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रेलवे प्लेटफॉर्म पर क्यों नहीं होते मेडिकल स्टोर? बड़ी दिलचस्प है इसके पीछे की वजह

रेलवे स्टेशनों पर अब अलग से दवा की दुकानें नहीं दिखतीं. बढ़ती भीड़ को नियंत्रित करने के लिए रेलवे ने पुराने नियमों को बदलकर अन्य दुकानों को मिलाकर 'मल्टी पर्पज स्टॉल' में बदल दिया है.

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  • भारतीय रेलवे प्लेटफॉर्म पर दवा की दुकानें आमतौर पर नहीं दिखतीं.
  • रेलवे ने भीड़ कम करने बहुउद्देशीय स्टॉल नीति अपनाई.
  • अब मल्टीपर्पस स्टॉलों पर सामान्य, आवश्यक दवाएं भी उपलब्ध हैं.
  • आपातकाल में प्राथमिक उपचार; बड़े स्टेशनों पर जन औषधि केंद्र.

भारतीय रेल से हर दिन करोड़ों लोग सफर करते हैं. आधुनिक होते दौर में आज रेलवे स्टेशनों के प्लेटफॉर्म पर यात्रियों के खाने-पीने से लेकर मनोरंजन और किताबों तक की सभी सुविधाएं आसानी से मिल जाती हैं. मगर क्या आपने कभी इस बात पर गौर किया है कि लगभग हर स्टेशन के प्लेटफॉर्म से दवाइयों की दुकानें गायब रहती हैं? शायद ही देश का कोई ऐसा रेलवे स्टेशन होगा जहां आपको अलग से कोई केमिस्ट शॉप नजर आए. इसके पीछे रेलवे का एक बेहद दिलचस्प फैसला और कड़ा नियम काम कर रहा है, जिसके बारे में आम मुसाफिर अनजान हैं.

क्या थे पुराने नियम?

स्टेशनों पर मेडिकल स्टोर न होने का मतलब यह कतई नहीं है कि यहां पहले कभी ऐसी दुकानें नहीं थीं. रेलवे के आधिकारिक दस्तावेजों के मुताबिक, साल 2001 में रेलवे बोर्ड ने बकायदा इसके लिए नीति बनाई थी. उस समय तय किया गया था कि जिन स्टेशनों पर डॉक्टर की सुविधा उपलब्ध है, वहां केमिस्ट स्टॉल के लिए ज्यादा से ज्यादा 108 वर्ग फुट की जगह दी जाएगी. वहीं, बुकस्टॉल के भीतर एक छोटा मेडिसिन कॉर्नर बनाने पर जगह की कोई पाबंदी नहीं थी. यानी पहले प्लेटफॉर्म पर अलग से दवा दुकानें अलॉट की जाती थीं.

भीड़ कम करने का नया फॉर्मूला

समय बदलने के साथ रेलवे ने अपनी नीति में बड़ा बदलाव किया और सिर्फ केमिस्ट की दुकान खोलने पर पूरी तरह रोक लगा दी. दरअसल, पहले प्लेटफॉर्म पर तीन अलग-अलग तरह की दुकानें होती थीं, जिनमें बुकस्टॉल, केमिस्ट स्टॉल और जनरल सामान की दुकानें शामिल थीं. इन अलग-अलग दुकानों के कारण प्लेटफॉर्म पर यात्रियों की भारी भीड़ जमा हो जाती थी और चलने-फिरने की जगह कम बचती थी. इसी भीड़भाड़ को नियंत्रित करने और जगह बचाने के लिए रेलवे ने कुछ साल पहले अपने नियमों को हमेशा के लिए बदल दिया.

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मल्टी पर्पज स्टॉल की एंट्री

नए नियमों के तहत रेलवे ने इन तीनों तरह की दुकानों को आपस में मिलाकर एक नया कॉन्सेप्ट पेश किया, जिसे 'मल्टी पर्पज स्टॉल' (MPS) कहा जाता है. अब रेलवे सिर्फ नई दवा दुकान के लिए प्लेटफॉर्म पर अलग से कोई जगह अलॉट नहीं करता है. इन मल्टी पर्पज स्टॉल्स पर ही यात्रियों को जरूरत की किताबें, मैगजीन और रोजमर्रा के सामान के साथ-साथ दवाइयां भी मिल जाती हैं. हालांकि, इन स्टॉल्स पर केवल वही आम दवाइयां बेची जा सकती हैं, जिन्हें खरीदने के लिए किसी डॉक्टर के पर्चे यानी प्रिस्क्रिप्शन की जरूरत नहीं होती है.

सिर्फ 21 स्टेशनों पर मेडिकल स्टोर

रेलवे की इस नई नीति का असर यह हुआ कि अब देश के गिने-चुने स्टेशनों पर ही पुराने नियमों वाले केमिस्ट स्टॉल बचे हैं. आंकड़ों के अनुसार, पूरे भारत में इस समय सिर्फ 21 रेलवे स्टेशन ऐसे हैं जहां अलग से स्वतंत्र मेडिकल स्टोर का संचालन हो रहा है. हालांकि, इस कमी को पूरा करने के लिए सरकार अब एक नई योजना पर काम कर रही है. इसके तहत देश के बड़े ए वन (A1) श्रेणी के स्टेशनों पर जन औषधि केंद्र खोले जा रहे हैं ताकि यात्रियों को सस्ती और जरूरी दवाइयां सीधे स्टेशन परिसर में मिल सकें.

इमरजेंसी में कैसे मिलेगी मदद

अगर सफर के दौरान या प्लेटफॉर्म पर किसी यात्री की तबीयत अचानक बिगड़ जाए, तो रेलवे के पास इसके लिए एक पुख्ता इमरजेंसी सिस्टम मौजूद है. रेलवे की तरफ से ट्रेन के टीटीई (TTE), गार्ड, ट्रेन सुपरिंटेंडेंट और स्टेशन मास्टर को प्राथमिक उपचार की विशेष ट्रेनिंग दी जाती है. सभी स्टेशनों पर एक मेडिकल बॉक्स हमेशा तैयार रहता है. इसके अलावा, स्टेशन मास्टर के पास पास के सरकारी और प्राइवेट अस्पतालों और डॉक्टरों की पूरी सूची फोन नंबर के साथ मौजूद होती है, जिससे तुरंत मदद बुलाई जा सकती है.

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About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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