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दिल्ली में चुनाव से ठीक पहले AAP के कई विधायक हुए बागी , क्या इन पर भी लागू होगा एंटी डिफेक्शन लॉ?

दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले आम आदमी पार्टी को बड़ा झटका लगा है. आप के 7 विधायकों ने पार्टी छोड़ दी है. अब सवाल ये है कि क्या इन विधायकों के खिलाफ एंटी डिफेक्शन लॉ के तहत कार्रवाई हो सकती है?

दिल्ली विधानसभा चुनाव 2025 से पहले एक बार फिर से आम आदमी पार्टी को बड़ा झटका लगा है. दरअसल आम आदमी पार्टी के सात विधायकों ने पार्टी छोड़ दी है. बता दें कि विधायकों ने ऐसे समय पार्टी छोड़ी है, जब वोटिंग को महज सिर्फ 5 दिन ही बचे हैं. लेकिन अब सवाल ये है कि क्या चुनाव से पहले आप के इन विधायकों पर एंटी डिफेक्शन लॉ के तहत कार्रवाई हो सकती है. आज हम आपको इसके बारे में बताएंगे.

क्या है मामला

आम आदमी पार्टी के 5 विधायकों ने शुक्रवार को पार्टी से इस्तीफा दे दिया है. बता दें कि दिल्ली विधानसभा की सभी 70 सीटों के लिए 5 फरवरी को वोटिंग होनी है, जबकि वोटों की गिनती 8 फरवरी को होगी. हालांकि पार्टी छोड़ने वाले इन विधायकों को इस चुनाव में आप ने टिकट नहीं दिया था. पार्टी छोड़ने वाले भावना गौड़-पालम से, नरेश यादव-महरौली से,राजेश ऋषि-जनकपुरी से,मदन लाल-कस्तूरबा नगर से और रोहित महरौलिया-त्रिलोकपुरी,बी एस जून-बिज़वासन विधानसभा से,पवन शर्मा- आदर्श नगर विधानसभा से विधायक थे.

क्या है एंटी डिफेक्शन लॉ?

राजनीति में नेताओं का दल बदलना आम बात है. अक्सर चुनाव से पहले नेता कभी इस पाले से उस पाले में जाते हैं, कभी उस पाले से इस पाले में आते हैं. इसको रोकने के लिए ही 1985 में राजीव गांधी सरकार ने संविधान में 92वां संशोधन किया था. इस संशोधन में दल बदल विरोधी कानून यानी एंटी डिफेक्शन लॉ पारित किया था. दरअसल इस कानून का मकसद सियासी फायदे के लिए नेताओं के पार्टी बदलने और हॉर्स ट्रेडिंग रोकना था. इस कानून को संविधान की 10वीं अनुसूची में रखा गया है. जब कोई नेता पार्टी बदलता है या कोई ऐसी चाल चले, जिससे दूसरी पार्टी का नेता समर्थन करे तो इसे हॉर्स ट्रेडिंग कहा जाता है. आम बोलचाल की भाषा में इसे दल-बदलना या दल-बदलू भी कहा जाता है.

क्या हैं दल बदलने के लिए नियम?

बता दें कि अगर कोई विधायक या सांसद अपनी मर्जी से पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है,तो इस कारण उसकी सीट छिन सकती है. वहीं कोई विधायक या सांसद जानबूझकर मतदान से अनुपस्थित रहता है या फिर पार्टी द्वारा जारी निर्देश के खिलाफ जाकर वोट करता है, तो उसे अपनी सीट गंवानी पड़ सकती है. लेकिन अगर कोई निर्दलीय सांसद या विधायक किसी राजनीतिक पार्टी में शामिल हो जाते हैं, तो वे अयोग्य करार दिए जाएंगे. किसी विधायक या सांसद को अयोग्य घोषित करने का अधिकार विधानमंडल के सभापति या अध्यक्ष पीठासीन अधिकारियों द्वारा लिया जाता है.

कब लागू नहीं होता कानून?

इसके अलावा एंटी डिफेक्शन लॉ के तहत कुछ अपवाद भी हैं. इसके तहत सांसदों और विधायकों को दल-बदल विरोधी कानून का सामना नहीं करना पड़ता है. दरअसल किसी राजनीतिक दल के एक-तिहाई सांसद या विधायक इस्तीफा दे देते हैं, तो इस कानून के तहत कार्रवाई नहीं की जा सकती है. इसके अलावा अगर किसी पार्टी के दो-तिहाई सांसद या विधायक किसी अन्य पार्टी में शामिल हो जाते हैं, तो इस स्थिति में भी इसे दलबदल नहीं माना जाता है.

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