न खून-खराबा..न सैनिकों की शहादत, कहां हुई थी वह जंग, जहां लड़ने गए थे 80 सैनिक और वापस लौटे 81?
दुनिया में जब कभी भी कोई युद्ध हुआ है तो हमेशा सैनिकों की शहादत जरूर हुई है, लेकिन एक युद्ध ऐसा भी है, जिसमें लड़ाई के लिए जवानों ने सिर्फ वादियों के मजे लिए. इतना ही नहीं जब वे वापस आए तो उनके साथ एक सैनिक ज्यादा ही था.

युद्ध का नाम सुनते ही दिमाग में खून-खराबा तबाही और सैनिकों की शहादत की तस्वीरें तैरने लगती हैं. लेकिन इतिहास के पन्नों में एक ऐसी एतिहासिक जंग भी दर्ज है जहां न तो एक भी गोली चली और न ही किसी सैनिक की जान गई. उल्टा इस अनोखे युद्ध में एक करिश्मा देखने को मिला, जिसने पूरी दुनिया को हैरान कर दिया. यूरोप का एक छोटा सा देश जब जंग के मैदान में अपने 80 जांबाज सैनिकों के साथ उतरा, तो उनके न तो एक भी सैनिक शहीद हुए, बल्कि वापसी में उनकी पलटन घटने की बजाय बढ़ गई. उस पलटन में एक और सैनिक शामिल हो गया. चलिए इस दिलचस्प युद्ध की दास्तां सुनते हैं.
आखिरी मिशन पर निकले सैनिक
यह किस्सा यूरोप के एक बेहद छोटे लेकिन खूबसूरत देश लिकटेंस्टाइन का है, जो कि आज के वक्त में दुनियाभर में एक टैक्स हैवन के रूप में जाना जाता है. बात करीब 150 साल पुरानी यानि 1866 की है, जब लिकटेंस्टाइन जर्मन परिसंघ का हिस्सा हुआ करता था. उस दौरान ऑस्ट्रिया और इटली के बीच भीषण युद्ध छिड़ गया. समझौते के तहत लिकटेंस्टाइन को ऑस्ट्रिया की मदद के लिए अपने सैनिक भेजे थे. सरकार ने बड़े धूमधाम के साथ अपने 80 चुनिंदा सैनिकों की एक टुकड़ी को सरहद पर जंग लड़ने के लिए रवाना कर दिया.
युद्ध का मैदान नहीं खूबसूरत वादियां
लिकटेंस्टाइन के ये 80 सैनिक देश की रक्षा और जीत का संकल्प लेकर मोर्चे की तरफ आगे बढ़े. लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था. ये सैनिक अपनी तयशुदा पोस्ट यानि टायरोल की पहाड़ी इलाके में जब तक पहुंचे, तब तक ऑस्ट्रिया और इटली के बीच का युद्ध खत्म हो चुका था. इन सैनिकों को दुश्मन सेना का आमना-सामना भी नहीं करना पड़ा. ऐसे में उन्होंने वहां पर खूबसूरत पहाड़ों और वादियों के मजे लिए. उन्होंने वहां आराम किया और करीब छह हफ्ते का समय बड़े ही मौज-मस्ती के काटा.
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जब 80 की फौज वतन लौटी तो हुई 81
जब इस टुकड़ी के वापस अपने वतन लौटने का वक्त आया तो जब वहां मौजूद अधिकारियों ने अपने सैनिकों की गिनती की तो उनके होश उड़ गए. मैदान में गए तो 80 लोग थे, लेकिन वहां 81 लोग खड़े थे. दरअसल वहां पर तैनाती के दौरान इन सैनिकों की दोस्ती एक इतालवी संपर्क अधिकारी से हो गई थी, जबकि कुछ इतिहासकार मानते हैं कि वो एक ऑस्ट्रियाई सैनिक था जो कि रास्ता भटक गया था. लिकटेंस्टाइन के सैनिकों का दोस्ताना व्यवहार देखकर वह शख्स उनका पक्का दोस्त बन गया और हमेशा के लिए उनके देश आ गया.
जब सेना को हमेशा के लिए कर दिया गया विदा
इस पूरे वाकये में सबसे खूबसूरत बात यह थी कि युद्ध के इतिहास में पहली बार किसी देश का न तो कोई जवान शहीद हुआ और न ही कोई जख्मी हुआ, बल्कि सेना एक नया दोस्त लेकर वापस आई. इस एतिहासिक और सुखद घटना से प्रेरित होकर वहां के शासक राजकुमार जोहान द्वितीय ने साल 1868 में एक बड़ा फैसला किया. उन्होंने तय किया कि देश का किसी के साथ कोई बैर ही नहीं है, तो सेना रखने का फालतू खर्चा क्यों उठाया जाए. इसके बाद उन्होंने इस देश की सेना को हमेशा के लिए भंग कर दिया.
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