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Bihar Assembly Elections: बिहार का जंगलराज तो सुना होगा, लालू यादव के शासन को कैसे मिला था यह तमगा?

Bihar Assembly Elections: बिहार के विधानसभा चुनाव से पहले एक बार फिर जंगल राज की चर्चाओं को हवा मिल चुकी है. आइए जानते हैं की लालू यादव के शासनकाल को कैसे मिला था यह तमगा.

Bihar Assembly Elections: बिहार विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक सरगर्मी में बढ़ चुकी है. इसी बीच बिहार के कुख्यात जंगल राज की चर्चा एक बार फिर से सामने आ रही है. राज्य के राजनीतिक शब्दकोश में काफी गहराई से समय हुआ यह शब्द 1990 से 1997 तक लालू प्रसाद यादव के शासनकाल के लिए इस्तेमाल किया जाता है. आइए जानते हैं उन परिस्थितियों के बारे में जिन्होंने इस विवादास्पद लेबल को जन्म दिया.

कहां से आया जंगल राज शब्द 

जंगल राज शब्द का इस्तेमाल सबसे पहले 1997 में जस्टिस वीपी सिंह और जस्टिस धर्मपाल सिन्हा की पटना हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने किया था. दरअसल उस वक्त अदालत में एक सामाजिक कार्यकर्ता कृष्णा सहाय की तरफ से दाखिल एक याचिका पर सुनवाई चल रही थी. 

ऐसा कहा जाता है कि उस सुनवाई के दौरान जजों ने कहा था कि यह जंगल राज से भी बुरा है और इसमें अदालत के फैसलों और जनहित के प्रति कोई सम्मान नहीं है. अदालत के ऐसा कहने के बाद से ही जंगल राज को लालू प्रसाद यादव के शासन से जोड़कर देखा जाने लगा.

बिहार का बदलता राजनीतिक परिदृश्य 

लालू प्रसाद यादव 1990 में सामाजिक न्याय और पिछड़े वर्ग के सशक्तिकरण की लहर पर सवार होकर सत्ता में आए थे. उनका नारा 'बिहार में रहना है तो लालू यादव कहना है' समुदायों के बीच उनकी लोकप्रियता को दर्शाता था. लेकिन जैसे-जैसे उनका कार्यकाल आगे बढ़ता गया बिहार में कानून व्यवस्था खराब होती गई. बस यहीं से जंगल राज के लेबल का जन्म हुआ.

नागरिकों में अनियंत्रित अपराध और भय

1990 के दशक में अपहरण, जबरदस्ती की वसूली, लूट और हत्या जैसे अपराधी गतिविधियों में तेजी से बढ़ोतरी देखने को मिली. बिहार अपराध के राजनीतिक संरक्षण का पर्याय बन चुका था, जहां कुख्यात लोगों को बड़े राजनीतिक नेताओं का साथ मिला हुआ था. व्यवसायी और पेशेवर लोग अपहरण के भय में रहते थे और पुलिस को भी शक्तिहीन या फिर मिलीभगत वाला माना जाता था. बे-लगाम अपराध की इस संस्कृति ने बिहार को जंगल राज की छवि दिलाने में एक बड़ी भूमिका निभाई. 

कानून व्यवस्था का पतन 

इस दौरान कानून परिवर्तन एजेंसियां काफी कमजोर हो चुकी थी. पुलिस और प्रशासनिक व्यवस्था पर अक्सर राजनीतिक दबाव में काम करने के आरोप लगते रहते थे और साथ ही अधिकारी बड़े अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई करने से डरते थे. रिपोर्ट्स के मुताबिक जो अधिकारी सख्त रुख अपनाने की कोशिश करते थे उनका तबादला कर दिया जाता था या फिर उन्हें दरकिनार कर दिया जाता था.

ठहरा हुआ विकास और आर्थिक पतन 

जिस तरफ बाकी भारतीय राज्य प्रगति कर रहे थे वहीं बिहार पिछड़ रहा था. बुनियादी ढांचा परियोजनाएं, सड़के और जन कल्याणकारी योजनाएं या तो रुक चुकी थीं या फिर विफल हो चुकी थीं. राज्य की अर्थव्यवस्था धीमी हो गई थी और शिक्षा की गुणवत्ता के साथ-साथ स्वास्थ्य सेवाएं भी बदहाल हो गई थी. 

दशकों बाद भी जंगल राज शब्द बिहार के राजनीतिक विमर्श को आकर दे रहा है. बिहार के इस विधानसभा चुनाव में सभी पार्टियां जंगल राज को एक बड़ा चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश में लगी हुई हैं. इससे साफ जाहिर होता है कि कितना ही वक्त क्यों ना बीत जाए लेकिन जंगल राज शब्द बिहार की राजनीतिक जड़ों में काफी गहराई तक समाया हुआ है.

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स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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