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कम हो रहे हैं घास के मैदान, जानवरों के लिए होगी मुसीबत, कार्बन ज्यादा होगा तो इंसानों को लगेंगी नई बीमारियां

16 साल के अध्ययन से यह खुलासा हुआ है कि घास चरने वाले जानवर पारिस्थितिकी तंत्र के लिए बेहद महत्वपूर्ण होते हैं. आइए डिटेल में जानते हैं.

Climate Change: जलवायु पर एक लंबा अध्ययन किया गया है. इसमें पाया गया है कि पहाड़ों पर जानवरों के चराई (Grazing) की गतिविधि जलवायु (Climate Change) परिवर्तन नियंत्रण में लाभकारी साबित हो सकती है. अध्ययन में यह पता चला है कि जिस जमीन पर चराई नहीं की जाती है वहां की मिट्टी में कार्बन की मात्रा में असंतुलित रूप से उतार चढ़ाव होने लगते हैं जिससे क्लाइमेट चेंज पर प्रभाव पड़ सकता है.

पहाड़ों की मिट्टी की घास पर्यावरण के लिहाज से बहुत जरूरी होती है. पहाड़ों की मिट्टी का ऊपरी आवरण पहाड़ों में जानवरों की चराई (Grazing) के लिए जरूरी तो होता ही है, इसके साथ ही यह पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) में मिट्टी में कार्बन के भंडार को संतुलित  बनाए रखने के लिए भी उपयोगी होता है.

16 साल के अध्ययन ने किया खुलासा

16 साल के अध्ययन से यह खुलासा हुआ है कि घास चरने वाले जानवर पारिस्थितिकी तंत्र के लिए बेहद महत्वपूर्ण होते हैं. चराई की अनुपस्थिति का वैश्विक कार्बन चक्र (Carbon Cycle) पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है. ऐसे में, जलवायु परिवर्तन रोकने में चराई की गतिविधि एक बड़ी भूमिका निभा सकती है. यह अध्ययन सेंटर फॉर इकोलॉजीकल साइंसेस और दे जिवेचा सेंटर फॉर क्लाइमेट चेंज, भारतीय विज्ञान संस्थान, (Indian Institute of Science) के रिसर्चर्स ने किया है. इसमें उन्होंने बताया है कि प्रयोगात्मक तौर पर चराई हटाने से मिट्टी में कार्बन के स्तर में उतारचढ़ाव आता है. उससे भी बड़ी बात यह है कि यह चेंज असंतुलित रूप से देखने को मिल सकता है.

ऐसे हुई अध्ययन की शुरुआत

शोधकर्ताओं ने साल 2005 में अध्ययन की शुरुआत की. साल 2005 में सीईएस के एसोसिएट प्रोफेसर सुमंता बागची ने अपनी पीएचडी के दौरान चराने वाले जानवरों का हिमालय के पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन शुरू किया था. अपनी टीम के साथ उन्होंने कुछ प्लॉट तैयार किए थे, जहां जानवर चराई नहीं कर सकें और कुछ प्लॉट में याक और आइबेक्स जैसे जानवरों को चरने के लिए छोड़ा गया था. इन दोनों इलाकों से रिसर्चर्स ने एक दशक तक मिट्टी के नमूने इकठ्ठे किए.

इसके बाद साल दर साल हर प्लॉट में उनकी रासायनिक संरचना, ट्रैकिंग और कार्बन और नाइट्रोजन के स्तरों की तुलना करके देखी. उन्होंने पाया कि एक के बाद एक साल बाद मिट्टी के कार्बन स्तर में दूसरे प्लॉट के मुकाबले 30 से 40 प्रतिशत तक ज्यादा उतार चढ़ाव देखने को मिला, जहां जानवर नहीं थे. वहीं हर साल चरने वाले जानवरों के प्लॉट में यह स्तर स्थिर सा ही दिखाई दिया.

शोधकर्ताओं ने बताई यह वजह

शोधकर्ताओं ने पाया कि कार्बन के स्तर में उतार चढ़ाव के पीछे प्रमुख वजह नाइट्रोजन था, जो मिट्टी की स्थितियों के अनुसार कार्बन भंडार को स्थिर या अस्थिर कर सकता है. पिछले कई अध्ययनों ने लंबे अंतराल में कार्बन और नाइट्रोजन के स्तरों के मापन पर ध्यान आकर्षित किया है. बताया गया है कि कार्बन का जमा होना या फिर उसकी कमी होना एक धीमा प्रोसेस है, लेकिन शोधकर्ताओं द्वारा पेश किए गए सालाना बदलाव कुछ अलग ही तस्वीर पेश करते हैं. शोधकर्ताओं के अनुसार, चराई वाले पारिस्थितिकी तंत्र पृथ्वी की जमीन का 40% हिस्सा होते हैं. शाकाहारी जीव मिट्टी और कार्बन को स्थिर रखने का काम करते हैं. इसलिए जलवायु परिवर्तन को कम करने लिए उनको संरक्षित करना बहुत जरूरी है. 

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