ईरान में जब सुप्रीम लीडर ही चलाते हैं देश तो राष्ट्रपति का क्या काम, जानें कौन-कौन से फैसले ले सकते हैं?
ईरान में राष्ट्रपति जनता द्वारा चुना तो जाता है, लेकिन असली सत्ता सुप्रीम लीडर के पास है. ज्यादातर मामले में अंतिम निर्णय सुप्रीम लीडर का होता है. आइए ईरान के राष्ट्रपति की ताकत के बारे में जानें.

ईरान और अमेरिका के बीच जारी सीधा संघर्ष दुनिया को दहला रहा है, लेकिन इस बीच तेहरान की राजनीतिक व्यवस्था भी चर्चा का केंद्र बनी हुई है. खुद को इस्लामिक गणराज्य कहने वाला ईरान एक ऐसी अनोखी व्यवस्था पर टिका है जहां चुनाव और धार्मिक सत्ता का अद्भुत मिश्रण है. यहां राष्ट्रपति जनता द्वारा चुना तो जाता है, लेकिन वह देश का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति नहीं होता है. अयातुल्ला खामेनेई की मौत और नए नेतृत्व के उभार के बीच यह समझना जरूरी है कि आखिर वह कौन सा संविधान है जो राष्ट्रपति की मौजूदगी के बावजूद सारी ताकत एक धार्मिक नेता की मुट्ठी में बंद रखता है और राष्ट्रपति कौन-कौन से काम करते हैं.
ईरानी क्रांति से उपजा सत्ता का हाइब्रिड मॉडल
ईरान की मौजूदा राजनीतिक संरचना 1979 की ईरानी क्रांति की कोख से निकली है. राजशाही खत्म होने के बाद एक ऐसा 'हाइब्रिड सिस्टम' बनाया गया जिसमें लोकतांत्रिक चुनाव तो हों, लेकिन उन पर धार्मिक नेतृत्व की कड़ी निगरानी बनी रहे. इस दोहरी व्यवस्था का मुख्य मकसद राजशाही की वापसी को रोकना और राजनीति में इस्लामी सिद्धांतों की सर्वोच्चता बनाए रखना था. यही कारण है कि यहां सरकार का चेहरा भले ही राष्ट्रपति हो, लेकिन रूह हमेशा सुप्रीम लीडर ही रहता है.
ईरान में राष्ट्रपति की भूमिका
ईरान में राष्ट्रपति का चुनाव सीधे जनता करती है और वह सरकार के दैनिक कामकाज के लिए जिम्मेदार होता है. ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्किन के पास कैबिनेट के संचालन, अर्थव्यवस्था के प्रबंधन और विदेशी कूटनीति में भूमिका निभाने की शक्ति होती है. राष्ट्रपति बजट तैयार करता है और आंतरिक प्रशासन को दिशा देता है. हालांकि, वह देश का सर्वोच्च अधिकारी नहीं, बल्कि दूसरा सबसे बड़ा पद है. उसकी शक्तियां कार्यकारी तो हैं, लेकिन वे एक तय सीमा के भीतर ही काम करती हैं.
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सुप्रीम लीडर सत्ता के शिखर पर बैठा 'ईश्वरीय' प्रतिनिधि
राष्ट्रपति की असली ताकत का रिमोट कंट्रोल हमेशा सुप्रीम लीडर के पास होता है. 1989 से अली खामेनेई ने इस पद को संभाला और अब उनकी मौत के बाद मुज्तबा खामेनेई नए सुप्रीम लीडर हैं. सुप्रीम लीडर को जनता सीधे नहीं चुनती, बल्कि 'असेम्बली ऑफ एक्सपर्ट्स' नामक धार्मिक संस्था इसका चयन करती है. सुप्रीम लीडर को 'छिपे हुए इमाम' का प्रतिनिधि माना जाता है और उसकी सत्ता को चुनौती देना ईश्वर की अवज्ञा के समान समझा जाता है. उसके आचरण पर न तो जनता का नियंत्रण है और न ही राज्य के अन्य अधिकारियों का.
सैन्य और सुरक्षा तंत्र पर पूर्ण नियंत्रण
राष्ट्रपति की सीमाओं का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देश के सशस्त्र बलों का सर्वोच्च कमांडर राष्ट्रपति नहीं, बल्कि सुप्रीम लीडर होता है. न्यायपालिका के प्रमुख की नियुक्ति हो या सरकारी मीडिया के सर्वेसर्वा का चयन, सब सुप्रीम लीडर ही तय करता है. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि 'इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स' (IRGC) जैसे शक्तिशाली सैन्य संगठन सीधे सुप्रीम लीडर को रिपोर्ट करते हैं. राष्ट्रपति सेना को आदेश देने या युद्ध की घोषणा करने का अधिकार नहीं रखता है, ये काम सुप्रीम लीडर के हैं.
विदेश नीति और परमाणु कार्यक्रम पर अंतिम मुहर
हालांकि राष्ट्रपति दुनिया भर के देशों के साथ कूटनीतिक बातचीत करता है, लेकिन रक्षा और विदेश नीति से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर अंतिम फैसला सुप्रीम लीडर का ही होता है. राष्ट्रपति नीति का मसौदा तो बना सकता है, लेकिन सुप्रीम लीडर के पास उसे 'वीटो' करने या बदलने की असीमित शक्ति है. परमाणु कार्यक्रम जैसे रणनीतिक मामलों में राष्ट्रपति केवल एक समन्वयक की भूमिका निभाता है, जबकि अंतिम दिशा-निर्देश धार्मिक सत्ता से ही आते हैं.
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Source: IOCL



























