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सिर्फ ईरान नहीं, इन देशों में भी हिजाब है मैंडेटरी, कानून तोड़ा तो मिलती है सख्त सजा

ईरान के अलावा दुनिया में कुछ देश ऐसे हैं, जहां हिजाब से शरीर को पूरी तरह से ढंकना कानूनी रूप से अनिवार्य है. वहीं कुछ देशों में अब महिलाओं को अपनी पोशाक चुनने की कानूनी आजादी है.

इजरायल और अमेरिका द्वारा ईरान पर किए गए हालिया हमलों के बीच व्यक्तिगत आजादी और हिजाब कानून एक बार फिर वैश्विक चर्चा का केंद्र बन गए हैं. अमेरिका और इजरायल ने अपने सैन्य हस्तक्षेप के पीछे ईरान की तानाशाही और महिलाओं पर थोपे गए सख्त ड्रेस कोड को एक बड़ी वजह बताया है. लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या दुनिया में सिर्फ ईरान ही ऐसा देश है, जहां हिजाब अनिवार्य है? हकीकत यह है कि ज्यादातर मुस्लिम देशों में यह एक सांस्कृतिक पसंद है, लेकिन कुछ मुल्कों में आज भी कानून की सख्ती बरकरार है.

तालिबान शासन और पूर्ण कवरेज का सख्त आदेश

मार्च 2026 की वैश्विक स्थिति को देखें तो ईरान के बाद अफगानिस्तान वह दूसरा देश है, जहां हिजाब और बुर्का न केवल अनिवार्य है, बल्कि इसे तोड़ने पर कठोर सजा का प्रावधान है. साल 2021 में सत्ता परिवर्तन के बाद तालिबान ने धीरे-धीरे महिलाओं की आजादी पर कड़े पहरे बिठा दिए हैं. 2022 के फरमानों और फिर 2024 के वर्च्यू एंड वाइस लॉ के तहत अब अफगान महिलाओं के लिए सार्वजनिक स्थानों पर अपना चेहरा और पूरा शरीर ढंकना कानूनी रूप से जरूरी है. यहां अस्पतालों, स्कूलों और सरकारी दफ्तरों में बिना पूर्ण कवरेज या बुर्के के प्रवेश वर्जित है, जो महिलाओं की सार्वजनिक उपस्थिति को लगभग खत्म कर चुका है.

इंडोनेशिया का आचे प्रांत

दुनिया के सबसे बड़े मुस्लिम आबादी वाले देश इंडोनेशिया में राष्ट्रीय स्तर पर हिजाब अनिवार्य नहीं है, लेकिन इसका आचे (Aceh) प्रांत एक बड़ा अपवाद है. आचे में विशेष शरिया कानून लागू है, जो मुस्लिम महिलाओं को सार्वजनिक स्थानों पर हिजाब और शालीन कपड़े पहनने के लिए कानूनी रूप से बाध्य करता है. यहां की शरिया पुलिस सड़कों पर गश्त करती है और नियमों का उल्लंघन करने वाली महिलाओं पर जुर्माना लगाने या उन्हें सजा देने का अधिकार रखती है. इंडोनेशिया के बाकी हिस्सों में महिलाएं अपनी पसंद के कपड़े पहनने के लिए स्वतंत्र हैं, लेकिन आचे की भौगोलिक और कानूनी स्थिति इसे ईरान और अफगानिस्तान की श्रेणी के करीब खड़ा करती है.

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सऊदी अरब की बदलती हवाएं और खत्म होती कानूनी अनिवार्यता

सऊदी अरब को कभी दुनिया का सबसे रूढ़िवादी देश माना जाता था, जहां अबाया और हिजाब के बिना घर से बाहर निकलना नामुमकिन था. हालांकि, 2018-2019 के बाद क्राउन प्रिंस के विजन 2030 के तहत यहां बड़े बदलाव हुए हैं. अब सऊदी अरब में महिलाओं के लिए अबाया पहनना कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं रह गया है. हालांकि वहां का समाज आज भी काफी पारंपरिक है और सार्वजनिक जगहों पर शालीन कपड़े पहनने की सलाह दी जाती है, लेकिन अब पुलिस किसी महिला को सिर्फ हिजाब न पहनने के लिए गिरफ्तार नहीं करती है. यहां कानूनी मजबूरी की जगह अब सामाजिक अपेक्षा ने ले ली है.

इराक और सीरिया

इराक में कोई भी ऐसा राष्ट्रीय कानून नहीं है जो महिलाओं को हिजाब पहनने के लिए मजबूर करता हो. नजफ और करबला जैसे धार्मिक शहरों में सम्मान के तौर पर हिजाब पहनने की उम्मीद की जाती है, लेकिन राजधानी बगदाद जैसे आधुनिक शहरों में महिलाएं बिना हेडस्कार्फ के भी आराम से घूमती हैं. वहीं सीरिया की बात करें तो असद शासन के दौरान भी यहां हिजाब कभी अनिवार्य नहीं था. 2024 के अंत में सत्ता परिवर्तन के बाद बनी नई अंतरिम सरकार ने तो अनिवार्य हिजाब पर स्पष्ट रूप से प्रतिबंध लगा दिया है, यानी अब वहां किसी को जबरन हिजाब पहनाने पर मनाही है, ताकि महिलाओं को अपनी पसंद की पोशाक चुनने की पूरी आजादी रहे.

सूडान और यमन

सूडान में 2019 की क्रांति के बाद बड़े कानूनी बदलाव हुए और शरिया के उन हिस्सों को हटा दिया गया जो महिलाओं के पहनावे पर सख्ती करते थे. अब वहां हिजाब पहनना कानूनी बाध्यता नहीं है. यमन की स्थिति थोड़ी जटिल है; वहां कोई लिखित राष्ट्रीय कानून तो नहीं है, लेकिन युद्धग्रस्त इलाकों और कबायली समाज में हिजाब या निकाब न पहनना लगभग असंभव है. यहां कानूनी सजा से ज्यादा सामाजिक बहिष्कार और सुरक्षा का खतरा महिलाओं को पर्दा करने पर मजबूर करता है. उत्तरी यमन के कुछ हिस्सों में, जहां हूती विद्रोहियों का नियंत्रण है, वहां ड्रेस कोड को लेकर सख्ती ईरान जैसी ही देखी जाती है.

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About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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