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ईरानियों ने आंखों पर पट्टी बांध कराई थी अमेरिकियों की परेड, उन्हें क्यों नहीं बचा पाया था US?

ईरान बंधक संकट अमेरिकी इतिहास का सबसे काला अध्याय है, जहां 52 अमेरिकियों को 444 दिनों तक तेहरान में कैद रखा गया था. ईरानियों ने बंधकों की आंखों पर पट्टी बांधकर उनकी परेड निकलवाई थी.

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  • ईरान में 1979 की क्रांति ने अमेरिकी दूतावास पर धावा बोला.
  • ईरानी छात्रों ने 52 अमेरिकियों को बंधक बनाकर शाह की मांग की.
  • अमेरिका के 'ऑपरेशन ईगल क्लॉ' बचाव प्रयास विफल रहा.
  • 444 दिनों बाद अल्जीयर्स समझौते से बंधकों की रिहाई हुई.

ईरान इजरायल और अमेरिका की जंग के बीच आज हम आपको ऐसे युद्ध के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसकी टीस हमेशा अमेरिका का महसूस होती रहेगी. इतिहास के पन्नों में और अमेरिका के कलेंडर में 4 नवंबर 1979 की तारीख एक ऐसे जख्म की तरह दर्ज है, जिसने दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति के अहंकार को चकनाचूर कर दिया था. तेहरान में अमेरिकी दूतावास पर ईरानी छात्रों के हमले और 52 अमेरिकियों को बंधक बनाए जाने की घटना ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति को हमेशा के लिए बदल दिया था. आंखों पर पट्टी बंधे अमेरिकी राजनयिकों की सरेआम परेड ने वाशिंगटन को शर्मसार कर दिया था. आखिर क्यों अमेरिका जैसा शक्तिशाली देश अपने नागरिकों को बचाने में पूरी तरह नाकाम रहा? चलिए जाने लेते हैं. 

ईरानी क्रांति और दूतावास पर धावा

साल 1979 में ईरान में इस्लामिक क्रांति अपने चरम पर थी. ईरान के शाह मोहम्मद रजा पहलवी को देश छोड़कर भागना पड़ा और सत्ता आयतुल्ला खामेनेई के हाथों में आ गई. जब कैंसर के इलाज के लिए अमेरिका ने शाह को शरण दी, तो ईरानी प्रदर्शनकारियों का गुस्सा फूट पड़ा. हजारों की संख्या में उग्र छात्रों ने तेहरान स्थित अमेरिकी दूतावास की दीवारों को फांदकर अंदर प्रवेश किया. उन्होंने वहां मौजूद 52 अमेरिकी नागरिकों को बंधक बना लिया और मांग की कि अमेरिका शाह को वापस ईरान के हवाले करे, ताकि उन पर मुकदमा चलाया जा सके.

आंखों पर पट्टी और दुनिया के सामने अपमान

बंधक बनाए गए अमेरिकियों के साथ ईरानियों का व्यवहार बेहद अपमानजनक था. दुनिया भर के कैमरों के सामने अमेरिकी राजनयिकों की आंखों पर पट्टी बांधकर उनकी परेड निकाली गई. उन्हें डराया गया और अमेरिका विरोधी नारे लगाने पर मजबूर किया गया. इन तस्वीरों ने अमेरिकी जनता को झकझोर कर रख दिया था. अमेरिका, जो खुद को दुनिया का पुलिसमैन कहता था, वह अपनी ही आंखों के सामने अपने अधिकारियों को लाचार देख रहा था. ईरान ने स्पष्ट कर दिया था कि यह हमला केवल एक दूतावास पर नहीं, बल्कि अमेरिकी नीतियों पर था.

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जिमी कार्टर का कूटनीतिक फेलियर

तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर के लिए यह संकट एक राजनीतिक दुःस्वप्न बन गया था. उन्होंने शुरू में आर्थिक प्रतिबंधों और कूटनीतिक बातचीत के जरिए बंधकों को छुड़ाने की कोशिश की, लेकिन ईरान टस से मस नहीं हुआ. कार्टर की शांतिपूर्ण नीति को अमेरिका के भीतर ही कमजोरी के रूप में देखा जाने लगा. ईरान ने अमेरिका की हर मांग को ठुकरा दिया और बंधकों को छोड़ने के बदले शाह की वापसी और अमेरिका में जमी हुई ईरानी संपत्ति को वापस करने की शर्त रख दी. कूटनीति की यह विफलता कार्टर के राष्ट्रपति पद के अंत की शुरुआत थी.

