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भारत में कितने बचे हैं जल्लाद, आजादी के बाद से कितनी घट गई संख्या?

आजादी के बाद से कम हुए जल्लाद, देश में अब गिने-चुने ही पेशेवर परिवार बचे, जानिए दुर्लभ होते इस पारंपरिक पेशे के पीछे की असल वजह और लगातार घटती संख्या के आधिकारिक आंकड़े

भारत में जब भी किसी बड़े अपराधी को अदालत से मौत की सजा मिलती है, तो जेल प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह खड़ी होती है कि फांसी का फंदा कौन खींचेगा. हाल ही में हुए चर्चित मुस्कान नीले ड्रम केस में उसके साथी साहिल की फांसी की सजा को लेकर कानून के गलियारों में हलचल तेज है. जब भी ऐसे मामलों में किसी अपराधी को फांसी के फंदे तक ले जाने की बात आती है, तो देश को जल्लाद की याद आती है.

एक जमाना था जब देश की हर बड़ी केंद्रीय जेल के पास जल्लाद हुआ करते थे, लेकिन आज यह पेशा भारत में पूरी तरह खत्म होने की कगार पर पहुंच गया है. आइए जानते हैं कि वर्तमान में भारत में कितने जल्लाद बचे हैं और आजादी के बाद से इनकी संख्या क्यों लगातार घटती चली गई.

देश में बचे सिर्फ दो जल्लाद परिवार

यह जानकर हैरानी हो सकती है कि हमारे देश में आज की तारीख में कानूनी और आधिकारिक तौर पर सिर्फ दो जल्लाद परिवार ही बचे हैं. इनमें से पहला नाम उत्तर प्रदेश के मेरठ के रहने वाले पवन जल्लाद का है, जिनका परिवार पीढ़ियों से इस काम को कर रहा है. पवन जल्लाद के दादा कालू कुमार भी अपने समय के बेहद मशहूर जल्लाद थे और खुद पवन ने साल 2020 में दिल्ली की तिहाड़ जेल में निर्भया कांड के चारों दोषियों को फांसी पर लटकाया था. दूसरा परिवार पश्चिम बंगाल में बाबू अहमद का माना जाता है. 

आजादी के बाद क्यों घट गई संख्या?

पहला कारण यह है कि भारत के कानूनी तंत्र में अब फांसी की सजा बहुत ही दुर्लभ से दुर्लभ मामलों में ही दी जाती है. निचली अदालत से हर साल कई अपराधियों को मौत की सजा जरूर सुनाई जाती है, लेकिन ऊपरी अदालत में अपील, राष्ट्रपति के पास दया याचिका और लंबी कानूनी प्रक्रियाओं के चलते वास्तव में फांसी के फंदे तक पहुंचने वाले मामलों की संख्या बेहद कम होती है. 

दूसरा कारण यह है कि जल्लाद के पेशे को समाज में अच्छी नजर से नहीं देखा जाता, जिसकी वजह से उनके बच्चों ने समाज में सम्मान से जीने के लिए इस पारंपरिक काम को अपनाने से पूरी तरह इनकार कर दिया. इसके अलावा, जल्लादों को कोई फिक्स सरकारी वेतन नहीं मिलता है.

उन्हें केवल एक छोटा सा मासिक पारिवारिक भत्ता दिया जाता है, जो पहले महज कुछ सौ रुपये था और बाद में बढ़ाकर कुछ हजार रुपये किया गया. किसी अपराधी को फांसी देने पर कुछ अतिरिक्त पैसे जरूर मिलते हैं, लेकिन केवल इतने भत्ते के भरोसे परिवार का पेट पालना नामुमकिन है.

यह भी पढ़ें: दिल्ली के कनॉट प्लेस का क्या है इतिहास, अंग्रेजों के जमाने में कैसी थी यह जगह?

जेल प्रशासन के सामने होता है बड़ा संकट

जल्लादों की संख्या लगभग समाप्त होने की वजह से जब भी देश में साहिल जैसे किसी बड़े अपराधी का डेथ वारेंट जारी होता है, तो जेलों के भीतर सबसे बड़ी मुसीबत खड़ी हो जाती है. कई बार तिहाड़ जैसी देश की सबसे आधुनिक जेल को भी उत्तर प्रदेश के जेल विभाग से विशेष अनुरोध करके मेरठ से पवन जल्लाद को बुलाना पड़ता है. 

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About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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