क्या यह US-इजरायल और ईरान में जंग नहीं, मुस्लिम और क्रिश्चियन का महायुद्ध? जानें ऐसा कहने की वजह
पश्चिम एशिया में युद्ध अब धार्मिक मोड़ ले रहा है. अमेरिकी सैनिकों ने शिकायत की है कि उन्हें 'आर्मगेडन' और 'ईश्वर की योजना' के नाम पर ईरान से लड़ने को उकसाया जा रहा है. आइए जानें कि ऐसा क्यों हो रहा है.

पश्चिम एशिया की धरती एक बार फिर बारूद के ढेर पर है, लेकिन इस बार धमाकों की गूंज के साथ-साथ धार्मिक नारों और प्राचीन भविष्यवाणियों का शोर भी सुनाई दे रहा है. इजरायल और अमेरिका द्वारा ईरान पर किए गए हालिया हवाई हमलों के बाद छिड़ी जंग अब महज दो देशों या गुटों के बीच का सैन्य टकराव नहीं रह गई है. अमेरिकी सेना के भीतर से उठ रही शिकायतों और नेताओं की तीखी बयानबाजी ने इस युद्ध को मुस्लिम बनाम ईसाई या 'ईश्वर की दिव्य योजना' के रूप में पेश करना शुरू कर दिया है. जब मिसाइलों के लक्ष्यों को 'आर्मगेडन' और 'भविष्यवाणियों' से जोड़ा जाने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि मामला कूटनीति की मेज से निकलकर आस्था की गलियों में भटक गया है. आइए जानें कि ऐसा क्यों कहा जा रहा है.
अमेरिकी सेना के भीतर 'ईसाई राष्ट्रवाद' और 'आर्मगेडन' की गूंज
हाल ही में अमेरिकी निगरानी समूह 'मिलिट्री रिलिजियस फ्रीडम फाउंडेशन' (MRFF) के पास 200 से अधिक अमेरिकी सैनिकों ने गंभीर शिकायत दर्ज कराई है. सैनिकों का आरोप है कि उन्हें ईरान के खिलाफ युद्ध में शामिल होने के लिए मजबूर करने हेतु बाइबिल की आयतों का सहारा लिया जा रहा है. अधिकारियों द्वारा उन्हें बताया जा रहा है कि यह युद्ध 'ईश्वर की दिव्य योजना' का हिस्सा है और यह दुनिया के अंतिम युद्ध यानी 'आर्मगेडन' की शुरुआत है.
आखिर क्या है आर्मगेडन?
बाइबिल की आखिरी किताब 'बुक ऑफ रिवेलेशन' में आर्मगेडन उस स्थान को कहा गया है, जहां दुनिया की अंतिम जंग होगी. हिब्रू भाषा में इसका अर्थ 'मेगिद्दो का पहाड़' है. सैनिकों के अनुसार, उनके कमांडरों का दावा है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को 'ईश्वर ने चुना है' ताकि वे ईरान में आग सुलगाकर ईसा मसीह की वापसी का मार्ग प्रशस्त करें. चौंकाने वाली बात यह है कि शिकायत करने वालों में केवल ईसाई ही नहीं, बल्कि मुस्लिम और यहूदी सैनिक भी शामिल हैं, जो सेना के भीतर बढ़ते इस ईसाई कट्टरपंथ से डरे हुए हैं.
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बयानबाजी में छिपा धार्मिक रंग
धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल केवल सेना के स्तर पर नहीं हो रहा, बल्कि इजरायल और अमेरिका के शीर्ष नेतृत्व ने भी इसे अपना हथियार बना लिया है. इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने ईरान की तुलना प्राचीन 'अमालेक' से की है, जिसे यहूदी परंपरा में बुराई का चरम माना जाता है. वहीं, अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो और रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ के बयानों में भी धार्मिक कट्टरपंथ की झलक मिल रही है.
रक्षा मंत्री हेगसेथ ने 'टेंपल माउंट' पर तीसरे मंदिर के पुनर्निर्माण की संभावना का जिक्र किया है, जो यरूशलेम की सबसे पवित्र मस्जिदों में से एक अल-अक्सा के अस्तित्व पर सवाल खड़ा करता है. हाल ही में इजरायली सैनिकों को 'टेंपल माउंट' के पैच वाली वर्दी पहने हुए भी देखा गया है. ये तमाम संकेत बताते हैं कि युद्ध को जानबूझकर एक धार्मिक पहचान दी जा रही है ताकि जनसमर्थन जुटाया जा सके.
पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव, ईरान का पलटवार और घेराबंदी
जंग की शुरुआत शनिवार को हुई जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमले किए. ईरान ने भी हार नहीं मानी और अपनी मिसाइलों का रुख इजरायल समेत उन खाड़ी मुल्कों की ओर कर दिया जहां अमेरिकी सैन्य अड्डे मौजूद हैं. बहरीन, सऊदी अरब, कतर, संयुक्त अरब अमीरात और इराक जैसे देशों में स्थित अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया गया है.
बुश का 'क्रूसेड' और आज की हकीकत
युद्धों को 'हम बनाम वे' की लड़ाई के रूप में पेश करना पुराना प्रोपेगेंडा है. 2001 में 9/11 हमलों के बाद जॉर्ज डब्लू. बुश ने भी आतंकवाद के खिलाफ जंग को 'क्रूसेड' (धर्मयुद्ध) कहा था, जिस पर भारी बवाल हुआ था. आज फिर वही मंजर दिखाई दे रहा है. ईसाई पादरी और कट्टरपंथी संगठन सोशल मीडिया पर वीडियो जारी कर रहे हैं कि ईरान पर हमला ईश्वर की इच्छा है और इजरायल की रक्षा स्वयं विधाता करेगा.
इस तरह की बयानबाजी से कूटनीतिक रास्ते बंद हो जाते हैं. यदि ईरान के शासकों को 'अधर्म' का प्रतीक और इजरायल-अमेरिका को 'देवदूत' माना जाएगा, तो कोई भी समझौता आत्मसमर्पण जैसा महसूस होता है. फिलहाल पश्चिम एशिया में बातचीत की उम्मीदें धुंधली पड़ चुकी हैं और धार्मिक कट्टरता की इस आग ने पूरे क्षेत्र को अपनी चपेट में ले लिया है.
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