अमेरिका और इजरायल का क्या इतिहास है, क्या दोनों देश हमेशा से दोस्त थे?
1948 में इजरायल को मान्यता देने वाला अमेरिका पहला देश था. शुरुआत में स्वेज नहर और परमाणु कार्यक्रम पर दोनों में भारी तनातनी रही, लेकिन बाद में दोनों देश एक दूसरे के दोस्त बन गए.

- अमेरिका ने यहूदी होमलैंड का समर्थन कर, इजरायल को तुरंत मान्यता दी.
- शीत युद्ध में इजरायल अमेरिकी सहयोगी बना, पर स्वेज पर खटास.
- 1967 युद्ध में इजरायल की जीत से अमेरिकी नजरिया बदला.
- आज रणनीतिक अहमियत और घरेलू लॉबी अमेरिकी समर्थन का आधार.
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की करीबी दोस्ती पूरी दुनिया में जगजाहिर रही है. लेकिन ईरान युद्धविराम की शर्तों को लेकर पैदा हुए ताजा तनाव और ट्रंप के हालिया सख्त बयान ने हर किसी को हैरान कर दिया है. इस भू-राजनीतिक टकराव ने एक बहुत पुराना और बुनियादी सवाल दोबारा जिंदा कर दिया है कि क्या अमेरिका और इजरायल हमेशा से ही इतने गहरे दोस्त थे. दोनों देशों के ऐतिहासिक रिश्तों की परतों को अगर खोलकर देखा जाए, तो समझ आता है कि यह कहानी सिर्फ दोस्ती की नहीं, बल्कि बड़े सामरिक हितों और उतार-चढ़ाव की रही है.
यहूदी होमलैंड के विचार को अमेरिका का शुरुआती सहारा
अमेरिका और इजरायल के बीच कूटनीतिक रिश्तों की बुनियाद इजरायल नाम के देश के नक्शे पर उभरने से बहुत पहले ही रख दी गई थी. ऐतिहासिक फलस्तीन के भीतर एक अलग यहूदी देश (होमलैंड) बनाने के विचार का अमेरिका शुरुआत से ही बहुत बड़ा समर्थक रहा था. जब 2 नवंबर 1917 को बालफोर घोषणापत्र के जरिए फलस्तीन में अलग यहूदी देश की मांग को ब्रिटेन ने अपना तत्काल समर्थन दिया, तो उसके ठीक 2 साल बाद 3 मार्च 1919 को तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति वुडरो विल्सन ने भी मित्र राष्ट्रों की तरफ से इस मांग पर अपनी मुहर लगा दी. इसके बाद 1922 और फिर 1944 में अमेरिकी संसद ने बालफोर घोषणापत्र के पक्ष में औपचारिक प्रस्ताव भी पास किए.
महज 11 मिनट के भीतर इजरायल को अमेरिकी मान्यता
साल 1948 में जब दुनिया के नक्शे पर एक स्वतंत्र देश के तौर पर इजरायल के अस्तित्व का औपचारिक ऐलान हुआ, तो अमेरिका उसे मान्यता देने वाला पूरी दुनिया का सबसे पहला देश बना. इजरायल की स्वतंत्रता की घोषणा होने के महज 11 मिनटों के भीतर ही अमेरिका ने उसे एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में स्वीकार कर लिया था. तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी ट्रुमैन दुनिया के वह पहले नेता बने, जिन्होंने बिना किसी देरी के सबसे पहले इजरायल को कूटनीतिक हरी झंडी दिखाई. इतनी तेजी से लिए गए इस फैसले के पीछे कोई भावुकता नहीं थी, बल्कि इसके पीछे उस दौर के बड़े वैश्विक समीकरण काम कर रहे थे.
