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Sea Direction: पुराने समय में समुद्र में कैसे चलता था दिशा का पता, जानें किस तकनीक का होता था इस्तेमाल?

Sea Direction: जीपीएस आने से काफी पहले भी नाविक समुद्र में सही रास्ते का पता लगा लेते थे. लेकिन सवाल यह उठता है कि वे किस तकनीक का इस्तेमाल करते थे. आइए जानते हैं.

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  • प्राचीन नाविक सूरज, तारे देखकर दिशा ज्ञात करते थे.
  • आसमान न दिखने पर पक्षी, लहरों से दिशा का अनुमान.
  • मत्स्य यंत्र, कंपास, एस्ट्रोलैब से सटीक होती थी नेविगेशन.
  • अनुभव और पीढ़ीगत ज्ञान से पूरी होती थी नेविगेशन कला.

Sea Direction: जीपीएस जैसे आधुनिक नेविगेशन सिस्टम के आने से काफी पहले नाविक सिर्फ अपनी नजर, अनुभव और आसान औजारों का इस्तेमाल करके बड़े-बड़े महासागरों को पार कर लेते थे. पुराने जमाने में खुले समुद्र में रास्ता खोजने के लिए प्रकृति, आसमान और हवा पानी की गहरी समझ की जरूरत होती थी. टेक्नोलॉजी की कमी के बावजूद यह तरीके हैरानी की बात है काफी सटीक होते थे.

सूरज और तारों का इस्तेमाल 

पुराने जमाने के नाविकों के लिए आसमान सबसे भरोसेमंद गाइड होता था. दिन के समय वे सूरज की स्थिति को देखकर दिशा का अंदाजा लगाते थे. दोपहर के समय सबसे छोटी परछाई उत्तर दक्षिण दिशा बताती थी. रात में नॉर्थन हेमिस्फीयर के नाविक ध्रुव तारे पर भरोसा करते थे. यह तारा आसमान में लगभग एक जगह पर टिका रहता था और हमेशा उत्तर दिशा दिखाता था. वे तारों के समूहों को भी याद कर लेते थे और लंबी दूरी तय करते समय दिशा और जगह को समझने के लिए उनकी चाल पर नजर रखते थे. 

आसपास के माहौल की समझ 

जब बादलों या फिर तूफानों की वजह से आसमान दिखाई नहीं देता था तब नाविक प्राकृतिक संकेत का सहारा लेते थे. समुद्री पक्षी इसमें बड़ी भूमिका निभाते थे. ऐसा इसलिए क्योंकि उनके उड़ने का तरीका अक्सर जमीन की दिशा बता देता था. समुद्र की लहर और धाराएं भी संकेत देती थीं. अनुभवी नाविक लहरों की दिशा और पानी के रंग में आए बदलावों को देखकर अपने रास्ते का अंदाजा लगा लेते थे. हवा का मिजाज लंबी दूरी की यात्राओं में रास्ता दिखाने का एक और जरूरी जरिया था. 

शुरुआती नेविगेशन औजार

समय के साथ नाविकों ने और ज्यादा सटीक नतीजे पाने के लिए कई औजार बनाए. पुराने भारत में मत्स्य यंत्र नाम का एक औजार इस्तेमाल होता था. यह कंपास का ही एक शुरुआती रूप था. बाद में जब चुंबकीय कंपास का आविष्कार हुआ तो नेविगेशन काफी आसान हो गया.  एस्ट्रोलैब और सेक्स्टैंट जैसे दूसरे औजारों की मदद से सूरज और तारों की स्थिति मापी जाती थी. ऐसा इसलिए ताकि  लैटिट्यूड का पता लगाया जा सके.

पीढ़ियों से चली आ रही है कला

पुराने जमाने में नेविगेशन का मतलब सिर्फ औजारों का इस्तेमाल करना नहीं था बल्कि यह एक ऐसी कला थी जो सालों के अनुभव से निखरती थी. नाविक कहीं अलग-अलग तरीकों को मिलाकर इस्तेमाल करते थे. उनकी याददाश्त, आसपास की चीजों पर नजर रखने की कला और पीढ़ी दर पीढ़ी मिले व्यवहारिक ज्ञान की वजह से उन्हें सही रास्ते का पता चलता था.

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स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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