिहास में जून 2025 का महीना हमेशा याद रखा जाएगा, जब ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला ने 'एक्सिओम-4' (Axiom-4) मिशन के जरिए अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन की यात्रा की. राकेश शर्मा के बाद अंतरिक्ष में जाने वाले वे दूसरे भारतीय नागरिक बने. उनका यह मिशन यह दर्शाता है कि भारत की अंतरिक्ष क्षमताएं अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कितनी परिपक्व हो चुकी हैं. यह यात्रा केवल शुभांशु शुक्ला की व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह भारत के उन बढ़ते कदमों का प्रतीक है जो आने वाले समय में खुद के मानव अंतरिक्ष मिशन (गगनयान) की नींव को और मजबूती प्रदान करेंगे.

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About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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