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शीत युद्ध की शुरुआत और अरब जगत का सत्ता संघर्ष
इजरायल को इतनी जल्दी मान्यता देने के पीछे द्वितीय विश्वयुद्ध के ठीक बाद की वैश्विक परिस्थितियां थीं. यह वह दौर था जब अमेरिका और सोवियत संघ के बीच शीत युद्ध अपनी शक्ल अख्तियार कर रहा था. उस समय अरब देश अपने विशाल तेल भंडारों और स्वेज नहर जैसे बेहद महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक रास्तों के कारण दो महाशक्तियों के शक्ति प्रदर्शन का मुख्य अखाड़ा बन चुके थे. स्वेज नहर एक ऐसा मार्ग था जिसके जरिए बड़े पैमाने पर अंतरराष्ट्रीय व्यापार होता था. ऐसे समय में यूरोपीय ताकतें कमजोर पड़ रही थीं और अमेरिका अरब जगत में सत्ता संघर्ष का सबसे बड़ा बिचौलिया बनकर खुद को स्थापित करना चाहता था.
तेल रिजर्व पर नियंत्रण के लिए इजरायल की जरूरत
तेल रिजर्व और पश्चिम एशिया के रणनीतिक रास्तों को लेकर अरब जगत में अमेरिका के आर्थिक और राजनैतिक हित लगातार बढ़ रहे थे. अमेरिका को अच्छी तरह समझ आ गया था कि अगर अरब देशों की मनमानी को रोकना है और इलाके में अपना नियंत्रण बनाए रखना है, तो उसे वहां एक भरोसेमंद और मजबूत साथी की जरूरत होगी. इजरायल इस जरूरत के ढांचे में पूरी तरह फिट बैठता था. यही वजह थी कि अमेरिका ने इजरायल को न केवल तुरंत एक देश के रूप में मान्यता दी, बल्कि उसे एक बड़ी सैन्य ताकत के रूप में विकसित करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी.
स्वेज नहर विवाद और अमेरिकी प्रशासन की तीखी नाराजगी
भले ही अमेरिका ने इजरायल के जन्म से पहले ही उसे पूरा नैतिक समर्थन दिया था, लेकिन यह सोचना पूरी तरह गलत होगा कि दोनों के रिश्ते शुरू से ही हमेशा मीठे रहे हैं. अतीत में कई ऐसे मौके आए जब दोनों देशों के संबंधों में गंभीर खटास देखने को मिली. स्वेज नहर के नियंत्रण को लेकर जब इजरायल ने फ्रांस और ब्रिटेन के साथ मिलकर मिस्र के खिलाफ लड़ाई छेड़ दी, तो अमेरिका का आइजनहावर प्रशासन इजरायल से बेहद नाराज हो गया था. अमेरिकी राष्ट्रपति ने इजरायल को खुलेआम धमकी दी थी कि अगर उसने जंग के दौरान कब्जाए गए इलाकों को खाली नहीं किया, तो अमेरिका उसकी मिलने वाली तमाम आर्थिक और सैन्य मदद पूरी तरह रोक देगा.
सोवियत संघ का दबाव और इजरायल का पीछे हटना
उस दौर में सिर्फ अमेरिका ही नहीं, बल्कि सोवियत संघ ने भी इजरायल को सीधी चेतावनी दी थी कि अगर वह मिस्र के इलाकों से पीछे नहीं हटा, तो उस पर मिसाइलों से बड़ा हमला किया जा सकता है. दोनों महाशक्तियों के इस जबर्दस्त अंतरराष्ट्रीय दबाव के आगे इजरायल को झुकना पड़ा और उसे मजबूरी में उन तमाम कब्जा किए गए इलाकों को खाली करके वापस पीछे हटना पड़ा. यह घटना साबित करती है कि जब अमेरिका के व्यापक वैश्विक हित इजरायल की हरकतों से टकराते थे, तो वह अपने इस छोटे से सहयोगी को आंखें दिखाने से कभी पीछे नहीं हटता था.
परमाणु कार्यक्रम पर कैनेडी प्रशासन के साथ तनातनी
रिश्तों में तल्खी का यह सिलसिला 1960 के दशक में भी जारी रहा. उस वक्त अमेरिका में कैनेडी प्रशासन सत्ता में था और वह इजरायल के गुप्त रूप से चल रहे परमाणु कार्यक्रमों को लेकर बेहद चिंतित और नाराज था. अमेरिका नहीं चाहता था कि पश्चिम एशिया के इस अशांत इलाके में कोई नया देश परमाणु हथियारों से लैस हो जाए, क्योंकि इससे परमाणु अप्रसार की उसकी वैश्विक नीतियों को धक्का लगता. इस मुद्दे पर दोनों देशों के राजनयिकों के बीच लंबे समय तक परदे के पीछे तीखी तनातनी चलती रही और रिश्तों में एक तरह का अविश्वास बना रहा.
