न शेरवानी, न सेहरा… यहां शादी से पहले दूल्हे को देना होता है अजीबो-गरीब फिटनेस टेस्ट, तब मिलती है दुल्हन
दुनिया में एक जगह ऐसी है, जहां शादी का सपना तभी पूरा होता है जब तक एक अजीब परंपरा के तहत फिटनेट टेस्ट न पास कर लिया जाए. इसे पूरा करने के बाद ही दूल्हे को दुल्हन का साथ मिलता है.

दुनिया में शादी जहां खुशी, गहनों और सजावट से जुड़ी होती है, वहीं एक ऐसी जगह भी है जहां दूल्हे को शादी से पहले जान की बाजी लगानी पड़ती है. यहां शादी सिर्फ दो लोगों का रिश्ता नहीं, बल्कि हिम्मत और मर्दानगी की परीक्षा होती है. अफ्रीका की धरती पर स्थित एक जनजाति में लड़के को दुल्हन पाने से पहले बैलों की पीठ पर दौड़ना पड़ता है, वो भी बिना गिरे, बिना रुके. यही तय करता है कि वह शादी के लायक है या नहीं.
किस तरह देना होता है फिटनेस टेस्ट?
दुनिया की सबसे अनोखी और खतरनाक परंपराओं में से एक है इथियोपिया की हमर जनजाति की शादी से जुड़ी रस्म. यहां दूल्हा बनने का हक किसी को यूं ही नहीं मिलता. इसके लिए उसे अपनी बहादुरी और फिटनेस साबित करनी होती है. और तरीका है बैलों की पीठ पर दौड़ लगाना! यह परंपरा उकुली बुला के नाम से जानी जाती है और इसे जनजाति के युवाओं के जीवन का सबसे अहम मोड़ माना जाता है.
प्रकृति पर निर्भर है इनका जीवन
हमर जनजाति इथियोपिया के दक्षिण-पश्चिम में ओमो नदी घाटी के आसपास रहती है. इस जनजाति की संख्या देश की कुल आबादी का मात्र 0.1 प्रतिशत है. लेकिन इनकी परंपराएं दुनिया भर के शोधकर्ताओं और पर्यटकों के लिए हमेशा आकर्षण का केंद्र रही हैं. इनका जीवन पूरी तरह प्रकृति पर निर्भर है, शहद इकट्ठा करना, पशुपालन और सामुदायिक जीवन इनकी पहचान है.
कैसे निभाई जाती है रस्म?
उकुली बुला की रस्म तीन दिन तक चलती है. इसमें युवक को चार से लेकर आठ बैलों की पीठ पर बिना गिरे कई बार दौड़ना पड़ता है. अगर वह बीच में गिर गया या डर गया, तो उसे अगली बार तक इंतजार करना पड़ता है. लेकिन अगर वह सफल हो गया, तो उसे शादी करने, मवेशी पालने और जनजाति में माजा की उपाधि पाने का अधिकार मिल जाता है. यह रस्म आमतौर पर अक्टूबर या नवंबर में होती है, जब खेतों में काम खत्म हो चुका होता है.
बेंत से पीटती हैं महिलाएं
इस समारोह का एक और हैरान करने वाला पहलू है, महिलाएं. रस्म के दौरान महिलाएं खुद को बेंत से पीटने की अनुमति देती हैं. यह दर्द, उनके समर्पण और वफादारी का प्रतीक माना जाता है. उनकी पीठ पर बने निशान जनजाति में सम्मान और प्रेम का चिन्ह बन जाते हैं. यह प्रक्रिया दर्दनाक जरूर है, लेकिन उनके लिए गर्व का विषय होती है.
नई जिंदगी की शुरुआत का प्रतीक
रस्म पूरी होने के बाद गांव में खुशी का माहौल होता है. लोग नाचते-गाते हैं, बीयर और कॉफी परोसी जाती है, महिलाएं पारंपरिक आभूषण पहनती हैं और ढोल की थाप पर दिन-रात उत्सव चलता है. यह केवल शादी की तैयारी नहीं, बल्कि नई जिंदगी की शुरुआत का प्रतीक होता है. हमर जनजाति की यह परंपरा आज भी अपनी मौलिकता के साथ कायम है. यहां हर साल सैकड़ों पर्यटक पहुंचते हैं जो इस अनोखे रिवाज को अपनी आंखों से देखने आते हैं. तस्वीरें लेना भी यहां की संस्कृति का हिस्सा माना जाता है, क्योंकि हमर लोग इसे अपनी बहादुरी और विरासत का प्रदर्शन समझते हैं.
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