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Harpic vs Godrej Dispute: क्या बोतल की डिजाइन का भी होता है कॉपीराइट, हार्पिक और गोदरेज इसी विवाद को लेकर पहुंची सुप्रीम कोर्ट

Harpic vs Godrej Dispute: हार्पिक और गोदरेज के बीच कानूनी विवाद चल रहा है. इसी बीच आइए जानते हैं कि क्या किसी बोतल के डिजाइन का कॉपीराइट लिया जा सकता है या नहीं.

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  • हार्पिक और गोदरेज के बीच बोतल के डिजाइन पर कानूनी लड़ाई चल रही है।
  • डिजाइन अधिनियम 2000 के तहत उत्पाद की बाहरी बनावट को सुरक्षा मिलती है।
  • हार्पिक बोतल के अनोखे डिजाइन को ब्रांड पहचान बताता है, गोदरेज उत्पादकता पर जोर देता है।
  • गोदरेज का दावा है कि हार्पिक के डिजाइन की सुरक्षा अवधि समाप्त हो चुकी है।

Harpic vs Godrej Dispute: आपने हार्पिक की जानी-पहचानी नीली बोतल तो जरूर देखी होगी. यह बोतल थोड़ी झुकी हुई होती है, गर्दन टेढ़ी होती है और इस पर लाल ढक्कन लगा होता है. यह बोतल अब एक बड़ी कानूनी लड़ाई का हिस्सा बन चुकी है. दरअसल यह विवाद तब शुरू हुआ जब गोदरेज ने एक टॉयलेट क्लीनर लॉन्च किया. इसकी बोतल का आकार और बनावट हार्पिक की बोतल से मिलता जुलता है. इसके बाद डिजाइन के मालिकाना हक को लेकर एक कानूनी टकराव शुरू हो गया. यह विवाद अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है. इसी बीच आइए जानते हैं कि क्या किसी बोतल के डिजाइन का सच में कॉपीराइट लिया जा सकता है या नहीं.

डिजाइन सुरक्षा के बारे में कानून क्या कहता है? 

भारत में किसी प्रोडक्ट की बाहरी बनावट की सुरक्षा डिजाइन अधिनियम 2000 के तहत की जाती है. यह कानून किसी भी चीज के काम करने के तरीके के बजाय इसकी बाहरी बनावट, यानी कि उसके आकार, पैटर्न या फिर सजावट को सुरक्षित रखने पर जोर देता है. आसान शब्दों में कहें तो अगर किसी प्रोडक्ट का डिजाइन अनोखा है और वह देखने में आकर्षक लगता है तो उसे इस कानून के तहत रजिस्टर करवा कर सुरक्षित किया जा सकता है. 

लेकिन इसके लिए कुछ कड़ी शर्ते हैं. डिजाइन बिल्कुल नया होना चाहिए और रजिस्ट्रेशन से पहले उसे आम लोगों के सामने जाहिर नहीं किया गया होना चाहिए. यह डिजाइन पहले से मौजूद किसी ट्रेडमार्क या कॉपीराइट से मेल नहीं खाना चाहिए. सबसे जरूरी बात यह है कि यह डिजाइन सिर्फ काम करने के मकसद से बनाया गया नहीं होना चाहिए. इस कानून के तहत सुरक्षा शुरू में 10 साल के लिए मिलती है. इसे 5 साल और बढ़ाया जा सकता है. इस तरह कुल मिलाकर 15 साल तक की सुरक्षा मिल सकती है.

क्या है हार्पिक का तर्क?

हार्पिक की मूल कंपनी का तर्क है कि इसकी बोतल का अनोखा आकर सिर्फ एक डिजाइन नहीं है, बल्कि यह उसकी ब्रांड पहचान का एक हिस्सा है. उनके मुताबिक बोतल की टेढ़ी गर्दन और उसके खास बनावट की वजह से ग्राहक लेबल देखे बिना भी तुरंत उस प्रोडक्ट को पहचान लेते हैं. हार्पिक का दावा है कि इसी वजह से इस डिजाइन पर सिर्फ उनका ही अधिकार है. 

क्या है गोदरेज का तर्क?

दूसरे तरफ गोदरेज ने इस दावे को चुनौती देते हुए यह तर्क दिया है की  हार्पिक के डिजाइन को मिली सुरक्षा की समय सीमा पहले ही खत्म हो चुकी है. इससे भी जरूरी बात यह है कि गोदरेज का दावा है कि बोतल की टेढ़ी गर्दन का मकसद सिर्फ काम को आसान बनाना है. यानी इसकी मदद से टॉयलेट के किनारे के नीचे की सफाई आसानी से हो जाती है. यानी किसी एक कंपनी का इस पर एकाधिकार नहीं हो सकता.

यह भी पढ़ें:  देश की आजादी के बाद कहां था कांग्रेस का मुख्यालय, 24 अकबर रोड वाले बंगले में पार्टी कब हुई थी शिफ्ट?

स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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