हुस्न की आड़ में करती थी जासूसी, फिर यूं बेनकाब हुआ जर्मनी की जासूस का हनीट्रैप
प्रथम विश्व युद्ध में अपने हुस्न का इस्तेमाल कर जर्मनी के लिए जासूसी करने वाली डांसर माता हारी इतिहास की पहली चर्चित हनीट्रैप एजेंट मानी जाती हैं. चलिए इनके बारे में विस्तार से जानें.

कुछ वक्त पहले दिल्ली में IAF विंग कमांडर के हनीट्रैप में फंसने का मामला सामने आया था. जासूसी और हनीट्रैप की दुनिया का जब भी जिक्र होता है, तो सबसे पहला नाम इतिहास की रहस्यमयी डांसर माता हारी का सामने आता है. दिल्ली में हाल ही में सामने आए वायुसेना अधिकारी के हनीट्रैप मामले ने इस पुराने इतिहास को फिर ताजा कर दिया है. प्रथम विश्व युद्ध के दौरान फ्रांस और जर्मनी के बीच अपने हुस्न से गोपनीय सैन्य जानकारियां निकालने वाली माता हारी को दुनिया की पहली सबसे चर्चित हनीट्रैप जासूस माना जाता है. डच मूल की इस डांसर ने यूरोपीय अधिकारियों को अपने हुस्न के जाल में फंसाकर जासूसी का एक नया अध्याय लिखा था.
कौन थी माता हारी?
माता हारी का असली नाम मार्गरेथा गीरत्रुइदा जेले था, जिनका जन्म 1876 में नीदरलैंड्स में हुआ था. कम उम्र में एक डच सैन्य अधिकारी से शादी के बाद वह इंडोनेशिया चली गईं. दो बच्चों की मां बनने के बावजूद उनका वैवाहिक जीवन टूट गया. इसके बाद 29 साल की उम्र में 1905 में वह पेरिस पहुंचीं. वहां उन्होंने खुद को भारतीय मंदिर में पली-बढ़ी डांसर बताकर 'माता हारी' नाम रख लिया. हालांकि, भारत से उनका कोई पारिवारिक रिश्ता नहीं था, यह केवल लोगों को आकर्षित करने का एक काल्पनिक जरिया था.
बोल्ड डांस स्टाइल और यूरोप के उच्च वर्ग में दबदबा
पेरिस में माता हारी ने एक बोल्ड डांस शैली की शुरुआत की, जिसमें वह प्रस्तुति के दौरान धीरे-धीरे अपने कपड़े उतारती थीं. वह खुद मानती थीं कि वह बहुत अच्छी डांसर नहीं हैं, लेकिन सार्वजनिक रूप से ऐसा साहस दिखाने वाली पहली महिला होने के कारण लोग उन्हें देखने आते थे. तीन सालों के भीतर 1908 तक वह यूरोप की मशहूर स्टार बन गईं. पेरिस, बर्लिन और मैड्रिड के उच्च सैन्य अधिकारियों और अमीर पुरुषों के बीच उनकी पहुंच बेहद आसान हो गई, जिससे वह एक प्रभावशाली हस्ती बन गईं.
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प्रथम विश्व युद्ध, आर्थिक तंगी और ऐसे बनी जासूस
वर्ष 1914 में प्रथम विश्व युद्ध की शुरुआत होते ही 40 साल की माता हारी के डांस शो बंद हो गए. जर्मनी में मौजूद उनके बैंक खाते जब्त हो गए, जिससे वह आर्थिक तंगी में फंस गईं. नीदरलैंड्स की नागरिकता के कारण उन्हें यूरोप में यात्रा की छूट थी. इसी का फायदा उठाते हुए 1915 में जर्मन काउंसुल कार्ल क्रोमर ने उनसे संपर्क किया और जासूसी के लिए 20,000 फ्रैंक की पेशकश की. माता हारी ने यह रकम ले ली, जिसे बाद में उन्होंने अपनी जब्त संपत्ति का मुआवजा बताया.
जर्मनी का कोड नेम H-21 और फ्रांस का जासूसी दांव
जर्मनी ने माता हारी को अपनी सीक्रेट फाइलों में कोड नेम H-21 दिया था. 1916 में फ्रांसीसी खुफिया एजेंट जॉर्ज लाडू ने शक होने पर उन्हें फ्रांस के लिए जासूसी का प्रस्ताव दिया. इसके बाद वह स्पेन गईं, जहां उनके संबंध जर्मन मेजर काले से बने. इसी दौरान फ्रांसीसी अधिकारियों ने बर्लिन भेजे गए एक एनक्रिप्टेड जर्मन मैसेज को पकड़ लिया, जिसमें एजेंट H-21 यानी माता हारी द्वारा दी गई गोपनीय जानकारियों का स्पष्ट उल्लेख था.
गिरफ्तारी, देशद्रोह का मुकदमा और फांसी
फरवरी 1917 में फ्रांस लौटते ही पेरिस के एक होटल से माता हारी को गिरफ्तार कर लिया गया. फ्रांसीसी अधिकारियों का दावा था कि उनकी जानकारियों के कारण हजारों सैनिकों की मौत हुई. 24 जुलाई 1917 को उन पर सैन्य अदालत में मुकदमा चला. पूछताछ में उन्होंने माना कि उन्होंने जर्मन अधिकारियों से पैसे लिए और कई पुरुषों से संबंध बनाए, लेकिन कभी फ्रांस के साथ गद्दारी से इनकार किया. इसके बावजूद अदालत ने उन्हें देशद्रोही ठहराते हुए मौत की सजा सुनाई.

मुस्कराते हुए सीने पर खाईं गोलियां
15 अक्टूबर 1917 को फ्रांस की जेल के बाहर 41 साल की माता हारी को फायरिंग स्क्वाड के सामने लाया गया. अपनी जिंदगी के आखिरी पलों में उन्होंने आंखों पर पट्टी बांधने से साफ इनकार कर दिया. वह फायरिंग स्क्वाड के 12 सैनिकों के सामने मुस्कराते हुए निडर होकर खड़ी रहीं और सीने पर गोलियां खाईं. इस तरह इतिहास की पहली और सबसे चर्चित हनीट्रैप जासूस की रहस्यमयी जिंदगी का अंत हो गया.
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