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Baby Naming Laws: इन देशों में अपनी मर्जी से नहीं रख सकते बच्चों के नाम, सरकार ने बना रखी है नामों की सूची

Baby Naming Laws: दुनिया में कुछ ऐसे देश है जहां पर पेरेंट्स को अपने बच्चों के नाम खुद रखने की इजाजत नहीं है. आइए जानते हैं कौन से है वे देश और क्यों बनाया गया यह नियम.

Baby Naming Laws: अपने बच्चों का नाम चुनना आमतौर पर माता-पिता के लिए सबसे पर्सनल और इमोशनल फैसलों में से एक होता है. लेकिन दुनिया के कई देशों में बच्चे का नाम रखना सिर्फ पारिवारिक मामला नहीं होता बल्कि एक कानूनी प्रक्रिया भी है. इन जगहों पर माता-पिता को सरकार द्वारा अप्रूव्ड लिस्ट में से ही नाम चुनना होता है. आइए जानते हैं कौन से हैं वे देश.

डेनमार्क 

डेनमार्क में बच्चे का नाम रखने का फैसला पर्सनल नाम पर कानून द्वारा तय होता है. सरकार लगभग 7000 अप्रूव्ड पहले नामों की लिस्ट रखती है. इसमें लड़के और लड़कियों के लिए अलग-अलग लिस्ट होती है. माता-पिता को स्पेलिंग बनाने या फिर अपनी मर्जी से  सामान्य नाम चुनने की इजाजत नहीं होती. अगर कोई पसंदीदा नाम लिस्ट में नहीं है तो माता-पिता को लोकल चर्च और सिविल अधिकारियों दोनों से खास इजाजत के लिए अप्लाई करना होता है.

आइसलैंड 

आइसलैंड में नाम रखने के कानून आइसलैंडिक भाषा की रक्षा के लिए बनाए गए हैं. आइसलैंडिक नेमिंग कमेटी सभी नामों की समीक्षा करती है. ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि यह पक्का हो सके कि उन्हें आइसलैंडिक ग्रामर के मुताबिक बदला जा सके और आइसलैंडिक अल्फाबेट कस्टमर करके लिखा जा सके. यहां पर नेगेटिव मतलब वाले या फिर पुरानी कहानियों से जुड़े हुए नाम को भी बच्चों को मनोवैज्ञानिक या सांस्कृतिक नुकसान से बचने के लिए मंजूर नहीं किए जाते.

जर्मनी 

जर्मनी में सरकार बच्चों के सबसे अच्छे हित को प्राथमिकता देती है. लोकल रजिस्ट्रेशन ऑफिस के पास ऐसे नामों को रिजेक्ट करने का अधिकार है जो साफ तौर पर जेंडर नहीं बताते. इसी के साथ वे उन नाम को भी रिजेक्ट कर देते हैं जो शर्मिंदगी का कारण बन सकते हैं या फिर सरनेम, ब्रांड या चीजों जैसे लगते हैं. जैसे अगर किसी बच्चे का नाम किसी मशहूर राजनीतिक सरनेम पर रखा गया है या फिर बिना किसी स्पष्टीकरण के जेंडर न्यूट्रल नाम हो तो उसे रिजेक्ट कर दिया जाता है. 

सऊदी अरब 

सऊदी अरब में बच्चों के नाम इस्लामी मूल्यों और लोकल संस्कृति के हिसाब से रेगुलेट किए जाते हैं. सरकार ने ऐसे नामों पर बैन लगा दिए हैं जिन्हें आपत्तिजनक या फिर विदेशी कल्चर से काफी ज्यादा जुड़ा हुआ माना जाता है. पश्चिमी नाम और दूसरे धर्म से जुड़े हुए नामों को सीधे तौर पर रिजेक्ट किया जा सकता है.

सरकारें बच्चों के नामों को क्यों कंट्रोल करती हैं

इन सभी देशों में एक ही तर्क इस्तेमाल किया जाता है. सरकारों का यह तर्क है कि नामकरण कानून बच्चों को जीवन भर के मजाक से बचाने, सांस्कृतिक और भाषाई विरासत की रक्षा करने और ऑफिशियल रिकॉर्ड में स्पष्ट को बनाए रखने के लिए बनाया गया है.

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स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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