Cylinders Prices Reduced: घरेलू LPG सस्ता और कमर्शियल सिलेंडर इतना महंगा क्यों, कैसे तय होते हैं दाम; किससे ज्यादा कमाती है सरकार?
Cylinders Prices Reduced: भारत में हर महीने गैस के दामों में बढ़ोतरी या कटौती देखने को मिलती है. आज 1 जुलाई को भी सिलेंडर के दामों में कमी आई है, चलिए जानें कि घरेलू और कमर्शियल सिलेंडर के दामों में इतना फर्क क्यों है.

Cylinders Prices Reduced: भारत में हर महीने की पहली तारीख को एलपीजी सिलेंडर के दामों में कमी या बढ़ोतरी होती है. जुलाई की पहली तारीख से सरकार ने कमर्शियल सिलेंडर के दामों में कटौती की है. इसमें 183.50 रुपये घटाए गए हैं, जबकि घरेलू सिलेंडर की कीमतों में कोई फर्क नहीं आया है. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर घरेलू सिलेंडर के दाम कम और कमर्शियल सिलेंडर के दाम इतने महंगे क्यों होते हैं. चलिए इसे आसान भाषा में समझते हैं.
आयात की गई एलपीजी पर कितने बढ़ जाते हैं रुपये?
भारत अपने जरूरत की लगभग आधी एलपीजी गैस दूसरे देशों से खरीदता है. हमारे देश में गैस की बेस प्राइस इंपोर्ट पैरिटी प्राइस के फॉर्मूले से तय की जाती है, जो मुख्य रूप से सऊदी अरब की सरकारी तेल कंपनी की अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर निर्भर करती है. विदेशी बाजार डॉलर में गैस खरीदी जाती है, जिसके बाद उसमें समुद्री जहाज का किराया, इंश्योरेंस, कस्टम ड्यूटी और पोर्ट चार्ज जैसी चीजें शामिल होती हैं. चूंकि पूरा सौदा डॉलर में किया जाता है, इसलिए भारतीय रुपये के मुकाबले डॉलर की मजबूती या कमजोरी भी आपके सिलेंडर की कीमतों को तय करने में अहम भूमिका निभाती है.
कैसे तय होते हैं सिलेंडर के दाम?
जब गैस विदेशों से भारत में पहुंच जाती है तो सरकारी भारतीय गैस कंपनियां इसे देश के कोने-कोने में पहुंचाती हैं. इस चरण में एलपीजी में देश के अंदर का ट्रांसपोर्टेशन खर्चा, गैस को सिलेंडरों में भरने की लागत, कंपनियों का अपना मार्केटिंग का खर्चा और गैस एजेंसी के डीलरों का कमीशन भी जोड़ा जाता है. इसके बाद राज्यों और अलग-अलग शहरों के हिसाब से स्थानीय टैक्स और ढुलाई का खर्चा अलग होने के कारण एक ही सिलेंडर की कीमत देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग होती है.
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घरेलू और कमर्शियल सिलेंडर के दाम में फर्क क्यों?
अब सवाल उठता है कि घरेलू और कमर्शियल सिलेंडर के दाम में फर्क क्यों होता है? इसका सीधा कारण है कि कमर्शियल सिलेंडर का इस्तेमाल व्यावसायिक लाभ कमाने के लिए किया जाता है, इसलिए सरकार इस पर किसी भी तरह की सब्सिडी या फिर राहत नहीं देती है. तेल कंपनियां भी इसे पूरी तरह से खुले बाजार के नियमों के तहत बेचती हैं और इस पर अच्छा-खासा मुनाफा कमाती हैं. वैश्विक स्तर पर जब भी गैस की किल्लत होती है, तो इसका सीधा और सबसे पहला असर कमर्शियल सिलेंडर पर पड़ता है.
सिलेंडर पर टैक्स और सब्सिडी
सरकार की सबसे ज्यादा कमाई घरेलू सिलेंडर से नहीं बल्कि कमर्शियल सिलेंडर के जरिए होती है. इन दोनों के बीच टैक्स का एक बहुत बड़ा अंतर होता है. आम जनता के बजट को ध्यान में रखते हुए सरकार घरों में इस्तेमाल होने वाले 14.2 किलो के सिलेंडर पर सिर्फ 5% जीएसटी लगाती है और उज्जवला योजना जैसी स्कीमों के तहत अपनी जेब से सब्सिडी भी देती है, जिससे सरकार की शुद्ध कमाई हो सकती है. वहीं कमर्शियल सिलेंडर की बात करें तो सरकार इस पर 18% की ऊंची दर से भारी-भरकम जीएसटी वसूसती है. चूंकि इस पर कोई सब्सिडी नहीं देनी होती है, इसलिए हर कमर्शियल सिलेंडर की बिक्री से सरकार के खजाने में सीधा और बड़ा मुनाफा होता है.
तेल के दाम पर सरकारी नियंत्रण
भले ही गैस कंपनियां अंतरराष्ट्रीय बाजार के हिसाब से कीमतें तय करती हैं, लेकिन आम जनता को महंगाई के झटके से बचाना सरकार की जिम्मेदारी होती है. जब भी वैश्विक कारणों से गैस के दाम आम आदमी की पहुंच से बाहर होने लगते हैं तो सरकार बीच में दखल देती है. ऐसे में सरकार या तो तेल कंपनियों को घाटा सहने के लिए कहती है या फिर टैक्स की दरों को थोड़ा एडजस्ट करके घरेलू उपभोक्ताओं को सीधे राहत पहुंचाती है.
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