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कहां से आया 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' शब्द, किसने सुझाया था AI का नाम?

हाल ही में दिल्ली में AI समिट खत्म हुआ है. हालांकि यह समिट कई वजहों से चर्चा में रहा. लेकिन क्या आपको पता है कि इसका नाम AI आखिर किसने दिया था और कब यह नाम रखा गया.

इंडिया-एआई इम्पैक्ट समिट 2026 में दुनिया के दिग्गज एआई विशेषज्ञ एक मंच पर नजर आए. इस कार्यक्रम में Sam Altman, Demis Hassabis और Dario Amodei जैसे बड़े नाम शामिल हुए. सम्मेलन में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के तेजी से बदलते तकनीकी परिदृश्य, सरकारी नीतियों की दिशा, अर्थव्यवस्था पर इसके असर और इससे जुड़ी नैतिक दुविधाओं पर विस्तार से बात हुई. इस चर्चा के बीच आइए जानें कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस शब्द की शुरुआत कब हुई और इसे सबसे पहले किसने गढ़ा? 

कब और किसने सुझाया था AI का नाम?

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस शब्द सबसे पहले 1956 में इस्तेमाल किया गया था. यह नाम अमेरिकी कंप्यूटर वैज्ञानिक John McCarthy ने सुझाया था. उस समय वे युवा शोधकर्ता थे और मशीनों को इंसान जैसी सोचने की क्षमता देने पर काम कर रहे थे. 1956 में अमेरिका के Dartmouth College में एक ग्रीष्मकालीन शोध सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसे बाद में डार्टमाउथ कॉन्फ्रेंस के नाम से जाना गया. इसी सम्मेलन के प्रस्ताव पत्र में पहली बार Artificial Intelligence शब्द औपचारिक रूप से लिखा गया था.

क्यों चुना गया यही नाम?

जॉन मैकार्थी और उनके साथियों का मानना था कि अगर मशीनें सीख सकती हैं, तर्क कर सकती हैं और समस्याओं का हल निकाल सकती हैं, तो यह एक तरह की कृत्रिम बुद्धिमत्ता ही है. इसलिए उन्होंने Artificial यानी कृत्रिम और Intelligence यानी बुद्धि शब्द को मिलाकर नया नाम दिया. उस दौर में कंप्यूटर अभी शुरुआती अवस्था में थे, लेकिन वैज्ञानिकों का सपना था कि एक दिन मशीनें शतरंज खेलेंगी, भाषा समझेंगी और खुद फैसले लेंगी. यह सोच उस समय काफी साहसी मानी जाती थी.

किसने रखी AI रिसर्च की बुनियाद?

डार्टमाउथ सम्मेलन में कई बड़े नाम शामिल हुए थे. इनमें Marvin Minsky, Claude Shannon और Allen Newell जैसे वैज्ञानिक भी थे. इन सभी ने मिलकर AI रिसर्च की बुनियाद रखी. हालांकि उस समय उन्हें अंदाजा नहीं था कि आने वाले दशकों में यही शब्द पूरी दुनिया की टेक्नोलॉजी को बदल देगा.

AI शब्द का असर

1956 के बाद आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस धीरे-धीरे वैज्ञानिक समुदाय में लोकप्रिय होने लगा. शुरूआती वर्षों में रिसर्च सीमित थी, लेकिन 1980 के दशक में कंप्यूटिंग पावर बढ़ने के साथ AI पर काम तेज हुआ. आज AI मशीन लर्निंग, डीप लर्निंग, रोबोटिक्स और नैचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग जैसे कई क्षेत्रों में इस्तेमाल हो रहा है, लेकिन इसकी शुरुआत सिर्फ एक शब्द और एक विचार से हुई थी.

आज के दौर में AI

आज AI हेल्थकेयर में बीमारी पहचानने से लेकर बैंकिंग में फ्रॉड पकड़ने तक काम कर रहा है. चैटबॉट, वॉइस असिस्टेंट और सेल्फ-ड्राइविंग कारें इसी तकनीक का हिस्सा हैं. आज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस हर जगह है मोबाइल से लेकर मेडिकल तक, कार से लेकर कोर्ट तक, सभी में काम कर रहा है.

यह भी पढ़ें: कैसे काम करता है एंटी बैलेस्टिक मिसाइल डिफेंस सिस्टम, जिसे डेवलप करने जा रहे भारत और इजरायल

About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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