Election Commission of India: अब तक अपने कितने फैसले बदल चुका चुनाव आयोग, क्यों लेना पड़ा इन्हें वापस?
Election Commission of India: हाल ही में भारत निर्वाचन आयोग ने एसआईआर घोषणा को फॉर्म 6 से अलग कर दिया है. इसी बीच आइए जानते हैं कि अब तक अपने कितने फैसलों को चुनाव आयोग बदल चुका है.

- चुनाव आयोग ने फॉर्म 6 से SIR घोषणा पत्र हटाया।
- आईटी विभाग की पुरानी प्रशासनिक निगरानी प्रक्रिया बहाल हुई।
- आंतरिक मतभेद और कानूनी दबाव से नौ फैसले बदले।
Election Commission of India: भारत निर्वाचन आयोग ने हाल के हफ्तों में मतदाता सूची के विशेष ग्रहण पुनरीक्षण और आंतरिक प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर हुए विवाद के बीच कई फैसलों को बदला है या फिर वापस ले लिया है. सबसे हालिया बदलाव के तहत एसआईआर घोषणा को ऑनलाइन फॉर्म 6 से अलग कर दिया गया है. इस फॉर्म का इस्तेमाल नए मतदाताओं को पंजीकृत करने या फिर सूची से हटाए गए नामों को फिर से जोड़ने के लिए किया जाता है.
जिन राज्यों में एसआईआर चल रहा है वहां अब आवेदकों को फॉर्म 6 और घोषणा पत्र दोनों को ECINet पोर्टल के जरिए अलग-अलग जमा करना होगा. पहले यह घोषणा फॉर्म 6 का ही हिस्सा होती थी और आवेदकों को इसका जवाब देना पड़ता था. इन फैसलों को पलटने से आयोग के अंदर मतभेद, कानूनी सवालों और मतदाता डेटा तक पहुंच को लेकर चिंताओं पर ध्यान गया है. इसी बीच आइए जानते हैं कि अब तक चुनाव आयोग अपने कितने फैसले बदल चुका है और क्या थी इसके पीछे की वजह.
फॉर्म 6 घोषणा पत्र
आयोग ने फॉर्म 6 में बदलाव किया था. इसके तहत आवेदकों को यह बताना होता था कि क्या उनका अपना नाम या उनके माता-पिता या दादा-दादी/नाना नानी का नाम, पहले की किसी एसआईआर मतदाता सूची में शामिल था या फिर नहीं. इस शर्त को लेकर भारत निर्वाचन आयोग के अंदर ही विवाद खड़ा हो गया.
चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार द्वारा लिए गए इस फैसले पर आपत्ति जताई. बढ़ते मतभेदों के बीच आयोग ने नवंबर के पहले हफ्ते में फॉर्म 6 से एसआईआर घोषणा पत्र वाले कॉलम को हटा दिया. अब जिन राज्यों में पुनरीक्षण चल रहा है वहां यह घोषणा पत्र ECINet पर अलग से जमा किया जाता है.

आईटी विभाग पर निगरानी बहाल
एक और बदलाव आयोग के आईटी विभाग के प्रशासनिक निगरानी से जुड़ा हुआ है. इसकी हेड सीमा खन्ना हैं. इससे पहले जारी एक आदेश में वरिष्ठ स्तर की निगरानी को हटा दिया गया था और आधिकारिक फाइलों के लिए तय प्रक्रिया को बदल दिया गया था. संधू और जोशी ने डिजिटल मतदाता डेटाबेस के सेंट्रलाइजेशन को लेकर चिंता जताई और कहा की राज्य स्तरीय अधिकारियों के पास इस तक पूरी पहुंच नहीं है. उन्होंने इस संबंध में कैबिनेट सचिव को पत्र भी लिखा. 4 नवंबर 2026 को भारत निर्वाचन आयोग ने एक नया आदेश जारी करके पुरानी प्रक्रिया को बहाल कर दिया और खन्ना को निर्देश दिया कि वह फाइल सीनियर डिप्टी इलेक्शन कमिश्नर के जरिए से भेजें.

आपत्तियों के बाद 9 फैसलों में बदलाव
पिछले साल परिचालन प्रक्रियाओं, मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने, और आईटी प्रबंधन से जुड़े फैसलों पर आंतरिक आपत्ति उठने के बाद कुछ और बदलाव किए गए. रिपोर्ट्स के मुताबिक दो चुनाव आयुक्तों ने मुख्य चुनाव आयुक्त के फसलों पर कम से कम 14 मौकों पर लिखित आपत्तियां दर्ज कराई थीं. इस अस्ति और सार्वजनिक विवाद के बाद आयोग ने सितंबर 2026 के आखिर में एक खास बैठक बुलाई और 9 ऐसे फैसले लिए जो संधू और जोशी द्वारा उठाई गई प्रशासनिक और प्रक्रियात्मक चिंता को संबोधित करते थे.
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आयोग ने अपना रुख क्यों बदला?
आंतरिक असहमति इसकी एक बड़ी वजह थी. नियमों के मुताबिक फैसले आम सहमति या फिर बहुमत से लिए जाने चाहिए लेकिन कई मामलों में दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों को नजरअंदाज कर दिया गया. इस विवाद के चलते आयोग को अपने पुराने आदेशों पर सामूहिक रूप से फिर से विचार करना पड़ा.
कानूनी जांच भी एक और वजह थी. यह मामला तब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया जब आरोप लगाए गए की मतदाता सूची के विशेष सारांश पुनरीक्षण यानी एसएसआर के दौरान लगभग 13 करोड़ नाम हटा दिए गए हैं. कोर्ट की टिप्पणी और फॉर्म 6 दाखिल किए जाने के बाद आयोग ने अपनी कानूनी स्थिति साफ करने के लिए कुछ संशोधन को वापस ले लिया.
विपक्षी दलों ने भी विरोध प्रदर्शन के जरिए दबाव बनाया. लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और दूसरे दलों ने मतदाता सूची में गड़बड़ी और वोटों की चोरी का आरोप लगाया. डेटा के साथ छेड़छाड़ की आशंका भी जताई गई क्योंकि राज्य के अधिकारियों के पास डिजिटल मतदाता डेटाबेस तक पूरी पहुंच नहीं थी.
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