Black Armband Protest : कहां से शुरू हुआ काली पट्टी बांधकर विरोध करना, किसने पहली बार किया था ऐसा प्रयोग
Black Armband Protest : राहुल गांधी ने छात्रों के खिलाफ हुई कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस की शुरुआत की. राहुल गांधी ने कहा कि नीट पेपर लीक से करोड़ों छात्र प्रभावित हुए हैं.

Black Armband Protest : दिल्ली के इंदिरा भवन में छात्रों के मुद्दे पर आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में कांग्रेस नेता राहुल गांधी हाथ पर काली पट्टी बांधकर पहुंचे. राहुल गांधी ने छात्रों के खिलाफ हुई कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस की शुरुआत की. राहुल गांधी ने कहा कि नीट पेपर लीक से करोड़ों छात्र और उनके परिवार प्रभावित हुए हैं, लेकिन अब तक किसी को सजा नहीं मिली. वहीं प्रेस कॉन्फ्रेंस में काली पट्टी बांधकर विरोध जताने के बाद एक बार फिर यह सवाल चर्चा में है कि आखिर काली पट्टी पहनकर विरोध करने की परंपरा कब शुरू हुई और इसका इतिहास क्या है. तो आइए जानते हैं कि कहां से काली पट्टी बांधकर विरोध करना शुरू हुआ और किसने पहली बार ऐसा प्रयोग किया था.
कहां से काली पट्टी बांधकर विरोध करना शुरू हुआ?
काली पट्टी या काला आर्मबैंड लंबे समय से शोक, विरोध और असहमति का प्रतीक माना जाता है. हालांकि इसे वैश्विक पहचान साल 1965 में अमेरिका में हुए एक छात्र आंदोलन से मिली. उस समय अमेरिका वियतनाम युद्ध में शामिल था और युद्ध के विरोध में कुछ छात्रों ने स्कूल में काली पट्टी पहनकर शांतिपूर्ण विरोध करने का फैसला किया.
किसने पहली बार ऐसा प्रयोग किया था?
दिसंबर 1965 में अमेरिका के आयोवा राज्य के डेस मोइन्स शहर में 13 वर्षीय मैरी बेथ टिंकर, उनके 15 वर्षीय भाई जॉन टिंकर और उनके मित्र क्रिस्टोफर एकहार्ट ने वियतनाम युद्ध में मारे गए लोगों के प्रति शोक जताने और शांति की अपील करने के लिए स्कूल में काली पट्टी पहनने का फैसला किया. उनका उद्देश्य किसी तरह की हिंसा नहीं, बल्कि शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखना था. जब स्कूल प्रशासन को इसकी जानकारी मिली तो उसने पहले ही घोषणा कर दी कि जो भी छात्र काली पट्टी पहनकर स्कूल आएगा, उसे स्कूल से बाहर भेज दिया जाएगा. इसके बाद भी इन छात्रों ने अपना फैसला नहीं बदला और काली पट्टी पहनकर स्कूल पहुंचे. इसके बाद उन्हें स्कूल से घर भेज दिया गया.
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सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया मामला
स्कूल से हटाए जाने के बाद यह मामला अमेरिकन सिविल लिबर्टीज यूनियन (ACLU) की मदद से अदालत पहुंचा. करीब चार साल तक कानूनी लड़ाई चली. आखिरकार 24 फरवरी 1969 को अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने 7-2 के बहुमत से छात्रों के पक्ष में फैसला सुनाया. यह फैसला Tinker v. Des Moines Independent Community School District के नाम से जाना जाता है. कोर्ट ने माना कि छात्रों को भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है और केवल शांतिपूर्ण तरीके से काली पट्टी पहनने के कारण उन्हें दंडित नहीं किया जा सकता है. इसके बाद यह फैसला दुनिया भर में छात्रों के अभिव्यक्ति के अधिकार से जुड़े सबसे जरूरी मामलों में गिना जाने लगा.
जॉन टिंकर ने क्या बताया था?
जॉन टिंकर ने बाद में अपने एक्सपीरियंस शेयर करते हुए बताया कि स्कूल जाते समय वह घबराए हुए थे. उन्होंने काली पट्टी अपनी जेब में रखी थी और स्कूल पहुंचने के बाद उसे पहनने की हिम्मत जुटाई. कुछ छात्रों ने उनका मजाक उड़ाया और उन्हें अपमानजनक बातें कहीं, जबकि कुछ छात्रों ने उनका समर्थन भी किया. बाद में स्कूल के प्रिंसिपल ने उन्हें अपने कार्यालय में बुलाकर काली पट्टी हटाने के लिए कहा. जॉन टिंकर ने ऐसा करने से इनकार कर दिया. इसके बाद उन्हें स्कूल से घर भेज दिया गया. यही घटना आगे चलकर अमेरिकी न्यायिक इतिहास के सबसे चर्चित मामलों में शामिल हो गई.
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