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Spacecraft Cost: एक अंतरिक्ष यान को बनाने में कितना आता है खर्च? लागत सुनकर नहीं होगा यकीन

Spacecraft Cost: अक्सर ही लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि आखिर अंतरिक्षयान को बनाने में कितना खर्च आता है. आइए जानते हैं क्या है इस सवाल का जवाब.

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  • नासा के पर्सिवरेंस, जेम्स वेब सबसे महंगे विश्व मिशन हैं।

Spacecraft Cost: स्पेस मिशन को अक्सर वैज्ञानिक कामयाबी का प्रतीक माना जाता है. लेकिन हर लॉन्च के पीछे काफी बड़ा फाइनेंशियल इन्वेस्टमेंट भी होता है. स्पेसक्राफ्ट बनाने और लॉन्च करने का खर्च मिशन की जटिलता, डेस्टिनेशन और मकसद के आधार पर ₹500 करोड़ से लेकर 1.5 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा तक हो सकता है. 

स्पेसक्राफ्ट की लागत क्या तय करती है?

कई चीजें यह तय करती हैं कि स्पेसक्राफ्ट बनाने और लॉन्च करने में कितना पैसा लगेगा. एस्ट्रोनॉट को ले जाने के लिए डिजाइन किए गए स्पेसक्राफ्ट में एडवांस्ड लाइफ सपोर्ट सिस्टम, इमरजेंसी बैकअप मेकैनिज्म, रेडिएशन से सुरक्षा और बड़े पैमाने पर सेफ्टी टेस्टिंग की जरूरत होती है. इन जरूरतों की वजह से बिना इंसानों वाले रोबोटिक मिशन की तुलना में पूरे मिशन का खर्च काफी बढ़ जाता है. 

स्पेसक्राफ्ट को लो-अर्थ आर्बिट में भेजना तुलनात्मक रूप से कम खर्चीला है. हालांकि चांद, मंगल या फिर डीप स्पेस मिशन के लिए ज्यादातर ताकतवर लॉन्च व्हीकल, ज्यादा फ्यूल और एडवांस्ड नेविगेशन सिस्टम की जरूरत होती है. इन सब चीजों से खर्च काफी बढ़ जाता है. 

पेलोड का वजन लागत बढ़ाता है 

स्पेस में भेजे जाने वाले हर किलोग्राम का खर्च काफी ज्यादा होता है. लॉन्च व्हीकल और मिशन प्रोफाइल के आधार पर स्पेस में पेलोड ले जाने का खर्च लगभग 8 लाख रुपये से 16 लाख रुपये प्रति किलोग्राम तक हो सकता है.

मिशन में इस्तेमाल होने वाली टेक्नोलॉजी 

आधुनिक दोबारा इस्तेमाल होने वाले रॉकेट ने लॉन्च की लागत को काफी कम करने में मदद की है. प्राइवेट स्पेस कंपनियों द्वारा लाए गए इनोवेशन ने पारंपरिक डिस्पोजेबल लॉन्च सिस्टम की तुलना में स्पेस मिशन को ज्यादा किफायती बना दिया है.

भारत के किफायती स्पेस मिशन 

भारत का चंद्रयान 3 मिशन लगभग ₹615 करोड़ की अनुमानित लागत में पूरा हुआ. इसमें अंतरिक्षयान को बनाने की लागत लगभग 250 करोड़ रुपये थी. मिशन ने चांद के दक्षिणी ध्रुव के पास सफलतापूर्वक सॉफ्ट लैंडिंग की जिस वजह से यह अब तक के सबसे किफायती लूनर मिशन में से एक बन गया. 

इसी के साथ इसरो के मार्स ऑर्बिटर मिशन की लागत लगभग 450 करोड़ रुपये थी. इसमें मुख्य अंतरिक्षयान को बनाने का खर्चा लगभग 150 करोड़ आया था. भारत अपनी पहली ही कोशिश में मंगल की कक्षा तक पहुंचने वाला पहला देश बना.

दुनिया के सबसे महंगे स्पेस प्रोजेक्ट 

नासा के मंगल पर पर्सिवरेंस रोवर मिशन की लागत लगभग ₹20,000 करोड़ थी.  इसी के साथ ब्रह्मांड की कुछ सबसे पुरानी आकाशगंगाओं को देखने के लिए बनाए गए जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप में लगभग ₹75,000 करोड़ का निवेश हुआ था.

यह भी पढ़ेंः क्या पानी के जहाजों का भी होता है इंश्योरेंस, विराट-1 के डूबने पर कंपनी को कितना मिलेगा मुआवजा?

स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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