दूसरे विश्व युद्ध का कौन था तानाशाह, इसमें कितनी हुई थीं मौतें?
दुनिया इस समय ईरान-इजरायल के बीच बढ़ते तनाव के कारण एक बेहद नाजुक मोड़ पर खड़ी है, जिसमें अमेरिका की भागीदारी ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है. यह विवाद दूसरे विश्व युद्ध की यादों को ताजा करता है.

- वैश्विक संघर्ष में मौतों का आंकड़ा दूसरे विश्व युद्ध से अधिक हो सकता है.
दुनिया एक बार फिर उसी चौराहे पर खड़ी है, जहां दशकों पहले एडोल्फ हिटलर की सनक ने मानवता को धकेल दिया था. आज ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच बढ़ता तनाव महज एक क्षेत्रीय विवाद नहीं, बल्कि एक नए विश्व युद्ध की आहट जैसा लग रहा है. जब हम हिटलर के दौर के विनाश और करोड़ों मौतों को याद करते हैं, तो वर्तमान के परमाणु संपन्न देशों के बीच की तनातनी और भी डरावनी लगने लगती है. आइए जानें कि दूसरे विश्व युद्ध का तानाशाह कौन था.
किसने रखी थी दूसरे विश्व युद्ध की नींव?
एडोल्फ हिटलर ने जिस तरह दूसरे विश्व युद्ध की नींव रखी थी, उसके पीछे कट्टर राष्ट्रवाद और विस्तारवाद की भूख थी. आज के संदर्भ में देखें तो मध्य-पूर्व की आग में ईरान और इजरायल का टकराव भी कुछ वैसी ही गहरी नफरत और वर्चस्व की लड़ाई पर टिका है. हिटलर के समय में जिस तरह गठबंधन बने थे, आज भी दुनिया अमेरिका समर्थित इजरायल और रूस-चीन के मौन समर्थन वाले ईरान के बीच बंटती दिख रही है. यह ध्रुवीकरण इतिहास के उस काले अध्याय की याद दिलाता है जहां एक छोटी सी गलती ने 7.5 करोड़ लोगों की जान ले ली थी.
विनाश का पैमाना और आज का परमाणु खतरा
हिटलर ने होलोकॉस्ट के जरिए 60 लाख यहूदियों का नरसंहार किया था, जो इतिहास की सबसे क्रूरतम घटना मानी जाती है. आज इजरायल उसी इतिहास की राख से उठकर बना एक शक्तिशाली राष्ट्र है, जो अपनी सुरक्षा के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है. दूसरी तरफ ईरान है, जिसका परमाणु कार्यक्रम पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय बना हुआ है. अगर आज युद्ध छिड़ता है, तो मौतों का आंकड़ा दूसरे विश्व युद्ध के 7.5 करोड़ को भी पीछे छोड़ सकता है, क्योंकि आज के हथियार हिटलर के दौर के टैंकों और विमानों से कहीं ज्यादा घातक हैं.
अमेरिका की भूमिका और वैश्विक गठबंधनों का दबाव
दूसरे विश्व युद्ध में अमेरिका ने अंत में उतरकर बाजी पलटी थी, लेकिन आज वह पहले से ही इजरायल का सबसे बड़ा ढाल बना हुआ है. अमेरिका की मौजूदगी ने इस लड़ाई को त्रिकोणीय बना दिया है. हिटलर के खिलाफ जिस तरह मित्र राष्ट्र एकजुट हुए थे, आज ईरान के खिलाफ अमेरिका और यूरोपीय देश लामबंद हैं. हालांकि, आज के दौर में युद्ध का मैदान केवल जमीन नहीं, बल्कि साइबर स्पेस और आर्थिक प्रतिबंध भी हैं, जिससे पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था चरमरा रही है.
बदलते समीकरण और तीसरे विश्व युद्ध की आशंका
इतिहास गवाह है कि जब भी किसी तानाशाह या सत्ता ने कूटनीति के दरवाजे बंद किए, तब केवल तबाही ही हाथ आई. हिटलर की विस्तारवादी नीतियों ने जर्मनी को तो तबाह किया ही, पूरी दुनिया को भी जख्म दिए. वर्तमान में ईरान और इजरायल के बीच मिसाइल हमलों का जो सिलसिला शुरू हुआ है, उसने कूटनीति को हाशिए पर धकेल दिया है. अमेरिका द्वारा इजरायल को अत्याधुनिक सुरक्षा कवच प्रदान करना और ईरान का अपनी सीमाओं पर मिसाइलें तैनात करना, इस बात का संकेत है कि दुनिया एक बहुत बड़ी सैन्य मुठभेड़ की कगार पर है.
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