संसद के मानसून सत्र का अब तक नहीं हुआ सत्रावसान, पहले कब-कब हो चुका ऐसा?
संसद के मानसून सत्र को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हुए 70 दिन से ज्यादा हो चुके हैं, लेकिन इसका औपचारिक सत्रावसान नहीं किया गया है. संवैधानिक रूप से यह वैध है और इतिहास में भी कई बार ऐसा हो चुका है.

भारतीय संसद के मानसून सत्र को समाप्त हुए लंबा समय बीत चुका है, लेकिन इसका औपचारिक रूप से अंत यानी सत्रावसान अभी तक नहीं किया गया है. आम तौर पर सत्र खत्म होने के कुछ ही दिनों के भीतर यह प्रक्रिया पूरी कर ली जाती है, मगर इस बार मामला अलग है. 13 अगस्त 2026 को संसद के दोनों सदनों लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दी गई थी.
इस स्थगन को बीते हुए 70 से अधिक दिन हो चुके हैं, लेकिन सरकार ने अभी तक सत्रावसान की अधिसूचना जारी नहीं की है. इस स्थिति के सामने आने के बाद से ही देश की राजधानी दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है और तरह-तरह के कयास लगाए जाने लगे हैं.
क्या है सत्रावसान और क्यों लेट होता है?
संसदीय भाषा में अनिश्चितकाल के लिए स्थगन का मतलब होता है कि मौजूदा सत्र की बैठकें फिलहाल रोक दी गई हैं, जबकि 'सत्रावसान' वह प्रक्रिया है जिसके जरिए राष्ट्रपति आधिकारिक तौर पर सत्र के समापन की मुहर लगाते हैं. देश के संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू इस मामले में स्थिति स्पष्ट कर चुके हैं.
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उनका कहना है कि हमारे देश के संविधान में ऐसी कोई तय समय-सीमा नहीं दी गई है जिसके तहत स्थगन के तुरंत बाद ही सत्रावसान करना अनिवार्य हो. यही वजह है कि लंबे समय तक सत्रावसान न होना किसी भी तरह से असंवैधानिक या गैर-कानूनी नहीं माना जाता है. सरकार जरूरत और परिस्थितियों के हिसाब से इस फैसले में देरी कर सकती है.
इतिहास में पहले कब-कब हो चुका है ऐसा?
यह पहली बार नहीं है जब सरकार ने किसी सत्र के बाद सत्रावसान की प्रक्रिया को रोककर रखा हो. भारतीय संसदीय इतिहास में पहले भी कई ऐसे मौके आए हैं जब सत्र स्थगित होने के महीनों बाद तक उसका औपचारिक सत्रावसान नहीं किया गया था. अगर पुराने सालों के आंकड़ों पर नजर डालें तो साल 1987 में सबसे लंबा अंतराल देखने को मिला था, जब सत्र खत्म होने के पूरे 76 दिनों तक सत्रावसान नहीं हुआ था.
इसके अलावा साल 1989 में 54 दिन, साल 2006 और 2013 में 49-49 दिन, तथा साल 1963 में 41 दिनों तक यह प्रक्रिया रोकी गई थी. हालिया उदाहरण देखें तो साल 2015 में भी मानसून सत्र के बाद 28 दिनों तक सत्रावसान नहीं किया गया था, क्योंकि उस दौरान जीएसटी कानून पर सभी दलों के बीच आम सहमति बनाने की कोशिशें चल रही थीं.
क्यों लग रही हैं विशेष सत्र की अटकलें?
मौजूदा मानसून सत्र का सत्रावसान न होने की वजह से सियासी बाजार में सुगबुगाहट तेज है कि सरकार कोई बड़ा कदम उठा सकती है. जानकारों का मानना है कि यदि सत्रावसान नहीं किया जाता है, तो सरकार को संसद का नया सत्र आहूत करने की लंबी प्रक्रिया से नहीं गुजरना पड़ता. वह महज कुछ ही दिनों के छोटे नोटिस पर संसद का विशेष सत्र या विस्तारित बैठक बुला सकती है.

राजनीतिक हलकों में यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि केंद्र सरकार देश में महिला आरक्षण बिल या फिर परिसीमन से जुड़े किसी महत्वपूर्ण संविधान संशोधन विधेयक को संसद के पटल पर लाकर तेजी से पारित कराने की तैयारी में हो सकती है, ताकि जरूरी कानूनी प्रक्रियाएं बिना किसी रुकावट के समय पर पूरी की जा सकें.
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