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Vande Bharat Cost: कितने रुपये में बनकर तैयार होती है एक वंदे भारत, राजधानी और शताब्दी से कितनी महंगी?

Vande Bharat Cost: वंदे भारत एक्सप्रेस की कीमत काफी ज्यादा होती है. आइए जानते हैं कि राजधानी या फिर शताब्दी से यह कितनी महंगी है.

Vande Bharat Cost: भारत में वंदे भारत एक्सप्रेस ने भारतीय रेलवे को एक तेज रफ्तार दे दी है. लेकिन इस रफ्तार की कीमत काफी ज्यादा है. एक स्टैंडर्ड 16 कोच वाली वंदे भारत एक्सप्रेस को बनाने में 115 से 120 करोड़ रुपये का खर्च आता है. यह भारत में बनी अब तक की सबसे महंगी पैसेंजर ट्रेनों में से एक है. हर कोच के हिसाब से वंदे भारत कोच की कीमत लगभग 6 से 7 करोड़ रुपये है. आइए जानते हैं कि राजधानी और शताब्दी से यह कितनी महंगी है.

राजधानी और शताब्दी से यह कितनी महंगी 

जब राजधानी एक्सप्रेस और शताब्दी एक्सप्रेस जैसी पारंपरिक प्रीमियम ट्रेनों से इसकी तुलना की जाती है तो अंतर काफी साफ नजर आता है. राजधानी और शताब्दी ट्रेनों में एलएचबी कोच इस्तेमाल होते हैं, जिनमें से हर एक की कीमत लगभग डेढ़ से 2 करोड़ रुपये होती है. 16 एलएचबी कोच के पूरे रैक की कीमत लगभग 60 से 70 करोड़ रुपये होती है.

15 से 20 करोड़ रुपये के हाई पावर इलेक्ट्रिक लोकोमोटिव को जोड़ने के बाद भी राजधानी या शताब्दी ट्रेन की कुल लागत आमतौर पर 80 से 90 करोड़ रुपये के अंदर रहती है. इसकी तुलना में वंदे भारत ट्रेन कुल मिलाकर लगभग 30 से 40% ज्यादा महंगी है. 

लागत बढ़ने की सबसे बड़ी वजह 

वंदे भारत की ज्यादा लागत का सबसे बड़ा कारण इसकी डिस्ट्रिब्यूटेड पावर या सेल्फ प्रोपल्शन टेक्नोलॉजी है. राजधानी और शताब्दी ट्रेन के उलट जो एक लोकोमोटिव पर निर्भर होती है वंदे भारत में हर दूसरे या तीसरे कोच के नीचे इलेक्ट्रिक ट्रेक्शन मोटर लगे होते हैं. 

एडवांस्ड टेक्नोलॉजी और पैसेंजर्स सुविधा 

वंदे भारत भारत में पूरी तरह से ऑटोमेटिक स्लाइडिंग दरवाजे, सील्ड गैंगवे, एयरक्राफ्ट स्टाइल सीटिंग, सेंसर आधारित बायो टॉयलेट और ऑनबोर्ड डायग्रोस्टिक्स जैसी सुविधा है. इसमें रीजेनरेटिव ब्रेकिंग कभी इस्तेमाल होता है जो ब्रेकिंग के दौरान बिजली पैदा करता है और उसे सिस्टम में वापस भेज देता है.

इसी के साथ कीमत में एक और बड़ा योगदान सेफ्टी का भी है. वंदे भारत ट्रेन में भारत का अपना ट्रेन प्रोटक्शन सिस्टम कवच, सीसीटीवी कैमरे, आग लगने का पता लगाने और बुझाने वाले सिस्टम और साथ ही इमरजेंसी टॉक-बैक सुविधा फैक्ट्री में ही लगी होती है. भारतीय रेलवे के मुताबिक बड़े पैमाने पर प्रोडक्शन से समय के साथ लागत कम होने की उम्मीद है. जैसे-जैसे प्रोडक्शन बढ़ता जाएगा प्रति यूनिट लागत कम होने की संभावना है.

ये भी पढ़ें: कौन है पीटर इंग्लैंड कंपनी का मालिक, किस धर्म से है इनका वास्ता?

स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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