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Iran Nuclear: परमाणु बम बनाने में किन-किन चीजों का होता है इस्तेमाल, ईरान इसके कितना करीब?

Iran Nuclear: न्यूक्लियर प्रोग्राम को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच तनाव जारी है. आइए जानते हैं कि न्यूक्लियर बम को बनाने में किन चीजों का इस्तेमाल होता है और ईरान इसके कितने करीब है.

Iran Nuclear: अमेरिका और ईरान ने हाल ही में तेहरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम पर जिनेवा में इनडायरेक्ट बातचीत का दूसरा राउंड किया. ओमान द्वारा मीडिएटिड लगभग 3 घंटे की इस मीटिंग को कंस्ट्रक्टिव बताया गया. हालांकि कोई भी फाइनल एग्रीमेंट नहीं हुआ है. लेकिन डिप्लोमेटिक प्रेशर बढ़ने और मिलिट्री टेंशन के बढ़ने के साथ ही एक बड़ा सवाल बना हुआ है कि न्यूक्लियर वेपंस को बनाने में असल में क्या चाहिए होता है और ईरान ऐसा करने के कितने करीब है? आइए जानते हैं.

न्यूक्लियर बम के मुख्य कंपोनेंट क्या हैं?

न्यूक्लियर वेपंस को बनाना सिर्फ रेडियोएक्टिव पदार्थ होने से नहीं होता. इसके लिए खास फ्यूल, एडवांस्ड इंजीनियरिंग और डिलीवरी सिस्टम के कॉम्बिनेशन के काफी जरूरत होती है. सबसे जरूरी कंपोनेंट फिसाइल पदार्थ है. इसमें या तो हाईली एनरिच्ड यूरेनियम या फिर प्लूटोनियम 239 की जरूरत होती है. 

नेचुरल यूरेनियम में आइसोटोप यू-235 का सिर्फ 0.7% होता है. वेपन ग्रेड होने के लिए यूरेनियम को लगभग 90% प्योरिटी तक एनरिच्ड किया जाना चाहिए. इस प्रक्रिया को सेंट्रीफ्यूज का इस्तेमाल करके किया जाता है. एक बम के लिए आमतौर पर लगभग 15 से 25 किलोग्राम हाईली एनरिच्ड यूरेनियम की जरूरत होती है. इसके अलावा प्लूटोनियम 239 को न्यूक्लियर रिएक्टर में यूरेनियम 238 से बनाया जाता है. सिर्फ 4 से 6 किलोग्राम प्लूटोनियम एक शक्तिशाली न्यूक्लियर धमाका करने के लिए काफी हो सकता है. 

वेपनाइजेशन और डेटोनेशन सिस्टम 

फिसाइल पदार्थ मिलने के बाद भी इसे एक काम करने वाले बम में बदलने के लिए कंपलेक्स वेपनाइजेशन की जरूरत होती है. इसमें न्यूक्लियर कोर को ठीक समय पर हाई एक्सप्लोसिव का इस्तेमाल करके  कंप्रेस करना शामिल है. स्पेशल अल्ट्रा फास्ट इलेक्ट्रॉनिक स्विच, जिन्हें अक्सर क्राइट्रॉन कहा जाता है, कुछ ही मिली सेकंड के अंदर एक्सप्लोसिव को एक साथ ट्रिगर करते हैं. एक न्यूट्रॉन इनिशिएटर का इस्तेमाल चेन रिएक्शन को ठीक उस समय शुरू करने के लिए किया जाता है जब कोर क्रिटिकल मास तक पहुंचता है. इस रिएक्शन को रफ्तार देने के लिए बेरिलियम जैसे रिफ्लेक्टर पदार्थ का भी इस्तेमाल किया जा सकता है. 

डिलीवरी सिस्टम 

किसी भी न्यूक्लियर डिवाइस को स्ट्रैटेजिक वेपन में बदलने के लिए किसी देश को उसे डिलीवरी सिस्टम पर माउंट करने में सक्षम होना चाहिए. यह आमतौर पर एक लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल होती है. 

ईरान न्यूक्लियर वेपंस के कितने करीब 

ईरान ने यूरेनियम को 60% प्रायोरिटी तक एनरिच किया है. टेक्निकली, वेपन ग्रेड पदार्थ के लिए जरूरी 60% से 90% तक जाना एनरिचमेंट के पहले के स्टेज की तुलना में काफी छोटा टेक्निकल स्टेप है. ब्रेकआउट टाइम का मतलब होता है कि अगर कोई देश एक बम के लिए काफी फिसाइल मटेरियल जमा करने का फैसला करता है तो उसे कितना समय लगेगा. ईरान के मामले में यह समय कुछ हफ्ते या फिर कुछ दिनों का हो चुका है. लेकिन वेपन ग्रेड मटेरियल बनाना इतना आसान नहीं है. एक्सपर्ट्स का ऐसा अंदाजा है कि पदार्थ को वेपनाइज करने, मिसाइल पर लगाने और जरूरी टेस्टिंग करने में 6 महीने से 1 साल तक का और समय लग सकता है. 

डिप्लोमेटिक प्रेशर और स्ट्रैटेजिक टेंशन 

हाल ही में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कथित तौर पर ईरान को चेतावनी दी है कि उसके पास डील करने के लिए 10 से 15 दिन है. अमेरिका यूरेनियम एनरिचमेंट और मिसाइल डेवलपमेंट को पूरी तरह से रोकने की मांग कर रहा है.

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स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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