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क्या आजादी के वक्त भारत में शामिल हो सकता था बलूचिस्तान, क्यों नहीं लिया गया था यह फैसला?

बलूचिस्तान हमेशा से फारस और भारतीय उपमहाद्वीप के बीच एक रणनीतिक क्षेत्र रहा है. आइए जानते हैं कि क्या आजादी के वक्त बलूचिस्तान, भारत में शामिल हो सकता था. आखिर क्यों यह फैसला नहीं लिया गया था.

1947 में जब भारत और पाकिस्तान आजाद हुए, उसी समय एक और इलाका था जो अपने भविष्य को लेकर असमंजस में खड़ा था बलूचिस्तान. करीब 227 दिनों तक यह क्षेत्र खुद को स्वतंत्र और संप्रभु मानता रहा. सवाल आज भी उठता है कि क्या वह भारत में शामिल हो सकता था? अगर हां, तो ऐसा क्यों नहीं हुआ? और अगर नहीं, तो इसके पीछे भूगोल, राजनीति और ताकत का कैसा खेल था? आइए इतिहास के इन्हीं पन्नों को खोलते हैं. 

स्टेट ऑफ कलात 227 दिन की आजादी

बीबीसी की रिपोर्ट की मानें तो ब्रिटिश राज खत्म होने के बाद 15 अगस्त 1947 को भारत और पाकिस्तान बने. उसी दौर में स्टेट ऑफ कलात, जिसे आज के बलूचिस्तान का बड़ा हिस्सा माना जाता है, ने खुद को स्वतंत्र घोषित किया. यह स्थिति करीब 227 दिनों तक बनी रही. 

कलात एक देसी रियासत थी, जिसके शासक को ‘खान ऑफ कलात’ कहा जाता था. यह इलाका भौगोलिक रूप से ईरानी पठार के पूर्वी किनारे पर स्थित है. मौजूदा बलूचिस्तान तीन हिस्सों में बंटा है- पाकिस्तान का बलूचिस्तान प्रांत, ईरान का सिस्तान-बलूचिस्तान और अफगानिस्तान का छोटा हिस्सा, जिसमें निमरुज, हेलमंद और कंधार के कुछ क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से जुड़े रहे हैं. 

जिन्ना की शुरुआती राय क्या थी?

रिपोर्ट बताती है कि पाकिस्तान के संस्थापक Muhammad Ali Jinnah ने शुरुआती दौर में कलात को स्वतंत्र रहने की कानूनी सलाह दी थी. उन्होंने हैदराबाद रियासत को भी यही राय दी थी कि ब्रिटिश शासन खत्म होने के बाद वे स्वतंत्र रह सकते हैं. जर्मन राजनीतिक वैज्ञानिक Martin Axmann ने अपनी किताब ‘Back to the Future: The Khanate of Kalat and the Genesis of Baloch Nationalism 1915-1955’ में लिखा है कि जिन्ना की इस सलाह से ब्रिटिश अधिकारी भी हैरान थे, लेकिन हालात तेजी से बदले. 

कलात क्या चाहता था?

बीबीसी के अनुसार पाकिस्तानी इतिहासकार Yaqoob Khan Bangash ने अपनी किताब ‘A Princely Affair’ में लिखा है कि कलात में लोकतांत्रिक राष्ट्रवादी आंदोलन सक्रिय था. कलात स्टेट नेशनल पार्टी ने 1945 में ऑल इंडिया स्टेट पीपल्स कॉन्फ्रेंस में हिस्सा लिया था, जिसकी अध्यक्षता Jawaharlal Nehru ने की थी.

कलात की संसद का मानना था कि सिर्फ मुस्लिम बहुल होने के आधार पर पाकिस्तान में शामिल होना जरूरी नहीं है. वहां दो सदनों वाली व्यवस्था बनी थी और एक स्वतंत्र या ज्यादा स्वायत्त दर्जा चाहा जा रहा था. कुछ वर्ग भारत से करीबी बढ़ाने के पक्ष में भी थे, लेकिन यह कोई औपचारिक प्रस्ताव के रूप में सामने नहीं आया. 

भारत में शामिल होना क्यों मुश्किल था?

इतिहासकार Mubarak Ali के अनुसार, देसी रियासतों का विलय व्यावहारिक और भौगोलिक परिस्थितियों पर भी निर्भर था. जूनागढ़ पाकिस्तान में शामिल होना चाहता था, लेकिन उसका भूगोल भारत से घिरा था. वहीं कलात का इलाका पूरी तरह पाकिस्तान से सटा हुआ था और भारत से उसकी कोई सीधी सीमा नहीं थी. ऐसी स्थिति में कलात का भारत में शामिल होना भौगोलिक रूप से लगभग असंभव था. न तो सैन्य समर्थन आसान था, न प्रशासनिक संपर्क. यही कारण था कि भारत की ओर से कोई ठोस पहल सामने नहीं आई थी.

20 मार्च 1948 और फैसला बदल गया

रिपोर्ट के अनुसार मार्टिन एक्समैन के अनुसार 20 मार्च 1948 को खान ऑफ कलात पाकिस्तान में शामिल होने पर राजी हो गए. बताया जाता है कि भारत और अफगानिस्तान से अपेक्षित समर्थन न मिलने के बाद यह फैसला लिया गया. कुछ ही समय बाद पाकिस्तान ने बलूचिस्तान को अपने प्रशासनिक ढांचे में शामिल कर लिया. हालांकि बाद के वर्षों में यहां कई बार विद्रोह की आवाज उठी. स्थानीय लोगों का कहना रहा कि यह विलय दबाव में हुआ था.

जिन्ना का रुख क्यों बदला?

इतिहासकार और पूर्व भारतीय उच्चायुक्त TCA Raghavan का मानना है कि जिन्ना के मन में क्या चल रहा था, यह कहना मुश्किल है, लेकिन यह स्पष्ट है कि 1947 के बाद उनका रुख बदल गया. पाकिस्तान बनने के बाद नई राज्य व्यवस्था को मजबूत करना प्राथमिकता थी और रणनीतिक रूप से बलूचिस्तान का महत्व बहुत ज्यादा था.

क्या सच में भारत में शामिल होने का प्रस्ताव था?

भारतीय मीडिया के कुछ हिस्सों में समय-समय पर यह दावा किया जाता है कि कलात ने भारत में शामिल होने का प्रस्ताव दिया था, लेकिन ऐतिहासिक दस्तावेजों में इसका स्पष्ट और औपचारिक प्रमाण नहीं मिलता है. इतिहासकारों का कहना है कि संपर्क और बातचीत के संकेत जरूर थे, पर कोई आधिकारिक विलय प्रस्ताव दर्ज नहीं है.

भूगोल, राजनीति और ताकत का संतुलन

बलूचिस्तान हमेशा से फारस और भारतीय उपमहाद्वीप के बीच एक रणनीतिक क्षेत्र रहा है. समुद्री तट, खनिज संसाधन और भौगोलिक स्थिति इसे अहम बनाते हैं. आखिरकार फैसला सिर्फ इच्छा का नहीं, बल्कि भूगोल और ताकत के संतुलन का था. भारत से दूरी, पाकिस्तान से सीधी सीमा और तत्कालीन राजनीतिक हालात ने कलात के विकल्प सीमित कर दिए.

यह भी पढ़ें: T20 World Cup 2026: अगर भारत-पाकिस्तान मिलाकर एक क्रिकेट टीम बनती तो कितनी मजबूत होती? जान लें हकीकत

About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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