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चुनाव आयोग के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव खारिज, जानें संविधान के किस नियम के तहत हुआ ऐसा?

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष द्वारा लाया गया महाभियोग प्रस्ताव खारिज हो गया है. लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने टीएमसी की अगुआई में पेश किए गए इस नोटिस को स्वीकार करने से मना कर दिया.

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भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास में पहली बार मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ शुरू हुई महाभियोग की प्रक्रिया अंजाम तक पहुंचने से पहले ही थम गई है. विपक्षी दलों, विशेषकर टीएमसी ने ज्ञानेश कुमार पर गंभीर आरोप लगाते हुए उन्हें पद से हटाने की मुहिम शुरू की थी, लेकिन लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा सभापति ने संवैधानिक शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया. आखिर वह कौन से नियम थे जिन्होंने इस प्रस्ताव का रास्ता रोक दिया और चुनाव आयोग पर लगे आरोपों का क्या हुआ?

लोकसभा अध्यक्ष का बड़ा फैसला और ऐसे हुआ प्रस्ताव का अंत 

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष के महाभियोग प्रस्ताव नोटिस को स्वीकार करने से इनकार कर दिया है. टीएमसी के नेतृत्व में लाए गए इस प्रस्ताव पर 130 से ज्यादा सांसदों ने दस्तखत किए थे, लेकिन तकनीकी और संवैधानिक कसौटियों पर यह नोटिस टिक नहीं सका. अध्यक्ष ने स्पष्ट किया कि मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया बेहद जटिल है और इसके लिए पेश किए गए तर्क पर्याप्त नहीं पाए गए. 

विपक्ष के वो 7 गंभीर आरोप और 10 पन्नों का नोटिस

तृणमूल कांग्रेस ने 12 मार्च को जो 10 पन्नों का नोटिस सौंपा था, उसमें ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए 7 प्रमुख कारणों का जिक्र किया गया था. इसमें बिहार की एसआईआर (SIR) प्रक्रिया में गड़बड़ी और लोगों के वोटिंग अधिकार छीनने जैसे संगीन आरोप शामिल थे. विपक्ष का दावा था कि चुनाव आयोग ने कुछ खास राजनीतिक दलों के प्रति पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाया है. इस नोटिस में सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए गए थे.

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संविधान का कौन सा अनुच्छेद बना ढाल? 

मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाना इतना आसान नहीं है, क्योंकि संविधान ने उन्हें विशेष सुरक्षा दी है. अनुच्छेद 324(5) के मुताबिक, सीईसी को केवल उसी प्रक्रिया और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जैसे सुप्रीम कोर्ट के किसी न्यायाधीश को हटाया जाता है. इसके लिए ‘सिद्ध कदाचार' यानी बुरा बर्ताव या 'अक्षमता' का होना अनिवार्य है. जांच में पाया गया कि विपक्ष द्वारा लगाए गए आरोप इन संवैधानिक मापदंडों को पूरा करने में विफल रहे हैं.

1968 की धारा 3 क्या कहती है?

महाभियोग प्रस्ताव के खारिज होने के पीछे न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 की धारा 3 की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. यह नियम लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा सभापति को यह शक्ति देता है कि वे नोटिस की समीक्षा करें. उन्हें यह अधिकार है कि वे प्रस्ताव को स्वीकार करें या उसे शुरुआती स्तर पर ही अस्वीकार कर दें. अधिकारियों ने इस नोटिस का सावधानीपूर्वक और वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन किया और पाया कि इसमें लगाए गए पक्षपात के आरोप ठोस सबूतों पर आधारित नहीं थे.

पहली बार हुआ महाभियोग प्रस्ताव का ऐसा प्रयोग

भारत के चुनावी इतिहास में यह पहला मौका था जब किसी मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू करने की कोशिश की गई. कुल मिलाकर 193 सांसदों के हस्ताक्षर वाले विभिन्न नोटिसों के जरिए दबाव बनाने की कोशिश हुई थी. हालांकि, संवैधानिक जानकारों का कहना है कि चुनाव आयोग जैसी स्वतंत्र संस्था के प्रमुख को हटाने के लिए बहुत ही उच्च स्तर के प्रमाणों की आवश्यकता होती है, जो इस मामले में मौजूद नहीं थे.

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About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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