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पराली से भी बन सकता है टॉप क्वालिटी का कागज, जानें इससे कितने पेड़ कटने से बचेंगे?

अगर पंजाब-हरियाणा और वेस्ट यूपी की सारी पराली को कागज बनाने में इस्तेमाल कर लिया जाए तो दिल्ली-एनसीआर से पॉल्यूशन की समस्या करीब 60 पर्सेंट तक कम हो सकती है.

सर्दियों के दौरान दिल्ली-एनसीआर के लोग हर साल स्मॉग से जूझते नजर आते हैं और हालात खराब करने का आरोप बार-बार पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों पर लगता है, जो धान कटाई के बाद बची पराली को खेतों में ही जला देते हैं. इससे उठने वाले धुएं से दिल्ली-एनसीआर जहरीली चादर से ढंक जाता है. क्या आप जानते हैं कि यही पराली अब कागज बनाने के काम भी आ सकती है? अगर यह प्रक्रिया पूरी तरह चालू कर दी जाए तो दिल्ली-एनसीआर पर छाने वाला स्मॉग कितना कम हो सकता है और इससे कितने पेड़ बच सकते हैं? 

पराली से कैसे बनता है कागज?

इंडियन एग्रो एंड रीसाइकिल्ड पेपर मिल्स असोसिएशन के अध्यक्ष प्रमोद अग्रवाल के मुताबिक, पराली से कागज बनाने की तकनीक नई नहीं है, लेकिन पिछले 4-5 साल में इसका प्रोफेशनलाइजेशन काफी तेजी से बढ़ा है. पंजाब और हरियाणा में कई ऐसी कंपनियां हैं, जो कागज बनाने के लिए 30 से 50 पर्सेंट तक पराली इस्तेमाल कर रही हैं. यह बात उन्होंने दिल्ली के यशोभूमि कंवेंशन सेंटर में आयोजित पेपरेक्स 2025 के 17वें एडिशन में कही, जहां देश की पेपर इंडस्ट्री में मौजूद अपार संभावनाओं के बारे में जानकारी दी गई.

उन्होंने बताया कि अगर पंजाब-हरियाणा और वेस्ट यूपी की सारी पराली को कागज बनाने में इस्तेमाल कर लिया जाए तो दिल्ली-एनसीआर से पॉल्यूशन की समस्या करीब 60 पर्सेंट तक कम हो सकती है. उन्होंने बताया कि कागज उद्योग 3 रुपये प्रति किलो के हिसाब से पराली खरीद रहा है, लेकिन पेपर इंडस्ट्री को सरकार का सपोर्ट नहीं मिल रहा है, जिसकी वजह से देशभर की 900 में से 200 मिल बंद हो चुकी हैं.

भारत में कागज की खपत कितनी?

इंडियन पेपर मैन्युफैक्चरर्स असोसिएशन (आईपीएमए) के अध्यक्ष पवन अग्रवाल ने बताया कि कागज के आयात में लगातार इजाफा हो रहा है. खासकर चीन और आसियान से घरेलू कागज उद्योग को नुकसान हो रहा है. क्षमता और स्थिरता संबंधी पहल में काफी इनवेस्टमेंट करने के बाद भी भारतीय कागज निर्माता कम उपयोग वाले संयंत्रों से जूझ रहे हैं. वहीं, इंफॉर्मा मार्केट्स इन इंडिया के एमडी योगेश मुद्रास ने कहा कि भारत में कागज की प्रति व्यक्ति खपत 15 किग्रा है, जबकि इसका ग्लोबल एवरेज 57 किग्रा प्रति व्यक्ति से ज्यादा है. ऐसे में अनुमान है कि 2028 तक यह मार्केट 16.64 बिलियन डॉलर का हो सकता है. 

एक टन पराली से कितना बनता है कागज?

उन्होंने बताया कि तकनीकी रूप से पराली में सेलुलोज की मात्रा लकड़ी के बराबर ही होती है. क्राफ्ट प्रोसेस की मदद से पराली को 8-10 घंटे सोडियम हाइड्रॉक्साइड और सोडियम सल्फाइड के साथ 160-170 डिग्री पर पकाया जाता है. इससे लिग्निन अलग हो जाता है और प्योर फाइबर बचता है. इस हिसाब से देखा जाए तो एक टन सूखी पराली से लगभग 400-450 किलो क्राफ्ट पेपर बन जाता है, जो पैकेजिंग, नोटबुक और कार्टन बनाने में इस्तेमाल होता है. इससे 2.5 से 3 टन लकड़ी बच सकती है. 

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