कैसे तय होते हैं चीनी के दाम, सरकार के हाथ में क्या-क्या?
सरकार गन्ने का न्यूनतम मूल्य और मिलों का मासिक बिक्री कोटा तय कर चीनी की कीमतों को नियंत्रित रखती है, ताकि बाजार में मांग-आपूर्ति का संतुलन बना रहे और उपभोक्ताओं को सही दाम पर चीनी मिले.

भारत में चीनी सिर्फ एक खाद्य पदार्थ नहीं, बल्कि यह देश की राजनीति और आम जनता की जेब से जुड़ा एक बेहद संवेदनशील मुद्दा है. त्योहारों का सीजन आते ही अक्सर बाजार में चीनी की कीमतें चर्चा का विषय बन जाती हैं.
हाल ही में केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने साफ कहा कि चीनी जैसे कृषि उत्पादों की कीमतें अब मुख्य रूप से वैश्विक मांग और आपूर्ति के आधार पर तय होती हैं और इसमें सरकार की भूमिका सीमित रह गई है. हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि सरकार के पास कोई ताकत ही नहीं बची. आइए समझते हैं कि यह पूरा सिस्टम कैसे काम करता है.
गन्ने की कीमत से शुरू होता है खेल
चीनी के दाम की पूरी कहानी गन्ने की कीमत से शुरू होती है. हर साल केंद्र सरकार गन्ने का उचित और लाभकारी मूल्य यानी FRP तय करती है, जो चीनी मिलों को किसानों को देना अनिवार्य होता है. चीनी सीजन 2026-27 के लिए सरकार ने यह कीमत 365 रुपये प्रति क्विंटल तय की है, जो 2019-20 में सिर्फ 275 रुपये थी. गन्ने की लागत बढ़ने का सीधा असर चीनी की कीमत पर भी पड़ता है, क्योंकि चीनी मिलों को अपनी उत्पादन लागत निकालनी होती है.
न्यूनतम बिक्री कीमत तय करने का अधिकार
सरकार के पास चीनी नियंत्रण आदेश 2025 के तहत चीनी की न्यूनतम बिक्री कीमत तय करने का अधिकार है, यानी इससे कम पर मिलें चीनी नहीं बेच सकतीं. हालांकि यह अधिकार अब तक सिर्फ दो बार ही इस्तेमाल किया गया है. इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि चीनी मिलें घाटे में चीनी न बेचें, ताकि वे किसानों को गन्ने का पूरा भुगतान समय पर कर सकें.
आयात-निर्यात पर है सरकार का नियंत्रण
जब घरेलू बाजार में चीनी की सप्लाई कम हो जाती है और दाम बढ़ने लगते हैं, तो सरकार बिना ड्यूटी के चीनी आयात की अनुमति देकर बाजार में सप्लाई बढ़ा सकती है, जिससे कीमतों पर दबाव कम होता है. इसके उलट अगर घरेलू बाजार में चीनी ज्यादा हो और कीमतें गिरने लगें, तो सरकार निर्यात को बढ़ावा देकर या उस पर रोक लगाकर भी बाजार को संतुलित करने की कोशिश करती है.
इथेनॉल डायवर्जन भी है एक अहम फैक्टर
गन्ने और चीनी का एक हिस्सा अब इथेनॉल बनाने में भी इस्तेमाल होता है, जो पेट्रोल में मिलाया जाता है. हालांकि सरकार का कहना है कि मौजूदा दाम बढ़ने की वजह मुख्य रूप से इथेनॉल के लिए चीनी का डायवर्जन नहीं है, बल्कि कम उत्पादन, त्योहारी सीजन की बढ़ी मांग, मौसम की मार और कुछ कारोबारियों की जमाखोरी जैसे कारण ज्यादा जिम्मेदार हैं. फिर भी सरकार चाहे तो इथेनॉल की तरफ मोड़े जाने वाले गन्ने और चीनी की मात्रा को नियंत्रित करके भी बाजार में सप्लाई को प्रभावित कर सकती है.
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आखिर में तय करता है ग्लोबल मार्केट
इन सभी घरेलू कारणों के बावजूद, ब्राजील जैसे बड़े चीनी उत्पादक देशों में उत्पादन घटने-बढ़ने का सीधा असर वैश्विक कीमतों पर पड़ता है और भारत जैसे बड़े बाजार भी इससे प्रभावित होते हैं. यही वजह है कि सरकार गन्ने की कीमत, न्यूनतम बिक्री दर, आयात-निर्यात नीति और स्टॉक लिमिट जैसे औजारों से बाजार को संतुलित रखने की कोशिश तो करती है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मांग-आपूर्ति के दबाव को पूरी तरह नियंत्रित नहीं कर सकती.
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