ऑपरेशन ईगल क्लॉ एक भयानक सैन्य त्रासदी

जब कूटनीति विफल हो गई, तो अमेरिका ने सैन्य विकल्प चुना. 24 अप्रैल 1980 को 'ऑपरेशन ईगल क्लॉ' नाम से एक बेहद गुप्त और जटिल रेस्क्यू मिशन शुरू किया गया. योजना थी कि अमेरिकी हेलीकॉप्टर और विमान ईरान के रेगिस्तान में उतरेंगे और वहां से कमांडो तेहरान पहुंचकर बंधकों को छुड़ाएंगे. लेकिन किस्मत ने अमेरिका का साथ नहीं दिया. रेगिस्तानी तूफान के कारण हेलीकॉप्टरों में तकनीकी खराबी आ गई और एक हेलीकॉप्टर एक टैंकर विमान से टकरा गया. इस हादसे में 8 अमेरिकी सैनिक मारे गए और मिशन को बीच में ही रद्द करना पड़ा.

सैन्य विफलता ने बढ़ाया ईरान का हौसला

रेस्क्यू मिशन की इस शर्मनाक विफलता ने ईरान के हौसले और बुलंद कर दिए. अमेरिकी सेना को बिना किसी दुश्मन के हमले के अपने सैनिकों और विमानों को ईरान के रेगिस्तान में छोड़कर भागना पड़ा. ईरानियों ने उन जले हुए विमानों और अमेरिकी सैनिकों के शवों की तस्वीरें पूरी दुनिया को दिखाईं. इस घटना ने यह साबित कर दिया कि अमेरिका अपनी सैन्य शक्ति के बावजूद ईरान की धरती पर घुसकर अपने लोगों को बचाने में अक्षम था. बंधकों की सुरक्षा को लेकर अमेरिका और भी ज्यादा दबाव में आ गया.

अल्जीयर्स समझौता और 444 दिनों का अंत

बंधकों की रिहाई के लिए अंततः कूटनीति का ही सहारा लेना पड़ा. महीनों की लंबी बातचीत के बाद 'अल्जीयर्स समझौता' हुआ. अमेरिका ईरान की संपत्ति को अनफ्रीज करने और ईरान के आंतरिक मामलों में दखल न देने पर सहमत हुआ. दिलचस्प बात यह है कि ईरान ने बंधकों को तब तक रिहा नहीं किया जब तक जिमी कार्टर ने राष्ट्रपति पद नहीं छोड़ा. 20 जनवरी 1981 को, जैसे ही रोनाल्ड रीगन ने राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली, उसके चंद मिनटों बाद ही 444 दिनों से कैद 52 अमेरिकियों को रिहा कर दिया गया.

इतिहास का सबसे लंबा बंधक संकट

यह संकट 444 दिनों तक चला, जो आधुनिक इतिहास में किसी राजनयिक मिशन पर किया गया सबसे लंबा हमला माना जाता है. इस घटना ने अमेरिका और ईरान के रिश्तों को इस कदर बिगाड़ा कि आज दशकों बाद भी दोनों देशों के बीच कट्टर दुश्मनी बनी हुई है. इस संकट ने न केवल एक अमेरिकी राष्ट्रपति का करियर खत्म किया, बल्कि वैश्विक राजनीति में 'इस्लामिक कट्टरपंथ' को एक नई और आक्रामक पहचान दी. अमेरिका के लिए यह एक ऐसा सबक था जिसे वह आज भी भूल नहीं पाया है.

क्यों बेबस रहा दुनिया का सबसे ताकतवर देश?

अमेरिका की बेबसी के पीछे कई कारण थे. पहला, ईरान में नई क्रांतिकारी सरकार का कोई स्पष्ट ढांचा नहीं था जिससे बात की जा सके. दूसरा, तेहरान के बीचों-बीच स्थित दूतावास में सैन्य ऑपरेशन करना बहुत जोखिम भरा था, क्योंकि बंधकों की जान जा सकती थी. तीसरा, सोवियत संघ के हस्तक्षेप का डर भी अमेरिका को बड़े सैन्य कदम उठाने से रोक रहा था. अंततः, भूगोल और खराब इंटेलिजेंस ने अमेरिका के रेस्क्यू मिशन को एक मलबे में तब्दील कर दिया, जिससे वह पूरी तरह लाचार नजर आया.

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About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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