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जब नहीं था NTA तब कैसे होती थी NEET की परीक्षा, कितना सुरक्षित था क्वेश्चन पेपर?

NTA से पहले भी मेडिकल एडमिशन के लिए पेपर हुआ करते थे. लेकिन उस वक्त आज की तरह एक ही पेपर नहीं हुआ करता था. आइए जानें कि उस समय क्वेश्चन पेपर सुरक्षित कैसे होते थे.

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  • उस समय प्रश्नपत्रों की सुरक्षा मजबूत थी, लॉजिस्टिक आसान था.

मेडिकल की पढ़ाई करने का सपना देखने वाले हर छात्र के लिए NEET की परीक्षा सबसे बड़ी सीढ़ी है, लेकिन इन दिनों यह परीक्षा पेपर लीक और गड़बड़ी के आरोपों से घिरी हुई है. इस विवाद ने हर किसी को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर पहले की व्यवस्था कैसी थी. जब नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) का वजूद नहीं था, तब देश में मेडिकल एडमिशन की प्रक्रिया बिल्कुल अलग हुआ करती थी. आइए गहराई से समझते हैं कि NTA के आने से पहले मेडिकल एंट्रेंस एग्जाम का पूरा ढांचा क्या था और उस दौर में पेपर कितने सुरक्षित हुआ करते थे.

NTA से पहले किसके पास थी नीट की जिम्मेदारी?

आज जिसे हम NEET UG के नाम से जानते हैं, उसका पुराना इतिहास ऑल इंडिया प्री-मेडिकल टेस्ट यानी AIPMT से जुड़ा हुआ है. नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) के गठन से पहले इस बेहद महत्वपूर्ण परीक्षा को आयोजित करने का पूरा जिम्मा सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन (CBSE) के पास था. उस दौर में CBSE ही पेपर तैयार करने से लेकर परीक्षा केंद्रों के प्रबंधन और नतीजों को जारी करने तक की पूरी प्रक्रिया को संभालता था. यह परीक्षा पूरी तरह से ऑफलाइन यानी पेन और पेपर मोड में आयोजित की जाती थी, जिसमें छात्रों को 3 घंटे का समय मिलता था और सभी सवाल मल्टीपल चॉइस (MCQ) फॉर्मेट में पूछे जाते थे. 

अलग-अलग कॉलेजों की अपनी- अपनी परीक्षाएं

पुराने दौर में मेडिकल में एडमिशन का तरीका आज जितना एकीकृत नहीं था. AIPMT के अलावा देश के कई प्रतिष्ठित संस्थान अपनी खुद की अलग प्रवेश परीक्षाएं आयोजित करते थे. उदाहरण के लिए, AIIMS, JIPMER और CMC वेल्लोर जैसे टॉप मेडिकल कॉलेज अपनी स्वतंत्र परीक्षाएं लेते थे. इतना ही नहीं, देश के अलग-अलग राज्य भी अपने स्टेट लेवल के मेडिकल एंट्रेंस एग्जाम्स आयोजित करते थे. इस विकेंद्रीकृत व्यवस्था की वजह से उस समय डॉक्टरी की पढ़ाई के इच्छुक छात्रों को देश के अलग-अलग कोनों में जाकर कई सारी परीक्षाएं देनी पड़ती थीं, जिससे उन पर मानसिक और आर्थिक बोझ काफी ज्यादा रहता था. 

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पुराने दौर में कैसी थी प्रश्न पत्रों की सुरक्षा व्यवस्था?

जब परीक्षा का आयोजन CBSE करता था, तब प्रश्न पत्रों की गोपनीयता और सुरक्षा को बनाए रखने के लिए बेहद सख्त और पारंपरिक प्रोटोकॉल का पालन किया जाता था. प्रश्न पत्रों की छपाई बहुत ही सुरक्षित और गुप्त प्रिंटिंग प्रेसों में की जाती थी, जहां बाहरी दुनिया का कोई संपर्क नहीं होता था. छपने के बाद इन प्रश्न पत्रों को सीधे परीक्षा केंद्रों पर भेजने के बजाय, विभिन्न शहरों के सरकारी बैंकों या सरकारी खजानों (ट्रेजरी) के मजबूत लॉकरों में सीलबंद करके सुरक्षित रख दिया जाता था. परीक्षा के ठीक कुछ समय पहले ही इन्हें कड़ी निगरानी में सेंटर्स तक पहुंचाया जाता था.

सीमित परीक्षा केंद्र और आसान लॉजिस्टिक मैनेजमेंट

उस जमाने में आज के मुकाबले मेडिकल की सीटें भी कम थीं और परीक्षा में बैठने वाले उम्मीदवारों की संख्या भी सीमित थी. इस वजह से परीक्षा केंद्रों की कुल संख्या काफी कम हुआ करती थी. सेंटर्स कम होने का सबसे बड़ा फायदा यह था कि लॉजिस्टिक मैनेजमेंट यानी पेपरों को पहुंचाने और वापस लाने की व्यवस्था को संभालना बहुत आसान होता था. कम केंद्रों की वजह से CBSE के अधिकारी हर सेंटर पर सीधी और कड़ी निगरानी रख पाते थे, जिससे स्थानीय स्तर पर किसी भी तरह की गड़बड़ी या धांधली की गुंजाइश बहुत कम हो जाती थी.

डिजिटल युग से दूरी और सीमित तकनीकी चुनौतियां

पहले के समय में आज की तरह तकनीक और सोशल मीडिया का इतना गहरा प्रभाव नहीं था. परीक्षा के दौरान व्हाट्सएप, टेलीग्राम या अन्य इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसेस का इस्तेमाल न के बराबर था. इस डिजिटल दूरी के कारण अगर किसी जगह पर कोई छोटी-मोटी स्थानीय गड़बड़ी होती भी थी, तो उसे तुरंत फैलने से रोका जा सकता था. उस दौर में आज की तरह बड़े पैमाने पर काम करने वाले सॉल्वर गैंग या हाई-टेक पेपर लीक माफियाओं की पहुंच परीक्षा केंद्रों और सुरक्षित प्रेसों तक नहीं थी, जिससे परीक्षा की शुचिता काफी हद तक बची रहती थी.

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About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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