Kanshi Ram Bharat Ratna: आंबेडकर या कांशीराम...दलितों का बड़ा नेता कौन, भारतीय राजनीति में क्यों हैं जरूरी?
Kanshi Ram Bharat Ratna: हाल ही में राहुल गांधी ने कांशीराम को भारत रत्न से सम्मानित करने के मांग की है. इसी बीच आइए जानते हैं कि बी आर आंबेडकर और कांशीराम में से कौन दलितों के सबसे बड़े नेता हैं.

- राहुल गांधी ने कांशीराम को भारत रत्न देने की मांग की है।
- आंबेडकर ने संविधान निर्माता के रूप में दलितों को अधिकार दिए।
- कांशीराम ने दलितों को राजनीतिक शक्ति में बदलने का काम किया।
- दोनों नेताओं ने भारतीय लोकतंत्र को मजबूत बनाने में योगदान दिया।
Kanshi Ram Bharat Ratna: कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने कांशीराम को भारत रत्न से सम्मानित करने की मांग की है. राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे एक पत्र में यह तर्क दिया कि कांशीराम ने भारत में हाशिए पर पड़े समुदाय के लिए गरिमा, समानता और राजनीतिक भागीदारी को पक्का करने के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया. इसी बीच भारतीय राजनीति में एक लंबे समय से चली आ रही चर्चा फिर से शुरू हो चुकी है. आइए जानते हैं कि कांशीराम और बी आर आंबेडकर भारतीय राजनीति में क्यों जरूरी हैं और दोनों में से दलितों का बड़ा नेता कौन है.
भारतीय राजनीति में आंबेडकर का योगदान
डॉ बी आर आंबेडकर ने भारत में दलित सशक्तिकरण की नींव रखी थी. भारत के संविधान के मुख्य निर्माता के तौर पर उन्होंने इस बात को पक्का किया की हाशिए पर पड़े समुदाय को मौलिक अधिकार, आरक्षण नीति और भेदभाव के खिलाफ सुरक्षा जैसे प्रावधानों के जरिए कानूनी सुरक्षा मिले. आंबेडकर ने एक बड़ा सामाजिक सुधार आंदोलन भी चलाया. इस आंदोलन ने दबे कुचले समुदायों को शिक्षा, आत्म सम्मान और राजनीतिक जागरूकता हासिल करने के लिए प्रेरित किया. उनका नारा 'शिक्षित बनो, संघर्ष करो और संगठित हो' पूरे देश में दलित आंदोलनों के लिए एक मार्गदर्शक सिद्धांत बन गया. 1956 में आंबेडकर ने लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म अपना लिया.
कांशीराम एक राजनीतिक रणनीतिकार
जहां आंबेडकर ने वैचारिक खाका तैयार किया वहीं कांशीराम ने इन विचारों को राजनीतिक सत्ता में बदलने पर ध्यान लगाया. उनका मानना था कि राजनीतिक सत्ता ही वह 'मास्टर की' (मास्टर चाबी) है जो हाशिए पर पड़े समुदायों के लिए सामाजिक और आर्थिक न्याय के दरवाजे खोल सकती है. इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए कांशीराम ने BAMCEF, दलित शोषित समाज संघर्ष समिति और आखिरकार बहुजन समाज पार्टी जैसे शक्तिशाली जमीनी संगठन बनाए.
इन संगठनों के जरिए उन्होंने दलित, पिछड़े वर्ग और अल्पसंख्यकों को बहुजन नाम की एक राजनीतिक पहचान के तहत एकजुट किया. बहुजन का मतलब है आबादी का वह बहुमत जो ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर रखा गया था.
दलितों को एक राजनीतिक शक्ति में बदलना
कांशीराम की रणनीति ने इस समुदाय को एक शक्तिशाली वोट बैंक में बदलकर भारतीय चुनाव राजनीति का स्वरूप बदल दिया. सिर्फ सामाजिक सुधार के जरिए अधिकार को मांगने के बजाय उन्होंने लोगों को लोकतांत्रिक भागीदारी के जरिए राजनीतिक सत्ता को हासिल करने के लिए मोटिवेट किया. इस रणनीति के चलते आखिरकार मायावती राजनीति में आई. मायावती उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनीं. यह भारतीय राजनीति में एक ऐतिहासिक पल था जब एक दलित नेता भारत के सबसे ज्यादा आबादी वाले राज्य की बागडोर संभाल रही थी.
दोनों नेताओं के अलग-अलग दौर
आंबेडकर और कांशीराम के योगदान को अक्सर एक दूसरे का पूरक माना जाता है. आंबेडकर ने समानता और न्याय के लिए बौद्धिक और संवैधानिक ढांचा तैयार किया और काशीराम ने उन विचारों को चुनावी और राजनीतिक रिप्रेजेंटेशन में बदला.
भारतीय लोकतंत्र को मजबूत बनाना
दोनों नेताओं ने भारतीय लोकतंत्र को और ज्यादा मजबूत करने में काफी बड़ी भूमिका निभाई. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि हर नागरिक के वोट का बराबर महत्व होता है, भले ही उसकी जाति या फिर सामाजिक पृष्ठभूमि कुछ भी हो. उनके आंदोलनों ने लाखों लोगों को सशक्त बनाया, जिन्हें काफी लंबे वक्त से राजनीतिक फैसले लेने की प्रक्रिया से बाहर रखा गया था.
राजनीतिक एजेंडा तय करना
आंबेडकर और कांशीराम का प्रभाव उनके अपने आंदोलनों से काफी ज्यादा दूर तक फैला हुआ है. आज भारत में लगभग हर बड़ी राजनीतिक पार्टी अपनी नीतियों में दलित और पिछड़े समुदाय के अधिकारों और कल्याण से जुड़े मुद्दों को शामिल करती है.
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Source: IOCL




























