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Maa Dat Kali Temple History: किसने बनवाया था उत्तराखंड का डाट काली मंदिर, जहां पहुंचेंगे पीएम मोदी; जानें इसका इतिहास?

उत्तराखंड में बना मां डाट काली मंदिर का इतिहास दो सदियों से भी पुराना है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यात्रा को लेकर चर्चा में आए इस मंदिर की स्थापना 1804 में हुई थी. चलिए जानें इसे किसने बनवाया था.

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  • प्रधानमंत्री आज देहरादून-सहारनपुर सीमा पर डाट काली मंदिर जा रहे हैं.
  • 1804 में स्थापित, यह मंदिर चमत्कारों और श्रद्धा का केंद्र है.
  • अंग्रेजी उच्चारण से 'दंतकाली' नाम बदलकर 'डाट काली' हो गया.
  • राहगीरों की रक्षक और शुरुआत की देवी के रूप में पूजी जाती हैं.

Maa Dat Kali Temple History: उत्तराखंड की शांत वादियों और घने जंगलों के बीच बसा मां डाट काली मंदिर इन दिनों देश के केंद्र में है. अपनी अनोखी वास्तुकला और चमत्कारी मान्यताओं के लिए प्रसिद्ध यह मंदिर पहली बार किसी प्रधानमंत्री की मेजबानी करने जा रहा है. 1804 में स्थापित यह सिद्धपीठ देहरादून की पहचान का अभिन्न हिस्सा है. आइए जानते हैं उस ऐतिहासिक मंदिर की पूरी कहानी, जिसका नामकरण एक अंग्रेज अफसर की जुबान फिसलने के कारण बदल गया था और आज जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दर्शन करने के लिए जा रहे हैं.

प्रधानमंत्री की मां डाट काली मंदिर यात्रा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज उत्तराखंड के दौरे पर हैं. इस यात्रा के दौरान उनका देहरादून और सहारनपुर की सीमा पर स्थित ऐतिहासिक मां डाट काली मंदिर जाने का कार्यक्रम है. यह पहला अवसर है जब देश का कोई प्रधानमंत्री इस प्राचीन सिद्धपीठ के दर्शन करने पहुंच रहा है. पीएम मोदी की इस यात्रा को लेकर पूरे इलाके में उत्साह है और मंदिर परिसर को विशेष रूप से सजाया गया है. स्थानीय लोगों के लिए यह गर्व का विषय है कि दो सौ साल से अधिक पुराने इस ऐतिहासिक स्थल को अब राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिल रही है.

222 साल पुराना मंदिर का गौरवशाली इतिहास

मां डाट काली मंदिर का इतिहास बेहद दिलचस्प और प्राचीन है. इस मंदिर की स्थापना 13 जून 1804 को की गई थी. उस दौर में जब देहरादून और सहारनपुर को जोड़ने वाले मार्ग का निर्माण हो रहा था, तब इस मंदिर की नींव रखी गई थी. यह इलाका शिवालिक की पहाड़ियों और घने जंगलों से घिरा हुआ है. आज यह मंदिर न केवल उत्तराखंड बल्कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश और विदेशों से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए भी अटूट श्रद्धा का केंद्र बना हुआ है. इसे इलाके के सबसे पुराने और जागृत मंदिरों में गिना जाता है.

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किसने की थी मंदिर की स्थापना?

मंदिर के निर्माण के पीछे एक प्रसिद्ध लोककथा जुड़ी है. बताया जाता है कि जब अंग्रेज शासनकाल के दौरान एक इंजीनियर इस हाईवे और सुरंग परियोजना पर काम कर रहा था, तो उसे काम में काफी बाधाओं का सामना करना पड़ा. इसी दौरान देवी काली ने उसे सपने में दर्शन दिए और अपनी एक मूर्ति प्रदान करते हुए उसी स्थान पर मंदिर बनाने का आदेश दिया. देवी की आज्ञा पाकर इंजीनियर ने वह मूर्ति स्थानीय महंत सुखबीर गुसाईं को सौंप दी. महंत गुसाईं ने ही देवी की मर्यादा के अनुरूप वहां मंदिर का निर्माण करवाया था.

अंग्रेजी उच्चारण से बदला मंदिर का नाम

मंदिर के नाम 'डाट काली' के पीछे की कहानी भी काफी अनूठी है. असल में 'डाट' शब्द का सीधा संबंध 'दांत' से है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार देवी काली के उग्र रूप में उनके दांत बाहर निकले हुए दिखाई देते हैं, इसलिए इसका असली नाम 'दंतकाली' मंदिर था. लेकिन जब अंग्रेज अफसर इस क्षेत्र में आए, तो उनके लिए संस्कृत निष्ठ 'दंतकाली' शब्द का सही उच्चारण करना मुश्किल था. वे इसे 'डाट' बोलने लगे और धीरे-धीरे बोलचाल की भाषा में यह नाम इतना प्रचलित हो गया कि आज पूरी दुनिया इसे डाट काली मंदिर के नाम से ही जानती है.

राहगीरों की रक्षक और शुरुआत की देवी

हिंदू धर्म में मां काली को दिव्य शक्ति का प्रतीक माना जाता है, जो दुष्टों के लिए उग्र और भक्तों के लिए ममतामयी हैं. डाट काली मंदिर के बारे में मान्यता है कि मां काली यहां 'शुरुआत की देवी' के रूप में विराजमान हैं. देहरादून शहर के प्रवेश द्वार पर स्थित होने के कारण इन्हें रास्ते की रक्षक माना जाता है. यही कारण है कि इस मार्ग से गुजरने वाला हर वाहन चालक, चाहे वह नया वाहन खरीदकर लाया हो या लंबी यात्रा पर जा रहा हो, मंदिर के सामने रुककर मां का आशीर्वाद जरूर लेता है.

चमत्कारों और मन्नत पूरी होने की मान्यता

डाट काली मंदिर को बहुत चमत्कारी माना जाता है. स्थानीय लोगों का मानना है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई हर मुराद पूरी होती है. मंदिर में अखंड ज्योति हमेशा जलती रहती है, जिसे दिव्य शक्ति का स्रोत माना जाता है. लोग अपने नए वाहनों की पूजा कराने के लिए विशेष रूप से यहां पहुंचते हैं. पीएम मोदी की यात्रा से इस मंदिर के धार्मिक और पर्यटन महत्व में और भी इजाफा होने की उम्मीद है, जिससे आने वाले समय में यहां श्रद्धालुओं की संख्या और बढ़ सकती है.

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About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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