चीन ने ब्रह्मपुत्र पर कितने बांध बना लिए हैं, भारत पर क्या असर होगा?
China Dams: चीन एक बार फिर से ब्रह्मपुत्र नदी पर एक डैम बनाने की तैयारी कर रहा है. आइए जानते हैं कि अब तक चीन ब्रह्मपुत्र पर कितने बांध बना चुका है और इनका भारत पर क्या असर होगा.

- जल बहाव नियंत्रण से बाढ़, सूखा, गाद अवरोधन खतरा।
China Dams: नेपाल में भीषण बाढ़ से हुई तबाही ने एक बार फिर हिमालय के नाजुक इलाके में इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट से जुड़े खतरों को उजागर किया है. भारी बारिश, भूस्खलन, चट्टानों के गिरने और नदियों के उफान ने घरों, सड़कों, पुलों और पनबिजली परियोजनाओं को भारी नुकसान पहुंचाया है. इस माहौल में भारत की चिंता चीन द्वारा यरलुंग त्संगपो नदी, जिसे भारत में ब्रह्मपुत्र के नाम से जाना जाता है, पर पनबिजली परियोजनाओं के विस्तार को लेकर बढ़ गई हैं.
चीन की पनबिजली परियोजनाएं
चीन ने तिब्बत में यरलुंग त्संगपो की मुख्य धारा और उसकी सहायक नदी पर कई छोटी और बड़ी पनबिजली परियोजनाओं को पूरा कर लिया है या फिर उन पर अभी भी काम कर रहा है. इनमें जंगमू, जिएक्सू, जाचा और डागु जैसी रन-ऑफ-द-रिवर परियोजनाएं शामिल हैं. चीन ने अरुणाचल प्रदेश सीमा के पास मेडोग इलाके में एक बड़े मेगा डैम परियोजना पर भी काम शुरू कर दिया है. यह भारत के लिए रणनीतिक रूप से बड़ी चिंता का विषय बन चुका है.

यरलुंग त्संगपो पर चीन का मेगा डैम
मेडोग इलाके में प्रस्तावित परियोजना की क्षमता लगभग 60000 मेगावाट होने की उम्मीद है. यह इसे दुनिया की सबसे बड़ी पनबिजली परियोजनाओं में से एक बना देगी. इसकी लोकेशन खास तौर पर जरूरी है क्योंकि यह नदी अंत में अरुणाचल प्रदेश के रास्ते भारत में प्रवेश करती है और फिर असम से होकर बहती है. हिमालयी इलाका अपनी सक्रिय भूवैज्ञानिक संरचना की वजह से भूकंप के प्रति भी काफी ज्यादा संवेदनशील है. इससे इस क्षेत्र में किसी बड़े बांध पर बड़े भूकंप, भूस्खलन या फिर संरचनात्मक सफलता के असर को लेकर चिंता पैदा हुई हैं.
क्या इससे वॉटर बॉम्ब जैसी स्थिति बन सकती है?
एक बड़ी चिंता नदी के निचले इलाकों में अचानक बाढ़ आने की संभावना है. अगर किसी भीषण प्राकृतिक घटना या फिर तकनीकी आपदा की वजह से कोई बड़ा बांध टूट जाता है तो भारी मात्रा में पानी काफी तेजी से निचले इलाकों की तरफ बढ़ सकता है.
भारत के पूर्वोत्तर राज्य खासकर अरुणाचल प्रदेश और असम ऐसे जोखिमों की चपेट में आ सकते हैं. खतरे का पैमाना कई वजहों पर निर्भर करेगा. इनमें जमा पानी की मात्रा, बांध के टूटने का तरीका और नदी की मौजूदा स्थिति शामिल है.

चीन नदी के बहाव को कंट्रोल कर सकता है
एक और चिंता चीन की उस क्षमता को लेकर है जिससे वह निचले इलाकों में बहने वाले पानी के समय और मात्रा को प्रभावित कर सकता है. हालांकि बांध ब्रह्मपुत्र को पूरी तरह से रोक नहीं सकते लेकिन जलाशय और पनबिजली इंफ्रास्ट्रक्चर नदी के प्राकृतिक बहाव को बदल सकते हैं.
भारत को खास तौर पर खराब मौसम की स्थिति के दौरान संभावित बदलावों को लेकर चिंता है. मानसून के दौरान अचानक बड़ी मात्रा में पानी छोड़े जाने से निचले इलाकों में बाढ़ की स्थिति और खराब हो सकती है. इसी के साथ सूखे के समय कम पानी छोड़ जाने से पानी की कमी हो सकती है. ऐसी चिंता इस वजह से भी जरूरी है क्योंकि ब्रह्मपुत्र भारत के पूर्वोत्तर में समुदायों, खेती और इकोसिस्टम के लिए पानी का एक जरूरी स्रोत है.
यह भी पढ़ेंः नदियों का 'Highest Flood Level' क्या होता है, इसे कैसे मापा जाता है?
नदी की उपजाऊ गाद का क्या होता है?
ब्रह्मपुत्र हिमालय से भारी मात्रा में गाद बहाकर लाती है. पोषक तत्वों से भरपूर यह गाद अंत में निचले मैदानी इलाकों तक पहुंचती है और खेती की उत्पादकता बनाए रखने में बड़ी भूमिका निभाती है, खासकर असम और बांग्लादेश में.
बड़े बांध इस गाद का कुछ हिस्सा अपने जलाशयों के पीछे रोक सकते हैं. अगर निचले इलाकों तक पहुंचने वाली गाद की मात्रा काफी कम हो जाती है तो इससे मिट्टी की उर्वरता पर भी असर पड़ सकता है और नदी का प्राकृतिक इकोसिस्टम बदल सकता है. इसके नतीजे खेती से काफी आगे तक जा सकते हैं. इससे नदी के प्राकृतिक आवास और नदी प्रणाली के लंबे समय के व्यवहार पर भी असर पड़ सकता है.
यह भी पढ़ेंः UN के नए मैप में अफ्रीका का साइज बड़ा, क्या सच में बढ गया इसका क्षेत्रफल?






















