बिना सत्रावसान किए कब तक स्थगित रह सकता है कोई संसद सत्र, क्या है लिमिट?
Parliamentary Session: संसद का एक विशेष सत्र बुलाने को लेकर अटकलें लगाई जा रही हैं. जानें क्या है इसके पीछे की वजह और साथ ही यह भी कि बिना सत्रावसान कब तक संसद सत्र स्थगित रह सकता है.

- संसद में स्थगन और सत्रावसान की प्रक्रियाएँ चर्चा में।
- स्थगन बैठक रोके पर सत्र जारी, अध्यक्ष पुनः बुला सकते।
- सत्रावसान सत्र खत्म, 6 माह में अगला सत्र अनिवार्य।
Parliamentary Session: इस बात की अटकलें लगाई जा रही हैं कि केंद्र सरकार महिला आरक्षण विधेयक को पारित करने के लिए संसद का एक विशेष सत्र बुला सकती है. इससे संसदीय प्रक्रियाओं पर फिर से चर्चा शुरू हो गई है. रिपोर्ट के मुताबिक अगर संसद सत्र का सत्रावसान नहीं हुआ है तो सिर्फ दो दिन के नोटिस पर बैठक बुलाई जा सकती है.
सदन को स्थगित अवस्था में वापस बुलाया जा सकता है जबकि सत्रावसान होने पर सत्र पूरी तरह से खत्म हो जाता है. लेकिन सवाल यह उठता है कि आखिर बिना सत्रावसान किए कब तक संसद सत्र स्थगित रह सकता है? आइए जानते हैं इस सवाल का जवाब.
अनुच्छेद 85 संवैधानिक सीमा को तय करता है
संविधान का अनुच्छेद 85 (1) कहता है कि राष्ट्रपति संसद के हर सदन को ऐसे समय और स्थान पर बैठक के लिए बुलाएंगे जिसे वे सही समझें. यह नियम तय करता है कि एक सत्र की आखिरी बैठक और अगले सत्र की पहली बैठक के बीच 6 महीने से ज्यादा का अंतर नहीं होना चाहिए.
सदन 6 महीने के करीब तक स्थगित रह सकता है लेकिन संवैधानिक जरूरत के मुताबिक यह अंतराल 6 महीने से कम ही होना चाहिए. यह नियम संसद के दोनों सदनों पर लागू होता है.

अनिश्चितकाल के लिए स्थगन का क्या मतलब है?
स्थगन सदन की बैठक को कुछ वक्त के लिए रोक देता है. जब पीठासीन अधिकारी सदन की बैठक को बिना अगली तारीख या फिर वक्त बताए खत्म कर देते हैं तो इस प्रक्रिया को अनिश्चितकाल के लिए स्थगन कहा जाता है. लोकसभा में यह अधिकार स्पीकर के पास होता है जबकि राज्यसभा में यह सभापति के पास होता है.
अनिश्चितकाल के लिए स्थगन से संसदीय सत्र खत्म नहीं हो जाता. तकनीकी रूप से सत्र तब तक जारी रहता है जब तक कि राष्ट्रपति सत्रावसान का आदेश जारी न कर दें. सिर्फ इस वजह से की अगली बैठक की तारीख घोषित नहीं की गई है इसका मतलब यह नहीं होता कि सत्र समाप्त हो गया है.
स्थगित सदन को वापस कैसे बुलाया जा सकता है?
अगर किसी सदन को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया है लेकिन राष्ट्रपति ने सत्रावसान का आदेश जारी नहीं किया है तो पीठासीन अधिकारी उसे कभी भी फिर से बुला सकते हैं. सदन को वापस बुलाने के लिए सरकार की तरफ से किसी नए नोटिफिकेशन या फिर राष्ट्रपति के नए आदेश की जरूरत नहीं होती है.
अगर सत्र का सत्रावसान नहीं हुआ है तो 2 दिन के नोटिस पर बैठक बुलाई जा सकती है. इसके लिए नया सत्र बुलाने की जरूरत नहीं होती बल्कि मौजूदा सत्र को ही वापस से शुरू किया जा सकता है.

लंबित विधेयकों और नोटिसों का क्या होता है?
सदन के स्थगन का किसी भी सदन के सामने लंबित विधेयकों, प्रस्तावों या फिर नोटिसों पर कोई भी असर नहीं पड़ता. चाहे सदन का कामकाज कुछ दिनों के लिए रुके या फिर इसे अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया जाए, संसदीय कामकाज लंबित ही रहता है. जब सदन की कार्यवाही फिर से शुरू होती है तो वह वहीं से आगे बढ़ती है जहां उसे रोका गया था.
सत्रावसान का प्रभाव अलग होता है. इसमें लंबित विधेयक तो सुरक्षित रहते हैं लेकिन दूसरे लंबित नोटिस सत्रावसान होने पर खत्म हो जाते हैं. स्थगन से कार्यवाही कुछ वक्त के लिए रुकती है जबकि सत्रावसान शिवपुर सत्र खत्म हो जाता है और इसका असर लंबित नोटिसों पर पड़ता है.
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सत्र कब खत्म होगा यह कौन तय करता है?
संसदीय सत्र के सत्रावसान का फैसला आमतौर पर केंद्रीय मंत्रिमंडल की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा लिया जाता है. सदन को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित किए जाने के बाद सरकार सत्रावसान की सिफारिश न करने के लिए ऑप्शन चुन सकती है. हालांकि यह ऑप्शन अनुच्छेद 85 के तहत संवैधानिक अनिवार्यता से ऊपर नहीं हो सकता.
भले ही सत्र को औपचारिक रूप से खुला छोड़ दिया जाए इसके बाद भी संसद को तय 6 महीने की अवधि के अंदर दोबारा मिलना ही होगा. यह नियम पक्का करता है कि एक सत्र की अंतिम बैठक और अगले सत्र की पहली बैठक के बीच का अंतर संवैधानिक सीमा से ज्यादा ना हो.
6 महीने का यह नियम वास्तविक बैठकों के बीच के वक्त से मापा जाता है ना कि उस तारीख से जब सदन को स्थगित किया गया था. इस अंतर से यह साफ होता है कि स्थगित सत्र को भले ही दोबारा बुलाया जा सके लेकिन इसका इस्तेमाल संविधान की उस अनिवार्यता से बचने के लिए नहीं किया जा सकता जिसके तहत दोनों सदनों का एक तय समय सीमा के अंदर मिलना जरूरी है.
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