‘अगर और करीब आया बेहद ताकतवर एल नीनो तो...’, भारत में मानसून की कमी के खतरे को लेकर बड़ा खुलासा
Monsoon in India: IMD ने साल 2026 के मानसून के अपने पूर्वानुमान को लॉन्ग पीरियड ऐवरेड (LPA) के 92% से घटाकर 90% कर दिया है. साथ ही इस मौसम में सामान्य से कम बारिश होने की संभावना 60% बताई है.

- दक्षिण-पश्चिम मानसून से पहले एल नीनो का बढ़ता खतरा:
- IMD ने मानसून सामान्य से कम रहने का अनुमान जताया,
- एल नीनो 2026-27 तक बने रहने की संभावना,
- कृषि, जल सुरक्षा और अर्थव्यवस्था पर गंभीर प्रभाव की चेतावनी।
भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून के आने की तैयारी के बीच, क्लाइमेट ट्रेंड्स की एक नई ब्रीफिंग रिपोर्ट तेजी से मजबूत हो रहे एल नीनो और उसके बारिश, खेती, खाद्य सुरक्षा, महंगाई और व्यापक अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों से जुड़े बढ़ते जोखिमों का विश्लेषण करती है.
यह विश्लेषण ऐसे समय आया है जब भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने साल 2026 के मानसून के अपने पूर्वानुमान को लॉन्ग पीरियड ऐवरेड (LPA) के 92% से घटाकर 90% कर दिया है. इसके साथ ही इस मौसम में सामान्य से कम बारिश होने की संभावना 60% बताई गई है. यानी भारत में मानसून के सामान्य से कम होने का खतरा बढ़ रहा है.
रिपोर्ट में सामने आए कई महत्वपूर्ण बिंदु
रिपोर्ट के मुताबिक, इसके मुख्य बिंदुओं की बात करें, तो IMD ने मानसूनी बारिश को सामान्य से कम बताते हुए LPA का 90% रहने का अनुमान जताया है, जिससे भारत कमजोर मानसून की स्थिति की दहलीज पर पहुंच गया है. इसके साथ, नेशनल ओशिअनिक एंड एटमोस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (NOAA) के अनुसार, मई से जुलाई महीने के दौरान एल नीनो की विकसित होने की संभावना 82% है, जबकि इसके 2026-27 की सर्दियों तक बने रहने की संभावना 96% आंकी गई है. जलवायु के मॉडल इस बात का भी संकेत देते हैं कि यह एल नीनो अतीत के सुपर एल नीनो जैसी मजबूत या अत्यंत मजबूत स्थिति ले सकता है.
साल 1950 के बाद से दुनिया में चार सुपर एल नीनो घटनाएं दर्ज की गई हैं, जो 1982-83, 1991-92, 1997-98 और 2015-16 के बीच हुई थीं. इनमें सबसे अधिक तापमान सामान्य से हटकर साल 1982-83 में +2.5 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया था. ऐतिहासिक रूप से, करीब 60 प्रतिशत एल नीनो सालों में भारत में सामान्य से कम या कमजोर मानसून बारिश देखी गई है.
भारत को लेकर एक्सपर्ट्स की क्या है राय?
रिपोर्ट के मुताबिक, एक्सपर्ट्स का कहना है कि सिर्फ कुल बारिश ही नहीं, बल्कि बारिश का वितरण भी अत्यधिक अनियमित हो सकता है, जिसमें लंबे ड्राई स्पेल्स और ब्रेक मानसून जैसी स्थितियां बढ़ सकती हैं. भारत की करीब 52 प्रतिशत खेतिहर भूमि अभी भी बारिश पर आधारित है, जिससे कृषि क्षेत्र बारिश में कमी और मानसून की देरी के प्रति बेहद संवेदनशील बना हुआ है. कमजोर मानसून के कारण ग्राउंडवाटर रिचार्ज, जलाशयों का जलस्तर घटने, सिंचाई सिस्टम्स पर दबाव बढ़ने और शहरी जल संकट के गहराने की आशंका है. ये जोखिम मौजूदा भू-राजनीतिक तनाव, बढ़ती तेल कीमतों और उर्वरकों की उपलब्धता और लागत को लेकर चिंताओं से और बढ़ गए हैं.
ऐसे में एक्सपर्ट्स ने चेतावनी दी है कि 2026 अब तक के सबसे गर्म सालों में शामिल हो सकता है, जबकि 2027 इससे भी अधिक गर्म हो सकता है, क्योंकि एल नीनो वैश्विक तापमान को और बढ़ा सकता है. वहीं, पॉजिटिव इंडियन ओशियन डाइपोल (IOD) मानसून को कुछ हद तक सहारा दे सकता है, हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि वह मजबूत एल नीनो के प्रभाव को कितना संतुलित कर पाएगा.
इनपुट- इरफान खान
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