6 दिनों की जंग जिसने पूरी तरह बदल दिया नजरिया
साल 1967 में इतिहास ने एक नया मोड़ लिया और इसी के साथ इजरायल को देखने का अमेरिकी नजरिया पूरी तरह और हमेशा के लिए बदल गया. इसे तीसरा अरब-इजरायल युद्ध भी कहा जाता है. इस जंग में इजरायल ने महज 6 दिनों की छोटी सी अवधि के भीतर जॉर्डन, सीरिया और मिस्र जैसे बड़े अरब देशों को एक साथ धूल चटा दी और उनके एक बहुत बड़े भू-भाग पर अपना कब्जा जमा लिया. इस अविश्वसनीय और एकतरफा जीत ने वाशिंगटन में बैठे अमेरिकी रणनीतिकारों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि इजरायल इस पूरे इलाके का सबसे शक्तिशाली मोहरा बन चुका है.
वियतनाम युद्ध की उलझन और सोवियत संघ को झटका
इस ऐतिहासिक जीत की अहमियत अमेरिका के लिए इसलिए भी बहुत ज्यादा थी क्योंकि उस समय अमेरिकी सेना खुद वियतनाम युद्ध के दलदल में बुरी तरह उलझी हुई थी. इजरायल ने बिना किसी बड़ी अमेरिकी सैन्य मदद के अकेले दम पर पूरे अरब जगत को हरा दिया था. इससे भी बड़ी बात यह थी कि इस लड़ाई में इजरायल के हाथों करारी शिकस्त झेलने वाले दो प्रमुख देश, मिस्र और सीरिया, सीधे तौर पर सोवियत संघ के बेहद करीबी दोस्त थे. इजरायल की इस जीत ने इलाके में सोवियत संघ के बढ़ते प्रभाव को एक ही झटके में नेस्तनाबूद कर दिया था.
पश्चिम एशिया में सोवियत संघ के खिलाफ स्थायी पार्टनर
6 दिनों की इस शानदार जीत के बाद ही अमेरिका ने इजरायल को महज एक जरूरतमंद देश के बजाय अरब जगत में सोवियत संघ के खिलाफ अपने एक सबसे भरोसेमंद और स्थायी पार्टनर के तौर पर देखना शुरू किया. इसके बाद साल 1973 की लड़ाई में भी इजरायल ने मिस्र और सीरिया की संयुक्त सेनाओं को दोबारा शिकस्त दी, जिसने इस साझेदारी को और ज्यादा मजबूत कर दिया. अमेरिका को समझ आ गया था कि पश्चिम एशिया में अपने हितों को सुरक्षित रखने के लिए इजरायल से बेहतर और आक्रामक योद्धा उसे दूसरा कोई नहीं मिल सकता.
रणनीतिक अहमियत और घरेलू राजनीति का मजबूत गठजोड़
आज के दौर में भी अमेरिका द्वारा इजरायल को आंख मूंदकर समर्थन देने के पीछे कई मजबूत कारण काम करते हैं. पहली और सबसे बड़ी वजह अरब दुनिया की हमेशा उथल-पुथल से भरी रहने वाली राजनीति में इजरायल की बेजोड़ रणनीतिक अहमियत है. शीत युद्ध खत्म होने के बाद जब अमेरिका पश्चिम एशिया के मामलों में और ज्यादा सक्रिय हुआ, तो इजरायल, सऊदी अरब और मिस्र उसके सबसे प्रमुख रणनीतिक स्तंभ बने. इसके अलावा, खुद अमेरिका के भीतर की घरेलू राजनीति, वहां के आम लोगों की राय और वाशिंगटन में बेहद सक्रिय और आर्थिक रूप से ताकतवर इजरायल समर्थक लॉबी भी अमेरिकी सरकारों को इजरायल के पक्ष में खड़े रहने के लिए मजबूर करती है.
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