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चीन में इस भारतीय डॉक्टर की करते हैं पूजा, युद्ध के समय बचाई थी हजारों चीनी सैनिकों की जान

आज भले ही भारत और चीन के बीच रिश्ते अच्छे नहीं है. लेकिन चीन आज भी एक भारतीय डॉक्टर का मुरीद है, जिसने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हजारों चीनी सैनिकों की जान बचाकर उन्हें नया जीवन दिया था.

 भारत का पड़ोसी देश चीन है. लेकिन 1962 भारत-चीन युद्ध से लेकर आज तक इन दोनों देश के बीच तनाव बना रहा है. अभी कुछ समय पहले भी सीमा को लेकर दोनों देशों के सैनिकों के बीच तनाव की स्थिति बनी थी. लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस तनाव के बावजूद चीन एक भारतीय डॉक्टर का मुरीद है, जी हां, चीन के लोग आज भी डॉ. द्वारकानाथ कोटनिस को भगवान की तरह मानते हैं और उनकी इज्जत करते हैं. आज हम आपको बताएंगे कि भारत के मूल निवासी डॉक्टर द्वारकानाथ ने चीनी सैनिकों की जान कब और कैसे बचाई थी.

द्वितीय विश्व युद्ध

बता दें कि द्वितीय विश्व युद्ध से लगभग एक साल पहले साल 1937 में चीन और जापान के बीच लड़ाई शुरू हुई थी. जब जापान ने चीन पर हमला किया था, उस वक्त चीन ने अमेरिका, ब्रिटेन समेत दुनिया के तमाम देशों से मदद मांगी थी. उस वक्त चीनी जनरल ने पंडित जवाहरलाल नेहरू को भी चिट्ठी लिखी थी. हालांकि उस वक्त भारत खुद आजाद नहीं था. लेकिन इसके बावजूद उन्होंने मानवता के नाते चीन में डॉक्टरों की एक टीम भेजने को लेकर कई लोगों से विचार करना शुरू किया था. 

पंडित जवाहरलाल नेहरू की बात को उस वक्त कांग्रेस के सभी वरिष्ठ नेताओं ने माना और भारतीय डॉक्टरों की टीम को भेजने के लिए लोगों से अपील की गई थी. कांग्रेस ने इस सार्वजनिक अपील को जारी किया था और कहा था जो लोग इस डॉक्टर्स की टीम का हिस्सा बनना चाहते हैं, वह अपना नाम कांग्रेस पार्टी को सौंप सकते हैं.

डॉ. द्वारकानाथ कोटनिस

महाराष्ट्र के सोलापुर में 10 अक्टूबर 1910 को एक मध्यमवर्गीय परिवार में पैदा हुए द्वारकानाथ कोटनिस ने मेडिकल की पढ़ाई पूरी कर ली थी. इसके बाद वह उस सम पोस्ट ग्रेजुएशन की तैयारी में जुटे थे. लेकिन उनकी ख्वाहिश हमेशा से दुनिया घूमकर लोगों की सेवा करने की थी. जब उन्हें कांग्रेस की अपील के बारे में पता चला , तो उन्होंने तुरंत चीन जाने का मन बना लिया था. साल 1938 में कांग्रेस ने इसके लिए पांच डॉक्टरों की एक टीम बनाई और उन्हें चीन रवाना कर दिया था. उस समय कांग्रेस ने इन डॉक्टरों को चीन भेजने के लिए 22000 रुपये चंदा जुटाया था और मेडिकल सामान के साथ इन्हें चीन रवाना किया था. बता दें कि उस समय चीन की मदद के लिए एशिया के किसी देश से पहुंचने वाली भारत की पहली टीम थी.

हजारों चीनी सैनिकों की बचाई जान

चीन पहुंचने के बाद डॉ. कोटनिस समेत सभी भारतीय डॉक्टरों की टीम अगले साढ़े तीन साल चीन के अलग-अलग प्रांतों में चीनी सैनिकों का इलाज कर रही थी. इस दौरान डॉ. कोटनिस ने चीनी सैनिकों के जीवन के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी. कहा जाता है कि साल 1940 में उन्होंने करीब 72 घंटे लगातार ऑपरेशन किया था. कुछ मीडिया रिपोर्टस के मुताबिक डॉक्टर कोटनिस ने अकेले 800 से ज्यादा चीनी सैनिकों का इलाज करके उनकी जान बचाई थी.

चीन में रहने के दौरान डॉक्टर कोटनिस को एक चीनी नर्स से प्यार हो गया था. जिसका नाम क्यों किंगलान  था. इन दोनों ने दिसंबर 1941 में शादी कर ली और एक बेटा भी हुआ था. चीन में डॉक्टर कोटनिस इतने पॉपुलर हुए कि वहां उनका नया नाम भी रख दिया गया था. कोटनिस के परिवार वाले बताते हैं कि वहां रहने के बावजूद वह भारत में लगातार अपने परिवार वालों को चिट्ठी लिखते थे. मीडिया रिपोर्ट्स से पता लगता है कि डॉ. कोटनिस चीन में अपने काम में इतने रम गए थे कि उन्हें वक्त का पता ही नहीं चलता था. वह दिन में 18-20 घंटे तक काम किया करते थे. कुछ समय बाद उनकी सेहत काफी कमजोर हो गई थी, जिस कारण दिसंबर 1942 में डॉक्टर कोटनिस का सिर्फ 32 साल की उम्र में निधन हो गया था. जानकारी के मुताबिक डॉ. कोटनिस की पत्नी भी भारत आती रही थी और आखिरी बार साल 2006 में हू जिंताओ के साथ भारत आई थीं.

शी जिनपिंग भी प्रभावित

डॉक्टर कोटनिस को आज भी चीन के लोग बहुत मानते हैं. इतना ही नहीं चीन के कई मेडिकल कॉलेज, म्यूजियम और स्कूल उनके नाम पर है. चीन में कई जगह उनकी प्रतिमाएं लगी हुई हैं. जानकारी के मुताबिक साल 2014 में जब शी जिनपिंग भारत दौरे पर आए थे, तब उन्होंने भी डॉक्टर कोटनिस की बहन से दिल्ली में मुलाकात करके झुककर अभिवादन किया था.

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गिरिजांश गोपालन को मीडिया इंडस्ट्री में चार साल से ज्यादा का अनुभव है. फिलहाल वह डिजिटल में सक्रिय हैं, लेकिन इनके पास प्रिंट मीडिया में भी काम करने का तजुर्बा है. दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद गिरिजांश ने नवभारत टाइम्स अखबार से पत्रकारिता की शुरुआत की. उन्हें घूमना बेहद पसंद है. पहाड़ों पर चढ़ना, कैंपिंग-हाइकिंग करना और नई जगहों को एक्सप्लोर करना उनकी हॉबी में शुमार है। यही कारण है कि वह तीन साल से पहाड़ों में ज्यादा वक्त बिता रहे हैं. अपने अनुभव और दुनियाभर की खूबसूरत जगहों को अपने लेखन-फोटो के जरिए सोशल मीडिया के रास्ते लोगों तक पहुंचाते हैं.
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