Aliganj Coaching Centre Fire: गर्मी में आग बुझाना क्यों होता है मुश्किल, क्यों नाकामयाब हो जाती हैं फायर ब्रिगेड की मशीनें?
Lucknow Aliganj Coaching Centre Fire: लखनऊ के पुरनिया में संचालित एक कोचिंग सेंटर में आग लगने से 14 बच्चों की दर्दनाक मौत हो गई है. चलिए जानें कि गर्मियों में आग बुझाना इतना मुश्किल क्यों होता है.

Lucknow Aliganj Fire In Coaching Centre: राजधानी लखनऊ के अलीगंज स्थित पुरनिया में एक कोचिंग सेंटर में आज दोपहर यानि 22 जून को लगी भीषण आग ने पूरे शहर को दहलाकर रख दिया है. एक बहुमंजिला इमारत में अचानक भड़की आग ने कुछ ही मिनटों में विकराल रूप ले लिया और 14 मासूम जिंदगियों को हमेशा के लिए खत्म कर दिया. जान गंवाने वाले सभी युवा करीब 20-24 साल के थे. इस दर्दनाक हादसे ने कई हंसते-खेलते परिवारों की जिंदगी तबाह कर दी है. इतनी ही नहीं इस हादसे ने यह सोचने पर भी मजबूर कर दिया है कि आखिर गर्मियों के दिनों में फायर ब्रिगेड की गाड़ियों के लिए आग पर काबू पाना इतना मुश्किल और पेंचीदा क्यों हो जाता है.
लपटों को हवा देती गर्मी की तपिश
इस दर्दनाक हादसे के बाद दमकल विभाग की कार्यप्रणाली और गर्मियों में आग बुझाने की चुनौतियों पर बड़ी बहस छिड़ गई है. दरअसल मई और जून के महीने में जब पारा 45 डिग्री के पार पहुंच जाता है, तब हवा में नमी पूरी तरह से खत्म हो जाती है. शुष्क मौसम की वजह से किसी इमारत में मौजूद लकड़ी, प्लास्टिक, पर्दे और बिजली के तार संवेदनशील हो जाते हैं. ऐसे में एक छोटी सी चिंगारी या शॉर्ट सर्किट भी पलक झपकते ही बम की तरह फटता है. हवा की तेज रफ्तार इस आग को और तेजी से फैलाती है, जिससे दमकलकर्मियों को शुरुआती मिनटों में आग की दिशा भांपने में मशक्कत करनी पड़ती है.
पानी का भाप बनकर तेजी से उड़ना
गर्मियों में इन दिनों आग बुझाने के दौरान फाय ब्रिगेड के सामने सबसे बड़ी चुनौती पानी के वाष्पीकरण की होती है. जब बाहर का तापमान पहले ही बहुत ज्यादा हो और आग का तापमान सैकड़ों डिग्री तक पहुंच जाए, तो दमकल की गाड़ियों से आग की लपटों पर फेंका जाने वाला पानी आग की सतह तक पहुंचने से पहले ही हवा में भाप बनकर उड़ने लगता है. सर्दियों के मुकाबले गर्मियों में आग को ठंडा करने के लिए लगभग दोगुने पानी और समय की जरूरत होती है. पानी की इस भारी किल्लत और लगातार रीफिलिंग की मजबूरी के कारण दमकल की गाड़ियां चाहकर भी तुरंत आग पर काबू नहीं पा सकती हैं.
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तंग गलियां और ट्रैफिक जाम
लखनऊ के अलीगंज और पुरनिया जैसे घनी आबादी वाले इलाकों में एक और बड़ी समस्या बुनियादी ढांचे की है. इन व्यवसायिक और आवासीय क्षेत्रों में सड़कें तंग हैं और सड़कों के किनारे बेतरतीब गाड़ियां खड़ी रहती हैं. आग लगने की खबर मिलते ही फायर ब्रिगेड के बड़े टैंकर और गाड़ियां मौके के लिए रवाना होती हैं तो उनको रास्ते में ट्रैफिक जाम के साथ-साथ संकरी गलियों का भी सामना करना होता है. फायर फाइटिंग के नियमों के अनुसार शुरुआती 10 मिनट सबसे कीमती होते हैं, जिनको गोल्डन आवर्स कहा जाता है. अगर गाड़ियां इसी वक्त जाम में फंसीं तो बड़े हादसे होने तय हैं.
हाइड्रेंट सिस्टम की नाकामी
किसी भी बड़े शहर में आग से निपटने के लिए सड़कों के किनारे फायर हाइड्रेंड लगाए जाते हैं, ताकि दमकल की गाड़ियां पानी खत्म होने पर भी वहीं से तुरंत टैंक भर सकें. लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि हमारे शहरों में या तो ये हाइड्रेंट काम नहीं करते हैं या फिर उनके ऊपर अवैध कब्जे हो चुके होते हैं. नतीजा यह होता है कि जब गर्मियों में भीषण आग में दमकल की गाड़ियों का पानी चंद मिनटों में खत्म हो जाता है, तो उनको पानी के लिए दूर जाना पड़ता है, जिससे समय की बर्बादी होती है और आग भयानक बेकाबू हो जाती है.
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