गुरुग्राम में आज WFH, इस शहर के नीचे किस नदी को किया गया था दफन?
मूसलाधार बारिश से गुरुग्राम जलमग्न हो गया और दफ्तरों को आज वर्क फ्रॉम होम करना पड़ा है. जिसकी मुख्य वजह शहर के प्राकृतिक नालों और साहिबी नदी का कंक्रीट के नीचे दबकर गंदे नाले में बदल जाना है.

आज मंगलवार सुबह से जारी मूसलाधार बारिश ने पूरे दिल्ली-एनसीआर की रफ्तार थाम दी है. गुरुग्राम की मुख्य सड़कों से लेकर व्यस्त चौराहों तक कई फीट पानी जमा हो गया है, जिससे वाहन घंटों जाम में फंसे रहे. हालात को देखते हुए जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (DDMA) ने तुरंत गाइडलाइन जारी कर सभी सरकारी व निजी दफ्तरों को वर्क फ्रॉम होम (WFH) और स्कूलों को ऑनलाइन क्लास चलाने के निर्देश दिए. लेकिन हर मानसून में गुरुग्राम के जलमग्न होने की असली वजह केवल तात्कालिक बारिश नहीं, बल्कि इस आधुनिक शहर के नीचे दबा इसका अपना जल-इतिहास है. क्या आपको पता है कि इस शहर के नीचे साहिबी नाम की नदी दफन है, जिसका अस्तित्व अब लगभग खो चुका है. चलिए इसके बारे में और जानें.
चमकती इमारतों के नीचे दबी साहिबी नदी
आज का गुरुग्राम अपनी गगनचुंबी इमारतों और मल्टीनेशनल कंपनियों के लिए जाना जाता है. मगर इसी जगह कभी साहिबी नाम की एक जीवनदायिनी नदी बहा करती थी. यह नदी राजस्थान के सीकर जिले की पहाड़ियों से निकलकर अलवर और रेवाड़ी के रास्ते आगे बढ़ती थी. इसके बाद यह गुरुग्राम के पास से गुजरती हुई पश्चिमी दिल्ली में दाखिल होती थी और नजफगढ़ को पार करते हुए वजीराबाद के पास यमुना में समाहित हो जाती थी.
पहाड़ों से मैदान तक कितनी लंबी थी साहिबी की धारा?
साहिबी नदी इस पूरे क्षेत्र की जीवनरेखा थी. लगभग 300 किलोमीटर लंबी यह धारा मानसून के दौरान विशाल जलमग्न इलाके और वेटलैंड्स बनाती थी. इनमें सबसे प्रमुख थी नजफगढ़ झील, जो 300 वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में फैली थी. बारिश के दिनों में यह झील और नदी प्राकृतिक स्पंज की तरह काम करते थे, जो अतिरिक्त पानी को सोखकर आसपास के इलाकों को बाढ़ से बचाए रखते थे.
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पुराने दौर की साफ-सुथरी नदी
ऐतिहासिक और पुरातात्विक साक्ष्यों के अनुसार साहिबी नदी का संबंध वैदिक काल से रहा है. इसके किनारों पर कई प्राचीन बस्तियां बसी थीं. स्थानीय जानकारों और नदी संरक्षण से जुड़े संगठनों के अनुसार, साहिबी का जल कभी इतना साफ हुआ करता था कि ग्रामीण इसका इस्तेमाल पीने, मवेशियों को नहलाने और खेती के लिए करते थे. यह मौसमी नदी इस पूरे इलाके के भूजल स्तर को रिचार्ज रखने का मुख्य जरिया थी.
कुदरती बदलाव और इंसानी दखल से बना नाला
मुगल काल में आए एक शक्तिशाली भूकंप के बाद नदी के प्राकृतिक प्रवाह में बदलाव आया और पानी एक बड़े हिस्से में इकट्ठा होकर नजफगढ़ झील के रूप में तब्दील हो गया. इसके बाद 19वीं सदी में औपनिवेशिक शासन के दौरान इंसानी हस्तक्षेप बढ़ा. साल 1865 में अंग्रेजों ने कृषि भूमि निकालने के उद्देश्य से झील के निचले हिस्से में एक गहरी नहर खोदी. इसी निकासी मार्ग को बाद में नजफगढ़ नाले का नाम मिला.
साफ पानी से गंदे नाले तक का सफर
अंग्रेजों द्वारा खोदे गए मार्ग के बावजूद कई दशकों तक इस धारा में साफ पानी बहता रहा. 1960 के दशक तक इसमें मछलियां तैरती थीं. साठ के दशक की शुरुआत में दिल्ली के जखीरा इलाके की एक वनस्पति घी फैक्ट्री से भारी मात्रा में तेल गलती से इस नाले में गिर गया था. सर्दियों के कारण तेल पानी की सतह पर जम गया, जिसे स्थानीय लोगों ने जमा करके घरेलू इस्तेमाल में लिया था. यह घटना दर्शाती है कि तब तक यह जल निकाय कितना जीवंत था.
कारखानों की गंदगी और घुटती हवा
बीते कुछ दशकों में हुए अंधाधुंध शहरीकरण, बिना ट्रीट किए गए सीवेज और औद्योगिक कचरे के सीधे निष्कासन ने इस नदी का अस्तित्व खत्म कर दिया. आज दिल्ली और गुरुग्राम का जहरीला कचरा इसमें गिरता है. गर्मियों में इसके पानी से मीथेन और हाइड्रोजन सल्फाइड जैसी गैसें निकलती हैं, जिनकी बदबू दूर-दूर तक फैलती है. पर्यावरण विशेषज्ञों ने अब साहिबी को आधिकारिक रूप से मृत नदी घोषित कर दिया है.

गुरुग्राम में क्यों भरता है पानी?
गुरुग्राम में हर बारिश में आने वाली बाढ़ का सबसे बड़ा कारण इसकी प्राकृतिक जल निकासी प्रणाली का नष्ट होना है. अतीत में इस शहर में बारिश का पानी निकालने वाले लगभग 60 प्राकृतिक नाले थे जो साहिबी नदी से जुड़ते थे. आज अनियंत्रित निर्माण के कारण इनमें से केवल 4 नाले ही बचे हैं, जबकि 56 नाले सड़कों और इमारतों के नीचे दब चुके हैं. जब कुदरती रास्ते बंद हो जाते हैं, तो बारिश का पानी सड़कों पर भर जाता है.
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