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ये मुगल बादशाह था सबसे बड़ा अंधविश्वासी, हर दिन बदलता था कपड़े

मुगल सल्तनत में एक ऐसा बादशाह था, जिसने संघर्षों के बीच दो बार गद्दी संभाली. वह ज्योतिष में गहरा विश्वास रखता था और हफ्ते के हर दिन अलग रंग के कपड़े पहनता था. आइए जानें कि वो कौन था.

मुगल इतिहास में कई ताकतवर और महत्वाकांक्षी बादशाह हुए, लेकिन एक ऐसा भी शासक था जिसकी चर्चा उसके फैसलों से ज्यादा उसके अजीब शौक की वजह से होती थी. वह हर दिन अलग रंग के कपड़े पहनता था और यह सब किसी फैशन के कारण नहीं, बल्कि ज्योतिष पर गहरे विश्वास की वजह से करता था. यह कहानी है एक ऐसे बादशाह की, जिसने तख्त भी खोया, निर्वासन भी झेला और फिर वापसी भी की, लेकिन अंधविश्वास नहीं छोड़ा. आइए जानें. 

संघर्षों से भरा जीवन

हुमायूं जिनका पूरा नाम नसीरुद्दीन हुमायूं था, का जन्म 6 मार्च 1508 को हुआ था. वह मुगल सल्तनत के संस्थापक बाबर के बेटे और उत्तराधिकारी थे. 1530 में बाबर की मृत्यु के बाद हुमायूं गद्दी पर बैठे और मुगल साम्राज्य के दूसरे सम्राट बने. लेकिन उनका शासन आसान नहीं रहा. शेरशाह सूरी से हार के बाद उन्हें 1540 में दिल्ली छोड़नी पड़ी और लगभग 15 साल निर्वासन में गुजारने पड़े. इस दौरान वे फारस भी गए और वहां से मदद लेकर 1555 में दोबारा दिल्ली की गद्दी हासिल की. कुल मिलाकर उन्होंने करीब 16 साल शासन किया, हालांकि यह समय दो हिस्सों में बंटा हुआ था. 

ज्योतिष पर गहरा विश्वास

हुमायूं के बारे में इतिहास में एक खास बात दर्ज है कि उनका ज्योतिष में गहरा भरोसा था. कहा जाता है कि वे ग्रहों और नक्षत्रों की चाल के अनुसार अपने कपड़ों का रंग तय करते थे. हफ्ते के सातों दिन के लिए कपड़ों के अलग-अलग रंग तय थे. मसलन, शनिवार को वे नीले या काले रंग के वस्त्र पहनते थे. उनका मानना था कि ग्रहों के अनुसार रंग पहनने से किस्मत मजबूत होती है और बुरे प्रभाव कम होते हैं. उस दौर में ज्योतिष का असर दरबारों में आम था, लेकिन हुमायूं का विश्वास कुछ ज्यादा ही गहरा माना जाता है. 

शाही फैशन और वैभव

मुगल शासक अपने शाही पहनावे के लिए मशहूर थे. ब्रोकेड, रेशम और कीमती धागों से बने वस्त्र आम बात थे. सोने-चांदी की कढ़ाई और कीमती पत्थरों से सजे कपड़े दरबार की शान बढ़ाते थे. हुमायूं भी इससे अलग नहीं थे. फर्क बस इतना था कि वे फैशन से ज्यादा ग्रह-नक्षत्र को प्राथमिकता देते थे. उनके कपड़े सिर्फ शाही नहीं, बल्कि शुभ भी होने चाहिए. यह सोच उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बन चुकी थी. 

आगरा से दिल्ली तक शासन

शासन के शुरुआती वर्षों में हुमायूं ने आगरा को अपनी प्रशासनिक राजधानी बनाया. बाद में दिल्ली को फिर से केंद्र बनाया गया. निर्वासन के बाद जब वे लौटे, तो उनका मकसद साम्राज्य को दोबारा मजबूत करना था. लेकिन किस्मत ने उनका साथ ज्यादा समय तक नहीं दिया. 27 जनवरी 1556 को उनकी मृत्यु हो गई. कहा जाता है कि दिल्ली के पुराना किला में स्थित शेर मंडल पुस्तकालय की सीढ़ियों से फिसलकर वे गिर पड़े. अजान की आवाज सुनकर जल्दी में उतरते समय उनका पैर उनकी पोशाक में उलझ गया और सिर पर गंभीर चोट लगी और कुछ समय बाद उनकी मौत हो गई. 

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About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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