क्या है थर्ड वर्ल्ड और यह कैसे बना, क्या इसमें शामिल हैं भारत और पाकिस्तान?
थर्ड वर्ल्ड शब्द का जन्म शीत युद्ध के दौरान उन देशों के लिए हुआ, जो न अमेरिका के साथ थे और न सोवियत संघ के साथ. फ्रांसीसी अर्थशास्त्री अल्फ्रेड सॉवी ने इसे शोषित और वंचित राष्ट्रों की ताकत बताया था.

थर्ड वर्ल्ड या तीसरी दुनिया यह एक ऐसा शब्द है जिसे अक्सर पिछड़ेपन या गरीबी से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस शब्द का जन्म किसी आर्थिक संकट से नहीं, बल्कि एक भीषण राजनैतिक टकराव से हुआ था? शीत युद्ध के दौर में जब पूरी दुनिया दो महाशक्तियों के पीछे खड़ी थी, तब कुछ देशों ने अपना अलग रास्ता चुना. आखिर ये तीसरी दुनिया कैसे बनी, इसमें कौन-कौन से देश शामिल थे और आज के आधुनिक युग में भारत जैसे उभरते देशों के लिए इस शब्द के क्या मायने रह गए हैं?
शीत युद्ध की कोख से उपजा थर्ड वर्ल्ड शब्द
द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद दुनिया स्पष्ट रूप से दो बड़े गुटों में बंट गई थी. एक तरफ अमेरिका के नेतृत्व वाला पूंजीवादी ब्लॉक था, जिसे प्रथम विश्व कहा गया. दूसरी तरफ सोवियत संघ के नेतृत्व वाला साम्यवादी यानी कम्युनिस्ट ब्लॉक था, जिसे द्वितीय विश्व का नाम दिया गया. इन दोनों गुटों के बीच वर्चस्व की लड़ाई को शीत युद्ध कहा जाता है. इसी दौर में वे देश जो न तो अमेरिका के पाले में थे और न ही सोवियत संघ के साथ, उन्हें तीसरी दुनिया या थर्ड वर्ल्ड कहा जाने लगा.
किसने दिया यह नाम?
थर्ड वर्ल्ड शब्द का इस्तेमाल पहली बार साल 1952 में फ्रांसीसी अर्थशास्त्री और जनसांख्यिकी विशेषज्ञ अल्फ्रेड सॉवी ने किया था. उन्होंने एक लेख में इस शब्द का जिक्र करते हुए इसकी तुलना फ्रांसीसी क्रांति के तीसरे एस्टेट (Third Estate) से की थी. जिस तरह क्रांति से पहले पादरियों और कुलीनों के प्रभुत्व के बीच सामान्य जनता (मजदूर, किसान) उपेक्षित थी, उसी तरह सॉवी ने इन नए देशों को नजरअंदाज की हुई और शोषित ताकत के रूप में देखा जो कुछ बनना चाहती थी. उनके लिए यह शब्द अपमानजनक नहीं, बल्कि एक उभरती हुई शक्ति का प्रतीक था.
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गुटनिरपेक्ष आंदोलन और भारत की बड़ी भूमिका
एशिया और अफ्रीका के वे देश जो हाल ही में यूरोपीय उपनिवेशवाद की बेड़ियों से आजाद हुए थे, वे किसी नए गुट का हिस्सा बनकर अपनी संप्रभुता खोना नहीं चाहते थे. भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, मिस्र के नासिर और युगोस्लाविया के टीटो ने मिलकर गुटनिरपेक्ष आंदोलन (Non-Aligned Movement - NAM) की नींव रखी. भारत इस तीसरी ताकत का नेतृत्व कर रहा था. ऐतिहासिक संदर्भ में देखें तो भारत और पाकिस्तान दोनों ही इस तीसरी दुनिया का हिस्सा थे, क्योंकि वे उस समय किसी भी महाशक्ति के औपचारिक सैन्य गुट का हिस्सा नहीं बनना चाहते थे.
बदलते समय के साथ बदल गए शब्द के मायने
20वीं सदी के उत्तरार्ध में थर्ड वर्ल्ड शब्द का अर्थ राजनीति से हटकर आर्थिक स्थिति पर केंद्रित हो गया है. इसे उन देशों के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा जो औद्योगिक रूप से पिछड़े थे, जहां गरीबी ज्यादा थी और बुनियादी ढांचा कमजोर था. धीरे-धीरे यह शब्द नकारात्मक और अपमानजनक माना जाने लगा. यही वजह है कि आज के कूटनीतिक दौर में सभ्य चर्चाओं में थर्ड वर्ल्ड की जगह ग्लोबल साउथ, विकासशील देश या निम्न एवं मध्यम आय वाले देश जैसे शब्दों का प्रयोग किया जाता है.
क्या आज भी भारत एक थर्ड वर्ल्ड देश है?
इस सवाल का जवाब नजरिए पर निर्भर करता है. यदि हम शीत युद्ध के ऐतिहासिक पैमाने को देखें, तो भारत निश्चित रूप से तीसरी दुनिया का हिस्सा था, लेकिन आज के आर्थिक परिदृश्य में भारत की छवि पूरी तरह बदल चुकी है. भारत अब दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शुमार है और चौथी बड़ी आर्थिक शक्ति बनने की ओर अग्रसर है. भारत अब लो-इनकम देशों की श्रेणी से बाहर आ चुका है. हालांकि, देश में मौजूद आर्थिक विषमता और गरीबी जैसी चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं, लेकिन वैश्विक मंच पर भारत अब एक उभरती हुई महाशक्ति है.
पाकिस्तान और अन्य पड़ोसी देशों की स्थिति
पाकिस्तान का इतिहास भी तीसरी दुनिया के देशों जैसा ही रहा है. आजादी के बाद उसने भी विकासशील देशों की श्रेणी में अपनी पहचान बनाई है. वर्तमान में पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और अफगानिस्तान जैसे देश अपनी आर्थिक चुनौतियों के कारण अभी भी विकासशील या कम विकसित देशों की सूची में आते हैं. पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था फिलहाल काफी कठिन दौर से गुजर रही है, जिससे वह तकनीकी रूप से उन मानकों के करीब है जिन्हें कभी 'तीसरी दुनिया' कहा जाता था. हालांकि, कूटनीतिक तौर पर पाकिस्तान भी अब खुद को 'ग्लोबल साउथ' का हिस्सा कहना पसंद करता है.
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