कहां से हुई लोकतंत्र की शुरुआत? कहां बनी थी पहली पार्लियामेंट
एथेंस में जन्म लेने वाली लोकतांत्रिक व्यवस्था और आइसलैंड की पहली संसद आलथिंग से शुरू हुआ यह सफर आज आधुनिक विश्व में जनसत्ता का सबसे मजबूत स्तंभ बन चुका है.

'जनता का, जनता के लिए और जनता द्वारा शासन'- लोकतंत्र को परिभाषित करने वाली यह कहावत तो हम सभी ने सुनी है. आज भले ही संसद में चुने हुए प्रतिनिधि बैठकर देश की दिशा तय करते हैं, लेकिन इतिहास के पन्नों को पलटें तो शासन की यह व्यवस्था किसी चमत्कार से कम नहीं थी. राजा-महाराजाओं के दौर में आम आदमी की आवाज को सत्ता के केंद्र तक पहुंचाना एक क्रांतिकारी कदम था. प्राचीन काल से लेकर आधुनिक युग तक जनता के हाथों में ताकत आने और पहली संसद बनने का सफर बेहद दिलचस्प और ऐतिहासिक रहा है.
यूनान का एथेंस और जनसत्ता की शुरुआत
लोकतंत्र का पहला बीजारोपण आज से लगभग 2500 साल पहले यानी 5वीं सदी ईसा पूर्व में प्राचीन यूनान के एथेंस शहर में हुआ था. उस दौर में जब पूरी दुनिया पर तानाशाही और राजशाही का बोलबाला था, तब एथेंस के लोगों ने एक नई राह चुनी. उन्होंने फैसला किया कि राज्य का कोई भी निर्णय किसी एक राजा की मर्जी से नहीं, बल्कि आम लोगों की सहमति से होगा. ज्ञान और दर्शन का गढ़ माने जाने वाले एथेंस ने दुनिया को सिखाया कि आम नागरिक भी सरकार चलाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं.
खुद जाकर फैसला करने की अनूठी व्यवस्था
प्राचीन एथेंस में अपनाया गया लोकतंत्र आज के दौर से बिल्कुल अलग था. उस समय प्रतिनिधि चुनने का रिवाज नहीं था, बल्कि वहां के नागरिक सीधे सभाओं में इकट्ठा होते थे. किसी भी नए कानून को लागू करने या युद्ध का फैसला लेने के लिए नागरिक स्वयं वोट डालते थे. इसे इतिहास में प्रत्यक्ष लोकतंत्र कहा जाता है. यानी कानून बनाने से लेकर न्याय करने तक, फैसले की मेज पर आम जनता सीधे बैठकर अपनी राय देती थी.
यह भी पढ़ें: इस रेलवे स्टेशन का नाम इतना लंबा कि बोलना मुश्किल, फिर कैसे रहता है याद?

शुरुआती दौर में सीमित थे अधिकार
हालांकि एथेंस ने लोकतंत्र की बुनियाद रखी, लेकिन उस जमाने में हर किसी को वोट देने का हक नहीं था. इतिहास की यह एक बड़ी विडंबना रही कि वहां सिर्फ स्वतंत्र पुरुष नागरिकों को ही सभा में भाग लेने की इजाजत थी. समाज की महिलाओं, गुलामों और बाहर से आकर बसे व्यापारियों को इस लोकतांत्रिक प्रक्रिया से पूरी तरह बेदखल रखा गया था. इसके बावजूद, आम लोगों को अधिकार देने की इस शुरुआत ने आने वाली सदियों के लिए एक मजबूत नींव जरूर तैयार कर दी थी.
आइसलैंड में बनी दुनिया की पहली संसद
जब बात दुनिया की सबसे पुरानी और पहली पार्लियामेंट यानी संसद की आती है, तो इसका श्रेय यूरोपीय देश आइसलैंड को जाता है. वर्ष 930 ईस्वी में आइसलैंड में दुनिया की पहली संसद की स्थापना हुई थी, जिसे स्थानीय भाषा में 'आलथिंग' कहा जाता है. उस दौर में वाइकिंग सरदारों और कबीलों के प्रमुखों ने मिलकर एक राष्ट्रीय सभा बनाई, ताकि पूरे क्षेत्र के लिए एक समान नियम बनाए जा सकें और लोगों के आपसी विवाद निपटाए जा सकें.
खुले मैदान से राजधानी तक का सफर
आइसलैंड की यह ऐतिहासिक संसद शुरुआत में किसी भव्य इमारत में नहीं चलती थी. इसकी बैठकें 'थिंग्सवेलिर' नाम के एक खुले मैदान में चट्टानों के बीच आयोजित की जाती थीं, जहां लोग हर साल एकत्र होते थे. समय बीतने के साथ यह व्यवस्था इतनी मजबूत हुई कि सदियों बाद भी कायम रही. आज यह ऐतिहासिक संसद आइसलैंड की राजधानी रेक्याविक में एक आधुनिक इमारत में स्थित है और इसे दुनिया की सबसे पुरानी निरंतर चलने वाली संसद का गौरव प्राप्त है.

प्रतिनिधि व्यवस्था और आधुनिक गणतंत्र
समय का पहिया बदलने के साथ-साथ प्रत्यक्ष लोकतंत्र की जगह 'प्रतिनिधि लोकतंत्र' ने ले ली. आबादी बढ़ने के कारण हर नागरिक का एक जगह जमा होना मुश्किल हो गया, इसलिए जनता अपने नेताओं को चुनकर संसद भेजने लगी. भारत जैसे विशाल देश में आजादी के बाद 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के साथ ही लोकतंत्र ने एक नया और व्यापक रूप लिया. आज भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक गणराज्य है, जहां हर बालिग नागरिक को समान वोट देने का अधिकार है.
यह भी पढ़ें: इस गांव में आज भी चलता है राजा का राज, क्या नहीं माना जाता देश का कानून?






















