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समुद्र में भी होते हैं कब्रिस्तान, भारत के इस राज्य में मौजूद है यह समुद्री मौत

समुद्र के बढ़ते तापमान और मरीन हीटवेव के कारण लक्षद्वीप की कोरल रीफ्स तेजी से नष्ट हो रही हैं. कोरल ब्लीचिंग से समुद्री जैव विविधता, तटीय सुरक्षा और लाखों जीवों के आवास पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है.

जब भी कब्रिस्तान का नाम आता है तो लोगों के मन में जमीन पर बने श्मशान या कब्रों के बारे में ही सोचते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि समुद्र के भीतर भी ऐसे “कब्रिस्तान” बन रहे हैं जहां लाखों जीवों का घर हमेशा के लिए खत्म होता जा रहा है. यहां बात हो रही है कोरल रीफ्स यानी मूंगे की चट्टानों की, जिन्हें समुद्र का जंगल भी कहा जाता है. वैज्ञानिकों का कहना है कि दुनिया के कई हिस्सों में कोरल रीफ्स का अस्तित्व खतरे में है और यह समुद्र के भीतर बनते एक बड़े कब्रिस्तान जैसा दृश्य पैदा कर रहा है. 

भारत के लक्षद्वीप में सबसे ज्यादा खतरा

भारत में यह संकट सबसे ज्यादा लक्षद्वीप के आसपास देखा जा रहा है. अरब सागर में बसे इस द्वीप समूह की पहचान उसकी खूबसूरत कोरल रीफ्स से होती है. लेकिन लंबे समय से चल रही समुद्री हीटवेव यानी समुद्र के पानी के असामान्य रूप से गर्म होने की वजह से यहां बड़े पैमाने पर कोरल ब्लीचिंग दर्ज की गई है. जहां पहले जीवंत चट्टानें लहराती थीं, वहां अब सफेद, निर्जीव मैदान बचे हैं. वैज्ञानिक इन्हें 'समुद्री कब्रिस्तान' कह रहे हैं. यह सिर्फ सुंदरता का नुकसान नहीं, बल्कि पूरी समुद्री जीवन व्यवस्था और मानव जीवन के लिए बड़ा खतरा है. ब्लीचिंग की स्थिति में कोरल अपना रंग खो देते हैं और सफेद पड़ जाते हैं. यदि तापमान लंबे समय तक अधिक बना रहे तो ये पूरी तरह मर भी सकते हैं. वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि लक्षद्वीप की कई रीफ्स गंभीर खतरे में हैं. 

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क्यों मर रहे हैं समुद्र के ये रंगीन जंगल?

समुद्री कब्रिस्तान शब्द उन कोरल रीफ्स के लिए इस्तेमाल हो रहा है जो तेजी से मर रही हैं. Down to Earth की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले 24 सालों में दुनिया भर में मूंगा आवरण में करीब 50% की भारी गिरावट आई है. 37.24% से घटकर यह 19.6% रह गया है. समुद्र का तापमान सामान्य से थोड़ा भी अधिक हो जाए तो कोरल तनाव में आ जाते हैं. पिछले कुछ वर्षों में लक्षद्वीप के आसपास समुद्री पानी का तापमान लगातार बढ़ता जा रहा है. जिससे बड़े पैमाने पर ब्लीचिंग हुई है. विशेषज्ञों के मुताबिक 1998, 2010, 2015 और उसके बाद भी कई बार ब्लीचिंग की घटनाएं सामने आईं है. कोरल रीफ देखने में पत्थर या पौधे जैसे लगते हैं, लेकिन ये जीवित प्राणी हैं.

इनमें छोटे-छोटे पॉलिप्स नामक जीव होते हैं जो कैल्शियम कार्बोनेट का कंकाल बनाते हैं. जब तापमान बढ़ता है तो ये शैवाल बाहर निकल जाते हैं और मूंगा सफेद होकर मरने लगता है इसे कोरल ब्लीचिंग कहते हैं. लेकिन हाल के वर्षों में इसका असर पहले से कहीं ज्यादा गंभीर देखा गया है. बता दें कि कई जगहों पर कोरल कवर में भारी गिरावट दर्ज की गई है, जो समुद्री जैव विविधता के लिए बड़ा खतरा है. 

मुख्य कारण बढ़ता समुद्री तापमान

समुद्र का तापमान 1-2 डिग्री बढ़ने पर कोरल तनाव में आ जाते हैं और ब्लीचिंग शुरू हो जाती है. लगातार गर्मी पड़ने से मरीन हीटवेव बनती है, जिससे ब्लीच हुए मूंगे मर जाते हैं. 2024 में लक्षद्वीप में 84.6% कोरल ब्लीचिंग दर्ज की गई.  इसके अलावा सीवेज, प्लास्टिक कचरा, कृषि उर्वरक और औद्योगिक रसायन कोरल को नुकसान पहुंचाते हैं. बढ़ती CO2 से समुद्र अम्लीय हो रहा है. मछलियां कम होने से शैवाल अनियंत्रित फैलते हैं और मूंगों को दबाते हैं. तटीय निर्माण, पर्यटन और गोताखोरी भी चोट पहुंचा रहे हैं. 4000 से ज्यादा मछली प्रजातियां कोरल पर निर्भर होती हैं. ये जीवों को आश्रय, भोजन और प्रजनन स्थान देते हैं. स्वस्थ रीफ लहरों की 97% ऊर्जा सोख लेते हैं और तटों को तूफानों से बचाते हैं. दुनिया भर में एक अरब से ज्यादा लोग इनसे सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हैं.

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