स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से LPG लेकर आ रहा ग्रीन सान्वी, भारत आने तक पी जाएगा कितना तेल?
Green Sanvi Fuel Consumption: ग्रीन सान्वी ने होर्मुज स्ट्रेट के रास्ते को पार कर लिया है. इसी बीच आइए जानते हैं कि भारत आने तक यह कितने ईंधन की खपत कर लेगा.

Green Sanvi Fuel Consumption: मिडिल ईस्ट में तनाव और होर्मुज स्ट्रेट के आसपास के जोखिमों के बीच एक एलपीजी टैंकर ग्रीन सान्वी भारत की तरफ आ रहा है. इसने होर्मुज का रास्ता पार कर लिया है. लेकिन समुद्रों के पार ऊर्जा को पहुंचाने के लिए खुद भी ऊर्जा की काफी जरूरत होती है. तो आखिर भारत पहुंचने तक यह जहाज खुद कितना ईंधन खर्च करेगा? आइए जानते हैं क्या है इस सवाल का जवाब.
अनुमानित कुल ईंधन खपत
होर्मुज स्ट्रेट से मुंबई या फिर कांडला जैसे भारतीय बंदरगाहों तक की यात्रा के लिए ग्रीन सान्वी के कुल मिलाकर लगभग 80 से 150 मीट्रिक टन बंकर ईंधन खर्च करने का अनुमान है. यह अनुमान रफ्तार, मौसम की स्थिति और समुद्री धाराओं पर निर्भर करता है. लेकिन यह सिर्फ ईंधन को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने के लिए आवश्यक ईंधन की मात्रा की एक साफ तस्वीर देता है.
जहाज का दैनिक ईंधन इस्तेमाल
इस श्रेणी के जहाज को बड़े एलपीजी वाहक के रूप में वर्गीकृत किया गया है. यह आमतौर पर प्रतिदिन लगभग 40 से 70 मीट्रिक टन ईंधन खर्च करता है. क्योंकि इस यात्रा में लगभग 2 से 3 दिन लगते हैं इस वजह से कुल अनुमानित खपत पूरी यात्रा के लिए 80 से 150 टन ही रहेगी.
दूरी और यात्रा का समय
होर्मुज स्ट्रेट और भारत के पश्चिमी तट के बीच की दूरी 1000 से 1550 किलोमीटर के बीच है. 24 से 31 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलने पर टैंकर को कांडला पहुंचने में लगने वाला अनुमानित समय लगभग 37 घंटे है. मुंबई पहुंचने के लिए यह समय लगभग 53 घंटे हो जाएगा.
आपको बता दें कि ग्रीन सान्वी लगभग 46000 मीट्रिक टन एलपीजी ले जा रहा है. इसकी कुल क्षमता इससे भी अधिक है. यह 58000 से ज्यादा की है.
ईंधन की खपत क्यों मायने रखती है?
ऐसे टैंकरों द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला ईंधन एक प्रमुख परिचालन लागत होती है. यह वैश्विक शिपिंग अर्थशास्त्र पर भी प्रभाव डालता है. मौजूदा समय में भू राजनीतिक तनाव जैसी स्थितियों में समय पर और किफायती डिलीवरी पक्का करने के लिए ईंधन का सही इस्तेमाल और भी जरूरी हो जाता है. रिपोर्टों के मुताबिक 'ग्रीन सांववी' के 6 अप्रैल, 2026 तक मुंबई पहुँचने की संभावना है. वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारत की ऊर्जा सुरक्षा बनाए रखने की दिशा में यह एक और महत्वपूर्ण कदम है.
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Source: IOCL



























