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क्या पाइपलाइन बिछाकर रूस से क्रूड ऑयल मंगा सकता है भारत, जानें कितना मुश्किल है यह प्लान?

India Russia Oil Pipeline: मिडिल ईस्ट में चल रहे तनाव का असर होर्मुज स्ट्रेट से होने वाली तेल आपूर्ति पर भी पड़ा है. इसी बीच आइए जानते हैं क्या भारत रूस से डायरेक्ट पाइपलाइन बिछाकर तेल मंगा सकता है.

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  • मध्य पूर्व में तनाव के कारण भारत रूस से तेल आयात कर रहा है।
  • रूस से भारत तक पाइपलाइन हिमालय से गुजरना होगा, जो अत्यधिक कठिन है।
  • पाकिस्तान या चीन से गुजरने पर भू-राजनीतिक जोखिम और निर्भरता बढ़ेगी।
  • लंबी दूरी और निर्माण लागत के कारण जहाज ही सबसे व्यावहारिक विकल्प हैं।

India Russia Oil Pipeline: मिडिल ईस्ट खासकर होर्मुज स्ट्रेट के आसपास चल रहे तनाव ने भारत के पारंपरिक तेल आपूर्ति मार्गों को बाधित कर दिया है. खाड़ी देशों से इंपोर्ट पर असर पड़ने की वजह से भारत अपनी उर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए तेजी से रूस की तरफ रुख कर रहा है. इससे एक जाहिर सवाल खड़ा हो गया है. जहाजों पर निर्भर रहने के बजाय क्या भारत सीधे पाइपलाइन के जरिए रूस से कच्चा तेल इंपोर्ट कर सकता है? आइए जानते हैं क्या है इस सवाल का जवाब.

क्या पाइपलाइन के जरिए तेल इंपोर्ट किया जा सकता है? 

पाइपलाइन बिछाना सुनने में आसान लग सकता है लेकिन भूगोल कुछ और ही कहता है. कागज पर रूस से भारत तक पाइपलाइन  बिछाना एक सीधा सा समाधान लगता है. लेकिन असलियत काफी ज्यादा जटिल है. सबसे सीधे रास्ते के लिए हिमालय को पार करना होगा. यह पृथ्वी के सबसे कठिन इलाकों में से एक है. इतनी ज्यादा ऊंचाई और कठोर मौसम की स्थिति के बीच पाइपलाइन बनाना और उसका रखरखाव करना काफी बड़ी चुनौती होगी.

क्या है राजनीतिक जोखिम? 

अगर भारत हिमालय से बचने की कोशिश भी करता है तो पाइपलाइन को पाकिस्तान या फिर चीन जैसे देशों से होकर गुजरना पड़ेगा. इससे गंभीर भू राजनीतिक जोखिम पैदा होते हैं. पाकिस्तान और चीन दोनों के साथ भारत के संवेदनशील संबंध को देखते हुए एक जरूरी ऊर्जा जीवन रेखा के लिए उन पर निर्भर रहना लंबे समय तक चलने वाली रणनीतिक कमजोरी पैदा कर सकता है.

काफी ज्यादा लागत

भले ही रास्ते से जुड़ी समस्याएं हल हो जाएं, लेकिन इस तरह की परियोजना की लागत काफी ज्यादा होगी. अनुमानों के मुताबिक रूस भारत पाइपलाइन बनाने में 25 मिलियन डॉलर से ज्यादा का खर्चा आ सकता है. यह इसे दुनिया की सबसे महंगी ऊर्जा बुनियादी ढांचा परियोजना में से एक बना देगा. 

रूस के तेल समृद्ध क्षेत्र और भारत के बीच की दूरी काफी ज्यादा है. यह दूरी लगभग 4500 से 6000 किलोमीटर है. इतनी लंबी पाइपलाइन बनाना ना सिर्फ महंगा होता है बल्कि उन्हें चलाना भी खर्चीला होता है. पारगमन  शुल्क, रखरखाव और सुरक्षा इस रास्ते से पहुंचाए जाने वाले तेल की कुल लागत को काफी बढ़ा देंगे.

जहाज ही सबसे सही तरीका 

मौजूदा बाधाओं के बावजूद भी समुद्री परिवहन भारत के लिए सबसे ज्यादा व्यावहारिक विकल्प बना हुआ है. तेल टैंकर एक निश्चित पाइपलाइन की तुलना में काफी ज्यादा आसानी से रास्ते बदल सकता है. आपूर्ति की मात्रा को एडजस्ट करके भू राजनीतिक बाधाओं से बचा जा सकता है.

यह भी पढ़ें: कितनी ताकतवर है ईरान की मॉस्किटो फ्लीट, जानें किन हथियारों का करती है यह इस्तेमाल

स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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