रेलवे को एक दिन में कितना कमाकर देती है राजधानी ट्रेनें? चौंका देगा हिसाब
भारतीय रेलवे की वीआईपी कमाई, देश के प्रमुख रूटों पर दौड़ने वाली राजधानी एक्सप्रेस ट्रेनों के डेली रेवेन्यू का आया चौंकाने वाला डेटा, जानें टिकट की कीमतें और एक दिन की कुल कमाई का सच

भारतीय रेलवे को देश की लाइफलाइन कहा जाता है, जो हर दिन करोड़ों यात्रियों को उनकी मंजिल तक पहुंचाती है. भारतीय रेल के बेड़े में वैसे तो कई तरह की ट्रेनें शामिल हैं, लेकिन जब बात रफ्तार, वीआईपी ट्रीटमेंट और प्रीमियम सफर की आती है, तो सबसे पहला नाम राजधानी एक्सप्रेस का आता है. साल 1969 में शुरू हुई यह प्रीमियम पैसेंजर ट्रेन आज भी देश के प्रमुख शहरों और राज्यों की राजधानियों को राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से जोड़ने का सबसे वीआईपी माध्यम है.
लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि यात्रियों को शाही सुविधाएं देने वाली ये राजधानी ट्रेनें हर दिन भारतीय रेलवे को कितनी कमाई करके देती हैं? CAG की वित्तीय रिपोर्ट और रेलवे के राजस्व विभाग से जुड़े आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इन ट्रेनों से होने वाली रोजाना की कमाई का हिसाब किसी को भी हैरान कर सकता है.
एक राजधानी एक्सप्रेस की सिंगल ट्रिप की कमाई
राजधानी एक्सप्रेस ट्रेनों से होने वाली कुल कमाई को समझने के लिए पहले एक अकेली ट्रेन का गणित समझना जरूरी है. एक सामान्य राजधानी एक्सप्रेस में लगभग 18 से 22 कोच होते हैं, जिनमें फर्स्ट एसी, सेकेंड एसी और थर्ड एसी श्रेणियों के साथ-साथ पैंट्री कार भी शामिल होती है. रूट और दूरी के आधार पर एक राजधानी एक्सप्रेस में औसतन 1,000 से 1,200 यात्री एक समय पर सफर करते हैं.
दिल्ली से मुंबई या दिल्ली से कोलकाता जैसे व्यस्त रूट्स पर चलने वाली एक सिंगल राजधानी एक्सप्रेस अपने एक चक्कर में करीब 25 लाख से 35 लाख रुपये का ग्रॉस रेवेन्यू कमाती है. त्योहारों या छुट्टियों के सीजन में जब डायनेमिक फेयर लागू होता है, तो यह आंकड़ा प्रति ट्रिप 40 लाख रुपये तक भी पहुंच जाता है.
सभी राजधानी ट्रेनों की एक दिन की कुल कमाई का हिसाब
वर्तमान में भारतीय रेलवे के नेटवर्क पर देश भर में विभिन्न रूट्स को कवर करते हुए लगभग 52 राजधानी एक्सप्रेस संचालित की जा रही हैं. अगर इन सभी 52 अप-एंड-डाउन ट्रेनों की औसत कमाई का हिसाब लगाया जाए, तो सभी राजधानी ट्रेनें मिलकर हर दिन भारतीय रेलवे के खजाने में लगभग 12 करोड़ से 15 करोड़ रुपये का योगदान देती हैं.
इस हिसाब से अगर सालाना रेवेन्यू का आकलन करें, तो सिर्फ राजधानी एक्सप्रेस ट्रेनों के जरिए ही भारतीय रेलवे को हर साल करीब 4,500 करोड़ से 5,000 करोड़ रुपये से अधिक की मोटी कमाई होती है. प्रीमियम क्लास का किराया ज्यादा होने के बावजूद इन ट्रेनों में ऑक्युपेन्सी रेट हमेशा 100 प्रतिशत के करीब रहती है, जो इस भारी-भरकम कमाई का मुख्य कारण है.
किराए के अलावा इन अतिरिक्त माध्यमों से भी होती है तगड़ी कमाई
राजधानी एक्सप्रेस की मोटी कमाई का जरिया सिर्फ यात्रियों का टिकट किराया ही नहीं है. इसके अलावा भी कई ऐसे कमर्शियल माध्यम हैं जिससे रेलवे का राजस्व बढ़ता है. इसमें सबसे बड़ा हिस्सा कैटरिंग का है. हालांकि अब कई रूट्स पर टिकट के साथ खाना वैकल्पिक कर दिया गया है, फिर भी एक बहुत बड़ा वर्ग ट्रेन में ही भोजन लेना पसंद करता है.
इसके अतिरिक्त, इन प्रीमियम ट्रेनों में चलने वाले पार्सल वैन और लीज्ड वीपी कोच के जरिए एक्सप्रेस कमर्शियल कार्गो भेजा जाता है, जिसका प्रति किलोमीटर का भाड़ा सामान्य ट्रेनों से कहीं अधिक होता है. साथ ही, ट्रेन के डिब्बों के बाहरी और आंतरिक हिस्सों पर कॉर्पोरेट विज्ञापनों के जरिए भी रेलवे को हर महीने लाखों रुपये की एक्स्ट्रा इनकम होती है.
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कमाई ज्यादा तो क्या मुनाफा भी है उतना ही बड़ा?
आम जनता को लगता है कि हर दिन करोड़ों रुपये बटोरने वाली ये ट्रेनें पूरी तरह मुनाफे का सौदा हैं, लेकिन रेलवे की वित्तीय बैलेंस शीट की हकीकत थोड़ी अलग है. दरअसल, राजधानी एक्सप्रेस को चलाने और उसका मेंटिनेंस करने का खर्च भी सामान्य एक्सप्रेस ट्रेनों के मुकाबले कई गुना ज्यादा होता है.
इन गाड़ियों के ट्रैक मेंटिनेंस, हाई-स्पीड इलेक्ट्रिक लोकोमोटिव के संचालन, ऑन-बोर्ड हाउसकीपिंग स्टाफ, प्रीमियम लिनेन की सफाई और सुरक्षा व्यवस्था पर रेलवे भारी रकम खर्च करता है. CAG की रिपोर्ट के अनुसार, जहां भारतीय रेलवे को अपनी आम पैसेंजर ट्रेनों को चलाने में घाटा उठाना पड़ता है, वहीं राजधानी, शताब्दी और वंदे भारत जैसी प्रीमियम ट्रेनें ही वो मुख्य जरिया हैं जो रेलवे के यात्री सेवा से होने वाले नुकसान की भरपाई करती हैं.
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